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शुक्रवार, जुलाई 31

मन के पार

मन के पार 


मन के पार जाना ही होगा 

यदि शुद्ध प्रेम का स्वाद लेना है 

मन दो पर टिका है 

यहाँ घृणा चली आती प्रेम के साथ

शांति के पीछे अशांति 

संत के पीछे असंत 

और हर अपराधी के पीछे 

एक निर्दोष भाव भी !


मन एकांगी नहीं है 

यहाँ द्वैत है 

या कहें द्वैत ही मन है

बह ही नहीं सकती 

दो तटों के बिना नदी मन की ! 


उसके पार केवल एक 

एक अनंत का विस्तार 

जहाँ चीजें बँटी नहीं 

 विशुद्ध प्रेम

और शांति भी भरपूर 

वहाँ दो की छाया भी नहीं 

वहाँ परम स्वीकार है !


मन टुकड़ों में बाँटता है 

टुकड़ा-टुकड़ा प्रेम 

नहीं दिया जाता ईश को 

यहाँ तो पूरा का पूरा ही 

देना होता है स्वयं को ! 

 

बुधवार, मई 20

चंदा की आभा में कैसा यह हास जगा

चंदा की आभा में कैसा यह हास जगा

 

 

मानस की घाटी में, श्रद्धा का बीज गिरा

मनीषा  की डाली पर, शांति का पुष्प उगा,

अंतर की सुरभि से, जीवन का ढंग महका

रिस-रिस कर प्रेम बहा, अधरों से हास पगा !

 

कण-कण में आस जगी, नयन में उजास भरा

हुलसा है पोर-पोर, उर मनहर गीत जगा,

बाहर इक लय बिखरी, जीवन संगीत बहा

कदमों में थिरकन भर, गह्वर में नृत्य जगा !

 

मुस्काई हर धड़कन, लहराया जब यौवन

अपने ही आंगन में, प्रियतम का द्वार खुला,

लहरों सी बन पुलकन, उसकी ही बात कहे

बिन बोले सब कह दे, अद्भुत यह राग उठा !

 

हँसता है हर पल वह, सूरज की किरणों में

चंदा की आभा में, कैसा यह हास जगा,

पल-पल वह सँग अपने, सुंदर यह भाग जगा

देखो यह मस्ती का, भीतर है फाग जगा !

 

युग-युग से प्यासी थी, धरती का भाग उगा

सरसी बगिया मन की, जीवन में तोष जगा,

वह है, वह अपना है, रह-रह कहता कोई 

सोया था जो कब से, मंजर वह आज जगा !

 

बुधवार, मार्च 11

आदमी

आदमी

 कली क्या करती है फूल बनने के लिए

विशालकाय हाथी ने क्या किया

निज आकार हेतु

व्हेल तैरती है जल में टनों भार लिए

वृक्ष छूने लगते हैं गगन अनायास

आदमी क्यों बौना हुआ है

शांति का झण्डा उठाए

युद्ध की रणभेरी बजाता है

न्याय पर आसीन हुआ

अन्याय को पोषित करता है

अन्न से भरे हैं भंडार चूहों के लिए

भूखों को मरने देता है

पूरब पश्चिम और पश्चिम पूरब की तरफ भागता है

शब्दों का मरहम बन सकता था उन्हें हथियार बनाता है

एक मन को अपने ही दूसरे मन से लड़वाता है

लहूलुहान होता फिर भी देख नहीं पाता है

यह अनंत साम्राज्य जिसका है

वह बिना कुछ किए ही कैसे विराट हुआ जाता है


सोमवार, मार्च 9

शांति कमल कैसे खिल जाते

शांति कमल कैसे खिल जाते  

सजग रहेगा सदा जगत में 

जगा हुआ मन अपने भीतर, 

बाहर जागा कब सो जाये 

 रहती उसको यह कहाँ खबर ! 


भान नहीं अपने होने का 

तंद्रा, निद्रा में खोया है, 

सपनों में ही हर्ष मनाता 

हर दुख सपनों में बोया है !  


छवियाँ गढ़ लीं थीं अनजाने 

जिनको सत्य मानकर जीता, 

अमृत समझ के विष की बूँदें 

कितने अरमानों से पीता ! 


रण के बादल घिर आये फिर 

इसकी ही तैयारी की थी, 

 शांति कमल कैसे खिल जाते  

पीड़ा से ही यारी की थी !



सोमवार, दिसंबर 1

शांति सरवर मन बने

शांति सरवर मन बने



शांत मन ही ध्यान है 

ईश का वरदान है, 

सिंधु की गहराइयाँ 

अनंत की उड़ान है !


आत्मा के द्वार पर 

ध्यान का हीरा जड़ें,

ईश चरणों  में रखी  

भाग्य रेखा ख़ुद पढ़ें !


 जले भीतर ज्ञान अग्नि

 शांति सरवर मन बने,

अवधान उपज प्रेम से, 

कर्म को नव दिशा दे !


लौट आये उर सदन 

ऊर्ध्वगामी गति मिले,  

टूट जायें सब हदें 

फूल अनहद के खिलें !  


शुक्रवार, नवंबर 7

अँधेरा और प्रकाश

अँधेरा और प्रकाश  


अंधेरे में बदल जाती हैं चीजें 

जो है 

वह नहीं दिखायी देता 

जो नहीं है 

वह नयी शक्लें धर लेता है 

अंधेरा भय जगाता है 

अंधेरा बाहर का हो या भीतर का 

परिणाम वही रहता है 

देख सके जो पार अंधेरे के 

ऐसी आँख जगानी है 

प्रकाश की एक नन्ही सी किरण 

उस पार से लानी है 

कितना भी बड़ा हो अँधेरा 

मिट जाएगा 

शांति और मौन की तरह 

छुपा प्रकाश बाहर आयेगा 

तब ज्ञात होगा

जो है 

वही तो प्रकट हो रहा है 

भीतर अज्ञान है 

तो मोह, क्रोध और भय की बेलें पनपेंगी 

कभी शोक सताएगा 

कभी घेर लेगा विषाद 

भीतर ज्ञान है 

तो आनंद की फसल लहलहायेगी !

किंतु जो मूल में है 

अंततः वही बच जाता है 

जो ओढ़ा हुआ है 

वह एक न एक दिन

 झर जाता है  

ओढ़ा हुआ अज्ञान 

भी उतर जाएगा 

और उस दिन 

जीवन पूरी तरह मुस्कुरायेगा !

शुक्रवार, अक्टूबर 3

तू ही भरे रंग माया के

तू ही भरे रंग माया के


भाव सभी अर्पित करते हैं 

प्रेम और करुणा जो तुझसे, 

पल-पल इस जग में झरते हैं 

कष्ट हमारा हर हरते हैं !


मधुर तृप्ति का भाव जगा जो 

अतृप्ति का भी घाव लगा जो, 

चैन और बेचैनी उर की 

तेरे चरणों पर रखते हैं !


शांति औ' आनंद की मूरत 

देवी ! तू अज्ञान को हरे, 

तू ही भरे रंग माया के

हर वर माथे पर धरते हैं !


जगे परम स्वीकार ह्रदय में 

विश्रांति मिल जाये चरण में, 

मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार में 

ध्यान सदा तेरा करते हैं ! 


देवी ! तेरे रूप हज़ारों 

कथा अनेकों, नाम हज़ारों, 

किस-किस को जाने यह लघु मन 

तुझमें ही जीते मरते हैं !



सोमवार, जुलाई 28

अंश

अंश 

सुबह-सुबह जगाया उसने 

कोमलता से, 

छूकर मस्तक को,

जैसे माँ जगाती है 

अनंत प्रेम भरे अपने भीतर 

याद दिलाने, तुम कौन हो ?

उसी के एक अंश 

उसके  प्रिय और शक्ति से भरे  

बन सकते हो, जो चाहो 

रास्ता खुला है, 

जिस पर चला जा सकता है 

 ऊपर से बहती शांति की धारा को 

धारण करना है 

जिसकी किरणें छू रही हैं

 मन का पोर-पोर 

अंतर के मंदिर में 

अनसुने घंटनाद होते हैं 

  जलती है ज्योति

  बिन बाती बिन तेल 

हो तुम चेतन 

इस तरह, कि अंश हो

उसी अनंत का !


बुधवार, फ़रवरी 12

जीवन स्रोत

जीवन स्रोत 


उस भूमि पर टिकना होगा 

जहाँ प्रेम कुसुमों की गंध भरे भीतर 

 सत्य की फसल उगती है 

जहां अभेद के तट हैं 

शांति की नदी बहती है 

जब जगत में विचरने की बारी  आये 

तब भी उस भूमि की याद मिटने न पाये 

जहां एकत्व है और स्वतंत्रता 

अटूट शाश्वत समता 

जो अर्जित की गई है 

पूर्णता की धारा से 

जहाँ आश्रय मिलता है 

हर तुच्छता की कारा से 

वहीं ठिकाना हो सदा मन का 

जो स्रोत है हर जीवन का ! 



रविवार, नवंबर 3

शांतता

शांतता 


आज हम थे और सन्नाटा था 

सन्नाटा ! जो चारों और फैला था 

बहा आ रहा था न जाने कहाँ से 

अंतरिक्ष भी छोटा पड़ गया था जैसे 

शायद अनंत की बाहों से झरता था !


आज मौन था और थी चुप्पी घनी 

सब सुन लिया जबकि 

कोई कुछ कहता न था 

कैसी शांति और निस्तब्धता थी उस घड़ी 

जैसे श्वास भी आने से कंपता था!


 कोई बसता है उस नीरवता में भी

उससे मिलना हो तो चुप को ओढ़ना होगा 

छोड़कर सारी चहल-पहल रस्तों की 

मन को खामोशी में इंतज़ार करना होगा 

यह जो आदत है पुरानी उसकी 

बेवजह शोर मचाने की 

छोड़ कर बैठ रहे पल दो पल 

 उस एकांत से मिल पायेगा तभी !


रविवार, अक्टूबर 20

यात्रा

यात्रा 


मन के पार

एक अजाना लोक छिपा है 

 जहाँ से रह-रह कर 

आहट आती है शांति की 

गूँज सुनायी देती है 

किसी अन्य काल की 

यात्री को आगे बढ़ना है 

और आगे 

जिसने अनंत को चुन लिया 

फिर विश्राम कैसा 

स्वयं के अप्रतिम रूप से 

अपरिचय कैसा 

अपने घर लौटने में संकोच कैसा 

सहेजने में अपनी विरासत को 

गुरेज़ कैसा 

माँ के चरणों में बैठने से 

हम क्यों चूक जायें 

पिता के स्नेह पर हम क्यों न

अपना अधिकार जतायें 

जो शाश्वत है उससे क्यों न नाता जोड़ें 

माया में बंधकर ख़ुद से मुख मोड़ें 

अनमोल हीरे हमने छिपाये है 

व्यर्थ पत्थरों को ख़रीद लाये हैं 

जब जागो, तभी सवेरा है 

उस का तो लगता हर घड़ी फेरा है !