बुधवार, अगस्त 6

वह

वह


चहका कूक बनकर
महका फूल बनकर,
उमगा दूब सा वह
विहंसा धूप सा वह !

खिलता हर कली में
फिरता हर गली में,
रचता नीड़ सुंदर
बहता नीर बनकर !

जलता तारिका बन
उड़ता सारिका बन
गिरता निर्झरों सा
पलता नव शिशु सा !

भजता भक्त बनकर
रचता कवि बनकर
गढ़ता बुत नये नित
बढ़ता उषा संग नित !



2 टिप्‍पणियां:

  1. उसी के लीला है सारी. उसी से सृष्टि है.

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  2. सही कहा है निहार जी स्वागत व आभार !

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