बुधवार, जून 23

कुसुमित हुआ हो जैसे बीज


कुसुमित हुआ हो जैसे बीज

एक ऊर्जा है अनाम जो
खींच रही सदा अपनी ओर,
पता ठिकाना कौन जानता  
जिगर दीवाना जिसका मोर !

प्रेम उमगता भीतर आता
कहाँ से ? यही खबर न मिलती,
जिसकी तरफ उमड़ती धारा
जरा भनक ना उसकी पड़ती !

हृदय पिघलकर बहता जाता
राहें नहीं नजर आती है,
‘मैं’ खोया अशेष ‘वह’ कैसे
उसकी छाया मिट जाती है !

कण-कण में मधु बिखरा जिसका
कैसे एक दिगंत समाए,
हर इक घड़ी अमी बन जाती 
मिटकर ही अनंत को पाए !

तृप्त हुआ फिर डोले उर यह
कुसुमित हुआ हो जैसे बीज,
मंजिल पर ज्यों राह आ मिली
छूट गयी पथ-सफ़र की प्रीत !


सोमवार, जून 21

धरती, सागर, नीलगगन में

धरती, सागर, नीलगगन में 


सत्यम,  शिवम, सुंदरम तीनों 

झलक रहे यदि अंतर्मन में, 

बाहर वही नजर आएँगे 

धरती, सागर, नीलगगन में !


सत्यनिष्ठ उर तीव्र संकल्प 

बन शंकर सम करे कल्याण, 

सुंदरता का बोध अनूठा 

जगा दे जड़-चेतन में प्राण !


कुदरत भी अनुकूल हो रहे 

अंतर अगर सजग हो जाये, 

हर दूरी तज स्वजन बना ले 

दोनों एक साथ सरसायें !


अंतर्मन हो सदा प्रतिफलित 

बाहर सहज सृष्टि बन जाता,

उहापोह हर द्वंद्व मनस का 

जग में कोलाहल बन जाता !


 

शुक्रवार, जून 18

प्रकृति के कुछ रंग

प्रकृति के कुछ रंग

अपने–अपने घरों में कैद

खुद से बतियाते

अपने इर्दगिर्द ब्रह्मांड रचने वाले लोग

क्या जानें कि नदी क्यों बहती है

दूर बीहड़ रास्तों से आ

ठंडे पानी को अपने अंक में समेटे

तटों को भिगोती, धरा को ठंडक

पहुंचाती चली जाती है

क्यों सूरज बालू को सतरंगी बनाता

नदी की गोद से उछल कर शाम ढले उसी में सो जाता है

आकाश झांकता निज प्रतिबिम्ब देखने

संवारते नदी के शीशे में वृक्ष भी अपना अक्स

सदियों से सर्द हुआ मन

धूप की गर्माहट पा पिघल कर

बहने लगता है नदी की धारा के साथ

बर्फ की चादर से ढका धरा का कोना

जैसे सुगबुगा कर खोल दे अपनी आँखें

नन्हे नन्हे पौधों की शक्ल में

मन की बंजर धरती पर भी गुनगुनी धूप

की गर्माहट पाकर गीतों के पौधों उग आते

हल्की सी सर्द हवा का झोंका घास को लहराता हुआ सा

जब निकल जाये

तो गीतों के पंछी मन के आंगन से उड़कर

नदी के साथ समुन्दर तक चले जाते

धूप की चादर उतार, शाम की ओढ़नी नदी ओढ़े जब

सिमट आयें अपने-अपने बिछौनों में

अगली सुबह का इंतजार करते कुछ स्वप्न !

 

बुधवार, जून 16

लीला जगत की

लीला जगत की 

अंतर की हर दुविधा को 

जगत ने आधार दिए 

सही सिद्ध करने हर पीड़ा, हर बेचैनी को 

एक नहीं कारण हजार दिए 

फूल झरा असमय जब 

अश्रु नयनों ने बहाये

किसी का कुछ खो गया 

निज अभाव याद आये

बाहर का हर दुःख 

मन के द्वंद्वों को भुलाने का साधन है 

सुख की तलाश का झूठा विज्ञापन है 

 पनप रहीं हैं जब तक

भीतर अशांति की बेलें 

मिल जाते बाहर मचान उधार हैं 

महामारी नहीं तो बाढ़ या कभी सूखा 

फिर महंगाई ! यहाँ समस्याओं का लगा अंबार  है 

पर जब दूर हो जाता है 

अंतर का हर उहापोह 

बाहर लीला ही नजर आती है 

दुनिया किसी पर्दे पर चले रहे खेल जैसी 

कभी हँसाती कभी रुलाती है !





 

सोमवार, जून 14

पूर्ण गगन प्रतिबिम्बित जिसमें

पूर्ण गगन प्रतिबिम्बित जिसमें 


ठहर गया प्रमुदित मन-अंतर

नयन मुंदे, अधर मुस्काते,

परम बुद्ध  की शुभ मूरत पर 

लोग युगों से वारी जाते !


मोहक मुद्रा अभय बरसता 

थिर हो जैसे सर्वर दर्पण, 

पूर्ण गगन प्रतिबिम्बित जिसमें 

चमकें चन्द्र और तारा गण !


मीलों भटक-भटक  राही को 

जैसे कोई ठाँव मिल गया, 

जंगल-जंगल घूम रहा था 

आखिर सुंदर गाँव मिल गया !


क्या पाया जब पूछा जग ने 

बुद्ध हँसे,  कुछ नहीं कमाया, 

बोझ लिए फिरता था मन जो  

एक-एक कर उन्हें बहाया !


है हल्का उर उड़े गगन में 

कभी कोई न तृषा सताये, 

चाह मिटी तो जग पीछे था 

करुणा सहज परम बरसाए !



 

रविवार, जून 13

मंजिल या मंझधार

मंजिल या मझधार 


हम पहुँच ही जाते हैं किनारे पर 

कि कोई लहर बहा ले जाती है 

संग अपने 

और डूबने लगते हैं फिर मझधार में 

न जाने कितनी बार 

यह इतिहास दोहराया गया है 

मंजिल जिसे समझ बैठे थे 

हर बार वह रास्ता ही पाया गया है 

जब अनंत है वह 

तो मंजिल बन भी नहीं सकता 

अनंत ही होंगे उसके ठिकाने 

अनंत की हो तो चाहत मन में 

तभी वह मिलेगा 

जीवन का यह भेद जानकर ही 

मन का कमल खिलेगा 

वह पूर्ण है तो पूर्णता में ही उसे खोजना होगा 

कोई भी अभाव न खले भीतर 

तभी एक क्षण के लिए भी 

वह हाथ नहीं छोड़ेगा !

 

बुधवार, जून 9

नूतन तरु के गात हो रहे

 नूतन तरु के गात हो रहे 

निर्मल गंगाजल से बहते  

तुम ही श्यामल घन बन बरसे, 

चिन्मय ! चेतनता बन रहते 

है कण-कण में गति भी तुमसे !


खो, पुनः-पुनः तुम्हें पाना है 

जैसे दिन और रात हो रहे, 

नित नवीन संबंध जुड़े ज्यों 

 नूतन तरु के गात हो रहे !


शब्दों को आशय तुम देते 

वाणी के तुम संवाहक हो, 

तुम्हीं प्रेरणा लक्ष्य भी तुम्हीं 

शुभता के शाश्वत वाहक हो !


तुम बिन रहे अधूरा सा सब 

जीवन अर्थवान हो तुमसे, 

मननशील हो मानस जिनका 

मनुज वही बन पाते ऐसे !


अनादि -अनंत

अनादि -अनंत 

चाहे कितना भी हो विघटन 

समाज बंटे, टूटे परिवार

व्यक्ति रह जाए अकेला 

पर सदा साथ रहती है उसके 

एक अखंड आत्मा !

चाहे व्यक्तित्व बंटा हो 

मन बिखरा हो 

भीतर भीड़ नज़र आती हो 

पर सदा साथ रहता है एक परमात्मा 

नहीं,  यहाँ कभी कोई हानि नहीं होती 

फूल आज झरता है 

कल एक नयी कली जन्म लेती है 

सभ्यताएँ नष्ट होती हैं 

फिर नई पनपने लगती हैं 

यह एक अनंत प्रक्रिया है 

नहीं, भय की कोई बात नहीं 

हम सदा ही सुरक्षित हाथों में हैं 

ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती न ही पदार्थ 

वे रूप बदलते हैं एक दूसरे में !


सोमवार, जून 7

भाव-अभाव

भाव-अभाव

अभाव का काँटा जब तक चुभता रहेगा उर में 

भाव की धारा क्यों कर बहेगी 

जो ‘नहीं’ है ‘नहीं’ हो रहा है 

उस पर ही नज़र टिकी रही तो 

भय की कारा से छुट्टी क्यों कर मिलेगी 

बाहर ही बाहर यदि मन को लगाया 

तो पीड़ा और संताप दिखेगा 

अंतर गुहा में पल भर बिठाया 

तो श्रद्धा का फूल स्वयं खिलेगा 

खंडित विश्वास, टूटती आस्था की नींव पर 

नहीं टिकती भक्ति की इमारत 

पूर्ण की चाह है तो पूर्ण हो भरोसा 

तभी जीवन में सुरभि भरेगी !


शनिवार, जून 5

अम्बर नीला का नीला है

अम्बर नीला का नीला है 


माना दुःख भारी है जग में 

उर आनंद अनंत छुपा है, 

कितने भी तूफां उठते हों 

अंतर हर तूफ़ां से बड़ा है !


मृत्यु हजारों रूप धरे पर 

जीवन पल-पल प्रकट रहा है, 

क्या बिगाड़ पाएगी उसका 

जो स्वयं मरकर पुनः जगा है !


बादल चाहे घटाटोप हों 

अम्बर नीला का नीला है, 

महल दुमहल धराशायी हों 

भूमिकंप से गगन बचा है !


लहरें लाख उठे सागर में 

सागर से वे बड़ी नहीं हैं, 

विपदाएं हर कदम खड़ी हों  

फिर भी पथ पर अड़ी नहीं हैं !


दुःख काल्पनिक हो सकते हैं 

सुख लेकिन उस परम से आता, 

सत्य वही है सदा टिके जो 

गहन नींद में दुःख न सताता !




 

गुरुवार, जून 3

बिन मांगे, बिना किये मिला

 बिन मांगे, बिना किये मिला 

धरा मिली आकाश भी मिला 

 जन्म-मृत्यु वरदान में मिला, 

माता-पिता का दुलार मिला 

सब कुछ तो हमको यहीं मिला !


शिक्षा पायी, संस्कार मिला 

बचपन, तरुणाई सहज मिली, 

खुद ही आयी प्रौढ़ावस्था 

वृद्ध की फिर काया भी मिली !


क्षुधा जानी, तृष्णा भी मिली 

आँसूं बहे, मुस्कानें मिली,

रिश्ते पनपे, परिवार मिला 

क्या कहें अधिक स्वीकार मिला !


सब कुछ मिलता ही आया है 

हमने अपनी मुहर लगाई, 

अहंकार ही सदा बढ़ाया 

सिर पर गठरी और चढ़ाई !


हो कृतज्ञ बस हल्का हो मन 

शून्य से भरे तन का कण-कण,

जिसने श्वासों का दान दिया  

उस अनंत का पावन सुमिरन ! 


मंगलवार, जून 1

ऐसे ही घट-घट में नटवर

ऐसे ही घट-घट में नटवर

अग्नि काष्ठ में, नीर अनिल में 

प्रस्तर में मूरत इक सुंदर, 

सुरभि पुष्प में रंग गगन में 

ऐसे ही घट-घट में नटवर !


नर्तन कहाँ पृथक नर्तक से 

हरीतिमा नंदन कानन से, 

बसी चाँदनी राकापति में 

ईश्वरत्व भी छुपा जगत में !


दीप की लौ में जो बसा है 

वह प्रकाश चहुँ ओर बिखरता, 

प्रेम, शांति, आनंद की ज्योति 

उस से पाकर जगत सँवरता !


अनुभूति उसी मनभावन की 

अंतर में विश्वास जगाती, 

है कोई अपनों से अपना 

शुभ स्मृति पल-पल राह दिखाती !


जगत की सत्ता जगतपति से 

जिस दिन भीतर राज खुलेगा, 

एक स्वप्न सा है प्रपंच यह 

बरबस ही उर यही कहेगा !