मंगलवार, दिसंबर 14

कोई मेघ प्रीत बन बरसा

कोई मेघ प्रीत बन बरसा

दिल के आँगन की मुंडेर पे, यादों की गौरैया चहकी
फूलों वाले इस मौसम में, मदमाती पुरवैया महकी I

स्मृतियों की चूनर ओढ़े, मन राधा ने गठरी खोली
बौर लदे आमों के वन में, इठलाती कोयलिया बोली I

सिंदूरी वह शाम सुहानी, था बचपन जब हो गया विदा
कोई मेघ प्रीत बन बरसा, यह मन उस पर हो गया फ़िदा I

बाबा की वह हंसतीं आँखें, माँ का भीगा-भीगा प्यार
याद आ रहा बरसों पहले, छलका था भैया का दुलार I

जीवन कितना बदल गया है, मन अलबम ने दी याद दिला
फेरे वाली साड़ी का पर, है नहीं अभी तक फाल खुला I
अनिता निहालानी
१४ दिसंबर २०१०

4 टिप्‍पणियां:

  1. अनीता जी,

    वाह.....बहुत सुन्दर भाव.....अतीत की स्मृतियाँ .....भावमयी प्रस्तुति |

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  2. बाबा की वह हंसतीं आँखें, माँ का भीगा-भीगा प्यार
    याद आ रहा बरसों पहले, छलका था भैया का दुलार

    आत्मीय संबंधों को दर्शाती बहुत सुंदर , आभार

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  3. जीवन कितना बदल गया है, मन अलबम ने दी याद दिला
    फेरे वाली साड़ी का पर, है नहीं अभी तक फाल खुला
    .....यादें कभी मिटती नहीं .... बहुत कुछ याद आ जाता है पन्नों का पलटने पर .....बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  4. बाबा की वह हंसतीं आँखें, माँ का भीगा-भीगा प्यार
    याद आ रहा बरसों पहले, छलका था भैया का दुलार I

    जीवन कितना बदल गया है, मन अलबम ने दी याद दिला
    फेरे वाली साड़ी का पर, है नहीं अभी तक फाल खुला I
    यह क्षण लड़कियों के जीवन में आते हैं और शायद वो ऐसा ही महसूस करती हैं ...बहुत भाव पूर्ण रचना

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