गुरुवार, मई 21

वह अनंत पथ खुद से जाता

वह अनंत पथ खुद से जाता 


उस अनन्त पथ के हो राही
बाधाओं से क्या घबराना, 
जन्मों की जो चाह रही है 
उसे थाम कर बढ़ते जाना !

गह्वर भी हैं सँकरे रस्ते 
भय के बादल घोर अँधेरे,
कर्मों की जंजीर पड़ी है 
अपना ही मन देगा धोखे !

किन्तु नहीं पल भर को इनकी 
व्यर्थ व्यथा में जकड़ो खुद को, 
एक उसी की लगन लगी हो
बल देंगी राहें कदमों को !   

प्रतिपल नीलगगन से आतीं 
लहरें सिंचित करतीं मन को, 
नीचे धरती माँ सी थामे 
दृष्टि टिकी हो मात्र लक्ष्य पर !

भाव जगें पल-पल शुभता के 
उनकी आभा में लिपटा तन,  
वह अनंत पथ खुद से जाता 
क्यों संशय में सिमटा है मन !

18 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शुक्रवार (22-05-2020) को
    "धीरे-धीरे हो रहा, जन-जीवन सामान्य।" (चर्चा अंक-3709)
    पर भी होगी। आप भी
    सादर आमंत्रित है ।
    …...
    "मीना भारद्वाज"

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  2. उस अनन्त पथ के हो राही
    बाधाओं से क्या घबराना, 
    जन्मों की जो चाह रही है 
    उसे थाम कर बढ़ते जाना !
    वाह दीदी... बहुत ही सुंदर और प्रेरणादायी रचना

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  3. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २२ मई २०२० के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  4. सारगर्भित रचना के लिए साधुवाद

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  5. प्रतिपल नीलगगन से आतीं
    लहरें सिंचित करतीं मन को,
    नीचे धरती माँ सी थामे
    दृष्टि टिकी हो मात्र लक्ष्य पर ! ... अनीता जी, आप सभी भावों को क‍ितनी आसानी से मन के गहरे से न‍िकालती लाती हैं वा...ह

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  6. प्ररेणादायक
    सकारात्मकता से ओतप्रोत करने वाली
    शानदार पोस्ट 👍👌💐

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  7. बेहतरीन सृजन आदरणीया दीदी.
    सादर

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