मंगलवार, अक्तूबर 20

ठहरे विमल झील का दर्पण

 ठहरे विमल झील का दर्पण 

पूर्ण चन्द्रमा, पूर्ण समंदर 

पूर्ण, पूर्ण से मिलने जाये, 

 माने मन स्वयं को अधूरा 

अधजल गगरी छलकत जाये !


चाहों के मोहक जंगल में 

इधर भागता उधर दौड़ता, 

कुछ पाने की कुछ करने  की

सदा किसी फ़िराक में रहता !


ठहरे विमल झील का दर्पण 

शांत सदा भीतर तल झलके, 

जिस पर टिकी हुई वह धरती 

थिर अकंप आधार वह दिखे  !


मन लहरों सा जब भी कँपता 

भुला दिया बस निज आधार, 

उस तल से संदेसे आते 

सदा बुलाता भेजे दुलार !


हर कम्पन उसकी रहमत है 

फिर-फिर पूर्ण की चले तलाश, 

जाने खुद को पूर्ण पुष्प  सा 

हर सिंगार या रूद्र पलाश !


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