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गुरुवार, मार्च 21

होली के रंगों में जाने

होली के रंगों में जाने 

 सभी भाव जल गये द्वेष के 

मन उजले-उजले हो आये , 

जिस पर फिर प्रियतम ने आकर 

मदिर अबीर-गुलाल लगाये !


निखर गये हैं रूप सलोने  

अंतर ज्यों आश्वस्त हुए हैं, 

होली के आने से देखो 

आज ह्रदय मदमस्त हुए हैं !


सभी नज़र आते हैं अपने 

आज एक भी नहीं पराया, 

होली के रंगों में जाने 

छुपा कौन सा राज अनोखा !


दूर-दूर ही रहते थे जो 

आज बने हैं सब हमजोली, 

मिलकर सभी मनाने आये 

प्रीत रंग की सुंदर होली !


शनिवार, मार्च 2

शुरू हुआ मार्च का मार्च

शुरू हुआ मार्च का मार्च 

यह नव ऋतु के आगमन का काल है 

जब पकड़ ढीली हो गई है जाड़ों की 

अंगड़ाई ले रही हैं नई कोंपलें

 वृक्षों की डालियों पर 

शीत निद्रा से जागने लगे हैं जंतु 

जो धरा के गर्भ में सोये थे

खिलने लगे हैं डैफ़ोडिल भी 

हज़ारों क़िस्म के फूलों के साथ 

आने को है महा शिवरात्रि का पर्व 

बढ़ाने महिला दिवस का गौरव 

इसी माह को जाता है श्रेय 

रमज़ान के आगाज़ का  

फिर आएगा झूमता गाता 

रंगीन पर्व मदमाती होली का 

कहते हैं मंगल से जुड़ा है 

गुलाबी रंगत लिए यह महीना 

जिसमें आकाश का रंग है नीला  

जंगल और हरे हो गये हैं 

पक्षी लौटने लगे हैं अपने ठिकानों पर 

पता है न,  मनाते हैं मार्च में 

जल और वन दिवस  

कविता व गौरैया दिवस 

आनंद और निद्रा दिवस  

और तो और 

सामान्य शिष्टाचार दिवस भी 

कितना कुछ समेटे है अपनी झोली में 

मार्च का यह वासंती मास 

जो बनाता है इसे ख़ासम ख़ास ! 


मंगलवार, मार्च 7

पलकों में अनुराग भर लिया


पलकों में अनुराग भर लिया 


आम बौराया, खिल मंजरी 

 झूल रही मद में गर्वीली,

हवा फागुनी मस्त हुई है 

बिखरी मदिर सुवास नशीली !


मोहक, मदमाता सा मौसम

 खिले पलाश, सेमल की डाल

धूम मचाती, रंग उड़ाती 

 आयी होली उड़ता गुलाल !


बही बयार बड़ी बातूनी

 बासंती बाग  में  रसीली,

बजे ढोल, मंजीरे खड़के,

 नाच उठी सरसों शर्मीली !


उपवन-उपवन पुष्पों की छवि 

 ज्यों बारात सजी अलबेली  

गुन-गुन नर्तन करे भ्रामरी 

 उड़े  तितलियों सँग  रंगीली  !


ऊपरवाला खेल रहा है 

ऐसे सँग कुदरत के होली

लाल गुलाब, गुलाबी कंचन  , 

निकल पड़ी महुआ की टोली  !


छँट गए सारे घन सुनी जब  

कोयलिया की वन-वन बोली

मिटा द्वैत सब एक हुए हैं 

हरेक मुखड़े  सजी रंगोली !


डगर-डगर हर गाँव खेत में 

निकली है मस्तों की टोली,

पलकों में अनुराग भर लिया 

बोलों में ज्यों मिसरी घोली !  


सोमवार, मार्च 6

होली अंतर की उमंग है

होली अंतर की उमंग है


 है प्रतीक वसंत जीवन का

यौवन का इंगित वसंत है,

होली मिश्रण है दोनों का

हँसते जिसमें दिग-दिगंत है !


रस, माधुर्य,  सरसता कोमल

आशा, स्फूर्ति और मादकता,

होली अंतर की उमंग है

अमर प्रेम की परम  गहनता !


जिंदादिल उत्साह दिखाते

साहस  भीतर भर-भर पाते,

होली के स्वागत में ख़ुशियाँ 

पाते उर में और लुटाते !


सुंदर, सुखमय सजे  कल्पना  

रंगों की आपस में ठनती,

मस्तक लाल, कपोल गुलाबी

मोर पंख सी चुनरी बनती !


कण-कण वसुधा का मुस्काए 

फूलों से मन खिल-खिल जाते ,

लुटा रहा सुवास मौसम जो

चकित हुए नासापुट पाते !


हरा-भरा पुलकित  उर अंतर

कण-कण में झलके वह सुंदर,

मधुरिम, मृदुलिम निर्झर सा मन  

कल-कल करे निनाद निरंतर !


मादक पीयुष सी ऋतु  होली

अमराई में कोकिल बोली,

जोश भरा उन्मुक्त हृदय ले

निकली मत्त मुकुल की टोली !


मंगलवार, मार्च 15

कुदरत की होली

कुदरत की होली 


झांको कभी निज नयनों में 

और थोड़ा सा मुस्कुराओ,

रंग भरने हैं अंतर में मोहक यदि  

हाथ कुदरत से अपना मिलाओ !

नीले नभ पर पीला चाँद 

रूपहले सितारों में जगमगाये  

कभी स्याह बादलों में 

इंद्र धनुष भी कौंध अपनी दिखाए !

हरे रंग से रंगी वसुंधरा

जिस पर अनगिन फूल टंके हैं 

ज़रा संभल कर जाना पथ पर

तितलियों के झुंड उड़े हैं !

होली खेलती दिनरात यह कुदरत 

जगाना उल्लास ही इसकी फ़ितरत 

केवल आदमी लड़ाई के बहाने खोजता  

जहाँ रंगों के अंबार लगते

तुच्छ बातों को एक मसला बना लेता  !

रंग सजते बन उमंग जीवन में 

भर जाते तरंग तन और मन में 

अगर रंग भरने हैं सदा के लिए अंतर में 

सहज हर भोर में

संग सूरज के खिलखिलाओ 

हाथ कुदरत से अपना मिलाओ !


सोमवार, मार्च 14

एक होली ऐसी भी



एक होली ऐसी भी


तन पर हैं  गुलाबी वसन 

हाथ पीले हुए हैं 

पैरों पर लाल आलता 

नयन गीले हुए हैं 

प्रीत से भीगी है चूनरिया सारी 

पी की आँखें जैसे बनी हैं पिचकारी 

चिबुक छूने को हाथ बढ़ाया भर था 

कि हो गये हैं दोनों गाल लाल 

जैसे उतर आया हो भीतर से कोई गुलाल 

हरी चूड़ियों की खनक भी उठी उसी क्षण 

होली खेलती है ऐसे नयी दुल्हन ! 


सोमवार, मार्च 7

युद्ध की विभीषिका

युद्ध की विभीषिका 


जो खेल सकते थे 

रंगों की होली   

वे खून की होली खेल रहे हैं 

हथियारों और सत्ता मद में चूर कुछ लोग 

उन्हीं को रौंदते जा रहे 

जिन पर अपना दावा करते हैं 

विनाश की यह दुर्दांत लीला 

दोहरायी गयी है जाने कितनी बार 

नफरत की आग में झुलसता रहा है हर बार प्यार 

जब छिड़ा नहीं था युद्ध 

उकसाया जाता रहा 

परिणाम की परवाह किए बिना 

जोशीले नारों को उछाला जाता रहा 

रक्तरंजित हुई है धरा फिर एक बार 

शांति की हर पहल हुई है नाकाबिल 

एक सैनिक की मौत भी 

धब्बा है मानवता के नाम  

भुगतता पड़ेगा आने वाली पीढ़ियों को 

जिसका अंजाम 

अहिंसा, प्रेम और करुणा ने 

जैसे आज हार मान ली है 

तभी तो एक देश के हर आदमी ने 

बंदूक़ थाम ली है !


शनिवार, मार्च 27

अब समेटें धार मन की

अब समेटें धार मन की 


खेलता है रास कान्हा 

आज भी राधा के संग,  

प्रीत की पिचकारियों से 

डाल रहा रात-दिन रंग !


अब समेटें धार मन की 

जगत में जो बह रही है, 

कर समर्पित फिर उसी के 

चरण कमलों में बहा दे !


हृदय राधा बन थिरक ले  

 बने गोपी भावनाएं,  

उस कन्हैया के वचन ही 

  टेरते हों बंसी बने !


होली मिलन शुभ घटेगा 

तृप्त होगी आस उर की, 

नयन भर कर देख लें फिर 

अनुपम झलक साँवरे की !

 

सोमवार, मार्च 9

होली

होली

रंग भरे जीवन में जिसने 
हर इक पल उसकी होली है, 
संशय सभी जला डाले फिर
हर करवट हँसी ठिठोली है !

मन मतवाला भूल भी जाय 
कुदरत ले निकली टोली है, 
रंगों की भाषा जो जाने 
हर कदम जहाँ रंगोली है !

नीला अम्बर, रवि नारंगी 
मेघ सलेटी, पंछी श्वेत,
हरी घास पर पीली मैना 
रक्तिम पुष्प, सुनहरे खेत !

अग्नि की पीली ज्वाला में
बैर भाव सबके जल जाएँ, 
उर की गहराई में सोया 
शुभ आह्लाद पुनः जग जाये !

मंगलवार, मार्च 19

अगन होलिका की है पावन




अगन होलिका की है पावन

बासंती मौसम बौराया
मन मदमस्त हुआ मुस्काया,
फागुन पवन बही है जबसे
अंतर में उल्लास समाया !

रंगों ने फिर दिया निमंत्रण
मुक्त हो रहो तोड़ो बंधन,
जल जाएँ सब क्लेश हृदय के
अगन होलिका की है पावन !

जली होलिका जैसे उस दिन
जलें सभी संशय हर उर के,
शेष रहे प्रहलाद खुशी का
मिलन घटे उससे जी भर के !

उड़े गुलाल, अबीर फिजां में
जैसे हल्का मन उड़ जाये,
रंगों के जरिये ही जाकर
प्रियतम का संदेशा लाए !

सीमित हैं मानव के रंग
पर अनंत मधुमास का यौवन,
थक कर थम जाता है उत्सव
चलता रहता उसका नर्तन !


बुधवार, फ़रवरी 28

गीत उपजते अधरों से यूँ






गीत उपजते अधरों से यूँ


रंग बिखेरे जाने किसने
उपवन सारा महक रहा है,
लाल, गुलाबी, नीले, पीले
कुसुमों से दिल बहक रहा है !

एक सुवास नशीली छायी
मस्त हुआ है आलम सारा,
रँगी हुई है सारी धरती
होली का है अजब नजारा !

फगुनाई भर पवन बह रही
उड़ा रही है पराग गुलाल,
सेमल झूमी, महुआ टपका
फूले कंचन, कनेर, पलाश !

कण-कण वसुधा का हर्षित है
किसने आखिर किया इशारा,
मधुमास में चहकते पंछी
जाने किसने उन्हें पुकारा !

रस टपके मुदिता भी बरसे
कुदरत सारी नई हुई है,
गीत उपजते अधरों से यूँ
जैसे वर्षा बूंद झरी है !

मौसम का ही असर हुआ है
मन मयूर दिनरात नाचता,
बासंती यह पवन सुहाना
अंतर्मन में प्यास जगाता  !

होली रंग बहाती सुखमय
तन के संग-संग मन भीगे,
सारे जग को मीत बना लें
पिचकारी से प्रीत ही बहे !

मंगलवार, मार्च 7

रंग चुरा के कुछ टेसू के




 रंग चुरा के कुछ टेसू के

सुरभि भरे निज आंचल में फिर 
गीत गा रही  पवन बसंती,
नासापुट की खत्म प्रतीक्षा 
भीगा उर फागुन  की मस्ती !

कंचन झूमा, खिला पलाश 
बौराया आम्रवन सारा,
आड़ू, नींबू सभी महकते 
कामदेव ने किया इशारा ! 

एक तरफ झरते हैं पत्ते 
नव कोमल पल्लव उग आते,
जीवन-मृत्यु संग घट रहे 
महुआ चूता भंवरे गाते !

कुसुमित प्रमुदित खिली वाटिका
ऋतुराज रचता रंगोली,
  रंग चुरा के कुछ टेसू के 
क्यों न खेलें पावन होली !



मंगलवार, मार्च 26

होलिका दहन से होली मिलन तक


होलिका दहन से होली मिलन तक



बासंती मौसम बौराया
मन मदमस्त हुआ मुस्काया,
पवन फागुनी बही है जबसे
अंतर में उल्लास समाया !

रंगों ने फिर दिया निमंत्रण
मुक्त हो रहो तोड़ो बंधन,
जल जाएँ सब क्लेश हृदय के
अगन होलिका की है पावन !

जली होलिका जैसे उस दिन
जलें सभी संशय हर उर के,
शेष रहे प्रहलाद खुशी का
मिलन घटे सबसे जी भर के !

उड़े गुलाल, अबीर फिजां में
जैसे हल्का मन उड़ जाये,
रंगों के बहाने जाकर
प्रियतम का संदेशा लाए !

सीमित हैं मानव के रंग
पर अनंत मधुमास का यौवन,
थक कर थम जाता है उत्सव
चलता रहता उसका नर्तन !