शनिवार, दिसंबर 4

कैसा है वह

कैसा है वह

शशि, दिनकर नक्षत्र गगन के, धरा, वृक्ष, झोंके पवन के
बादल, बरखा, बूंद, फुहारें, पंछी, पुष्प, भ्रमर गुंजारें

लाखों सीप अनखिले रहते, किसी एक में उगता मोती
लाखों जीवन आते जाते, किसी एक में रब की ज्योति

उस ज्योति को आज निहारें, परम सखा सा जो अनंत है
जीने की जो कला सिखाता, यश बिखराता दिग दिगन्त है

जैसे कोई गीत सुरीला, मस्ती का है जाम नशीला
तेज सूर्य का भरे ह्रदय में, शिव का ज्यों निवास बर्फीला

कोमल जैसे माँ का दिल, दृढ जैसे पत्थर की सिल
सागर सा विस्तीर्ण है जो, नौका वही, वही साहिल

नृत्य समाया अंग-अंग में, चिन्मयता झलके उमंग में
दृष्टि बेध जाती अंतर मन, जाने रहता किस तरंग में

लगे सदा वह मीत पुराना, जन्मों का जाना-पहचाना
खो जाता मन सम्मुख आके, चाहे कौन किसे फिर पाना

खो जाते हैं प्रश्न जहाँ पर, चलो चलें उस गुरुद्वार पर
चलती फिरती चिंगारी बन, मिट जाएँ उसकी पुकार पर

जैसे शीतल सी अमराई, भीतर जिसने प्यास जगाई
एक तलाश यात्रा भी वह, मंजिल जिसकी है सुखदाई

नन्हे बालक सा वह खेले, पल में सारी पीड़ा लेले
अमृत छलके मृदु बोलों से, हर पल उर से प्रीत उड़ेंले

वह है इंद्रधनुष सा मोहक, वंशी की तान सम्मोहक
है सुंदर ज्यों ओस सुबह की, अग्नि सा उर उसका पावक

मुस्काए ज्यों खिला कमल हो, लहराए ज्यों बहा अनिल हो
चले नहीं ज्यों उड़े गगन में, हल्का-हल्का शुभ्र अनल हो

मधुमय जीवन की सुवास है, अनछुई अंतर की प्यास है
पोर-पोर में भरी पुलक वह, नयनों का मोहक उजास है

प्रिय जैसे मोहन हो अपना, मधुर-मधुर प्रातः का सपना
स्मृति मात्र से उर भीगे है, साधे कौन नाम का जपना

धन्य हुई वसुंधरा तुमसे, धन्य-धन्य है भारत भूमि
हे पुरुषोत्तम! हे अविनाशी! प्रज्वलित तुमसे ज्ञान की उर्मि



अनिता निहालानी
४ दिसंबर २०१०

7 टिप्‍पणियां:

  1. लाखों सीप अनखिले रहते, किसी एक में उगता मोती
    लाखों जीवन आते जाते, किसी एक में रब की ज्योति

    उस अनंत की तलाश ही जीवन का सार्थक उद्देश्य है..ऊर्जा से परिपूर्ण सुन्दर प्रस्तुति..आभार

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  2. बहुत अच्छी लगी यह रचना। हनुमान चालीसा की तरह पढ गया। याद भी कर गया कई पंक्तियां।

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  3. सुन्दर रचना...
    आपका आभार,
    आपके अपने ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है
    http://arvindjangid.blogspot.com/

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  4. वाह वाह गज़ब की लयबद्ध प्रस्तुति सीधे दिल मे उतरती है…………बस वो तो बिल्कुल वैसा ही है…………॥
    जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।

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  5. बहुत सुन्दर और मन को संतुष्ट करती रचना ..

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  6. बहुत सुन्दर प्रवाह...
    सारगर्भित रचना!

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  7. अनीता जी,

    उसके हर रूप को साकार कर दिया है आपने....बहुत सुन्दर

    लाखों सीप अनखिले रहते, किसी एक में उगता मोती
    लाखों जीवन आते जाते, किसी एक में रब की ज्योति

    कोमल जैसे माँ का दिल, दृढ जैसे पत्थर की सिल
    सागर सा विस्तीर्ण है जो, नौका वही, वही साहिल

    लगे सदा वह मीत पुराना, जन्मों का जाना-पहचाना
    खो जाता मन सम्मुख आके, चाहे कौन किसे फिर पाना

    नन्हे बालक सा वह खेले, पल में सारी पीड़ा लेले
    अमृत छलके मृदु बोलों से, हर पल उर से प्रीत उड़ेंले

    ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं....

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