मंगलवार, मई 18

बादलों के पार

बादलों के पार


उठे धरा से छूने अम्बर
मेघपुंज के पार आ गए
छूटी पीछे दो की दुनिया
इक का ही आधार पा गए I

दूर कहीं है गंध धरा की
स्वर्णिम क्षण यह दृश्य अनोखा
ढका गया बादल से हर कण
दिखे कहीं न कोई झरोखा I

निर्मल नीले नभ की छाया
श्वेत मेघ तिरते झलकाते
मानो बिखरी हो कपास शुभ्र
या उड़तीं बगुलों की पातें I

हिम आच्छादित पर्वत माला
ज्यों मीलों दूर चली जाती
श्वेत बादलों की यह शैया
परीलोक की याद दिलाती I

अनिता निहालानी
२६ मार्च २०१०

सोमवार, मई 17

दुलियाजान में गुरूजी

दुलियाजान में गुरूजी

सुनो सुनो क्या हवा कह रही
कानों में चुपके से आकर
आने वाला है जादूगर
भरने प्रीत से मन की गागर

सूर्य गगन धरा व पंछी
पुलकित होकर हुए तृप्त हैं
एक ही सुर में सभी कह रहे
चाह उसी की जो मुक्त है

मुक्त सदा जो हर बंधन से
दुःख पीड़ा से छोटे मन से
सुख, शांति आनंद रूप वह
चिन्मय हो आया कण कण से

वह जो करुणा रूप बुद्ध का
झलकाए नानक की खुमारी
मस्त हुआ है जो कबीर सा
गूंज रहा बन कृष्ण बांसुरी

मीरा सी भक्ति है जिसमें
महावीर सा ज्ञान अनूठा
शंकर का अद्वैत पी गया
रामकृष्ण सी सहज सरलता

फौलादी विश्वास का मालिक
फूल सा कोमल बालक जैसा
प्रखर बुद्धि अद्भुत योगी है
स्नेह लुटाता पालक जैसा

चकित हुए सब दीवाने भी
सबके दिल में घर कर लेता
दुलियाजान बिछाये पलकें
राह उसी की देखा करता


अनिता निहलानी
२१ फरवरी २०१०
दुलियाजान, असम