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बुधवार, नवंबर 15

अभी समय है नजर मिलाएं


 अभी समय है नजर मिलाएं


नया वर्ष आने से पहले
नूतन मन का निर्माण करें,
नया जोश, नव बोध भरे उर
नये युग का आह्वान करें !

अभी समय है नजर मिलाएं
स्वयं, स्वयं को जाँचें परखे,
झाड़ सिलवटों को आंचल से
नयी दृष्टि से जग को निरखे !

रंजिश नहीं हो जिस दृष्टि में
नहीं भेद कुछ भले-बुरे का,
निर्मल आज नजर जो आता
कल तक वह धूमिल हो जाता !

पल-पल बदल रही है जगती
नश्वरता को कभी न भूलें,
मन उपवन हो रिक्त भूत से
भावी हित मन माटी जोतें !

कर डालीं थी कल जो भूलें
उनकी जड़ें मिटा दें उर से,
नव पौध प्रज्ञा की उगायें
नव चिंतन से सिंचन कर के !

बने-बनाये राजपथ छोड़
नूतन राहों का सृजन करे,
नया दौर बस आने को है
मन शुभता का ही वरण करे !

मंगलवार, दिसंबर 24

नया वर्ष आने वाला है




नया वर्ष आने वाला है  

धरती ने की पूर्ण सूर्य की
इक परिक्रमा देखो और,
बीत गयीं कुछ अमावसें व
जगीं पूर्णिमाओं की भोर !

पुनः ली करवट ऋतु चक्र ने
सहज पुकारे है जीवन,
हुई शोख रंगत फूलों की
सुन भ्रमरों की बढ़ती गुंजन !

अनल गगन की नव रश्मि से
हम भी तो भीतर सुलगा लें,
भरकर भीतर नई ऊष्मा
कुहरा मन का छंट जाने दें !

करें पूर्ण जो रहा अधूरा
जो छूटे संग उन्हें ले लें,
धूल सा झाड़ें जो अनचाहा
तज अतीत हल्के हो लें !

उम्मीदों की धूप जगाएं
ख्वाब भरें सूनी आँखों में,
रब ने दी जिन्दगी जिनको
न्याय मांगते पर राहों में !

प्रेम जग दिलों में उनके 
लोभ, स्वार्थ जहाँ है भारी,
नये वर्ष में यही प्रार्थना,
कोई न भूखा, न लाचारी !

नहीं घुले जहर मिट्टी में
हों निर्मल नदियों के जल,
शुद्ध हवाएं, कटें न जंगल
तंग न हो किसी का दिल !

बेवजह गमजदा आदमी
जागे वह खुद को पहचाने,
नहीं गुलामी करे किसी की
आजादी का सुख भी जाने !

एक नयी आस्था भीतर  
जीवन का आधार बने,
जीत सत्य की ही होगी
पुनः यही हुंकार उठे !

भय से नहीं प्रेम से जोड़ें
शुभ संस्कृतियाँ पुनः खिलें,
नया वर्ष आने वाला है  
खुशियों की सौगात मिले !

बुधवार, जून 15

रोज नया सूरज उगता है


रोज नया सूरज उगता है

प्रतिक्षण नूतन जल ले आती
नदिया रोज नयी होती है,
सदा प्रवाहित अंतर्मन भी  
नव पल्लव सा खिल उठता है !

रोज नया सूरज उगता है
रात्रि नया सवेरा लाए,
नयी सुरभि किसलय ले आते
 ताजा गीत कवि लिख लाए !

बासी मन क्यों लिये घूमते
ज्ञान नया होता है प्रतिदिन,
बासी हर विचार त्याग दें
बासी फूल न होते अर्पण !

छोड़ भूत की कल्मष कटुता
बढ़ आगे नव भाव जगाएं,
नई कल्पना के प्रेम में
पड़ कर नित नूतन हो जाएँ !

कथनी से करनी दुगनी हो
जिह्वा एक, दो कर दे डाले,
नया-नया निर्माण करें नित
फिर उसके चरणों में डालें !

पिटी-पिटाई बात न हो अब  
साहस का हम सँग करें
छोड़ लकीरों को पीछे फिर  
नित नयी मंजिलें तय करें !
अनिता निहालानी
१६ जून २०००