बुधवार, अगस्त 20

फिर भी अनछूया ही रहता



फिर भी अनछूया ही रहता



बन मलयज वन-वन डोल रहा
शशि मुख से बदली खोल रहा
तू पुहिन बिंदु बन कर ढुलका

जल में जीवन रस घोल रहा !

साँझ-सवेरे, विपिन घनेरे
पंकज पादप, मानुष चेहरे,
सब तेरी ही कथा सुनाते


दिवस मनोहर घोर अँधेरे !

हर शब्द तुझे इंगित करता
हर भाव तुझे मन में भरता,
हर भाषा तुझको ही गाती 
फिर भी अनछूया ही रहता !







5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति..शुभकामनाएं सहित..

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  2. हर शब्द तुझे इंगित करता
    हर भाव तुझे मन में भरता,
    हर भाषा तुझे ही गाती है
    फिर भी अनछूया ही रहता !
    ...वाह...असीम सत्ता की लाज़वाब अभिव्यक्ति...

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  3. साँझ-सवेरे, विपिन घनेरे
    पंकज पादप, मानुष चेहरे,
    सब तेरी ही कथा सुनाते
    दिवस मनोहर घोर अँधेरे !सुन्दर प्रांजल अभिव्यक्ति

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  4. माहेश्वरी जी, कैलाश जी व वीरू भाई, स्वागत व आभार !

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