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सोमवार, अगस्त 25

जीवन बीता ही जाता है

जीवन बीता ही जाता है


ज्वालामुखी दबे हैं भीतर 

काश ! हमें सावन मिल जाता, 

रिमझिम-रिमझिम बूँदों से फिर 

अंतर  का उपवन खिल जाता !


बाहर अंबर बरस रहा है 

भू हुलसे पादप हँसता है, 

किंतु गई पीर नहीं मन की 

जीवन बीता ही जाता है !


यूँ तो अंचल में हैं ख़ुशियाँ 

कोई कहीं अभाव नहीं है, 

लेकिन फिर भी उर के भीतर 

कान्हा वाला भाव नहीं है !


काव्यकला में ह्रदय न डूबे 

मोबाइल से नज़र न हटती, 

फ़ुरसत कहाँ घड़ी भर उसको 

हर द्वारे से दुनिया आती !


कैसे अंतर रस में भीगे 

कैसे सावन की रुत भाये, 

जीवन भी जब फिसला जाता 

मौत का ताँडव यही रचाये !


शनिवार, अप्रैल 8

मिलन

मिलन 

एक कदम बढ़ाओ तो  
वह हज़ार कदमों से चलकर आता है 

आवाज़ लगाने भर की देर है 

भेज देता है देवदूत सा कोई जन 

जिसका सान्निध्य 

शीतल जल और अग्नि एक साथ है 

जो जला डालता है सारे बंधन 

और मिटा देता उनकी राख भी

बहा निर्मल ज्ञान गंगा 

 खिल जाते हैं अंतरउपवन

प्रेम की पूर्णता के रूप में 

 उगता है चाँद

बिखरी है जिसमें

 शरद की ज्योत्सना   

बरसती हैं जल धाराएँ 

 सावन-भादों की 

मानो झर रही हो नभ से शांति और शुभता 

अनंत से मिलन का यही तो परिणाम है 

कि वह हर जगह है 

हिमालय की गुफाओं में ही नहीं 

अंतर गह्वर में भी, क्योंकि 

भीतर ही काशी है भीतर ही कैलाश !


सोमवार, अगस्त 20

पुनः पुनः मिलन घटता है




पुनः पुनः मिलन घटता है



निकट आ सके कोई प्रियतम
तभी दूर जाकर बसता है !

श्वास दूर जा नासापुट से
अगले पल आकर मिलती है,
आज झरी मृत हो जो कलिका
पुनः रूप नया धर खिलती है !

बार–बार घट व्याकुल होकर
पाहुन का रस्ता तकता है,
उस प्रियजन का निशिवासर जो
नयनों में छुपकर हँसता है !

घर से दूर हुए राही को
स्वप्नों में आंगन दिसता है,
मेघ चले जाते बिन बरसे
मरुथल में सावन झरता है !

सोमवार, जुलाई 23

पावन प्रीत पुलक सावन की



पावन प्रीत पुलक सावन की

कितने ही अहसास अनोखे
कितने बिसरे ख्वाब छिपे हैं,
खोल दराजें मन की देखें
अनगिन जहाँ सबाब छिपे हैं !

ऊपर-ऊपर उथला है जल
कदम-कदम पर फिसलन भी है,
नहीं मिला करते हैं मोती
इन परतों में दलदल भी है !

थोड़ा सा खंगालें उर को
जाल बिछाएं भीतर जाकर,
चलें खोजने सीप सुनहरे
नाव उतारें बचपन पाकर !

पावन प्रीत पुलक सावन की
या फिर कोई दीप जला हो,
गहराई में उगता जीवन
नीरव वन में पुहुप खिला हो !

अम्बर से जो नीर बरसता
गहरे जाकर ही उठता है,
कल का सूरज जो लायेगा
वही उजास आज झरता है !  




सोमवार, सितंबर 18

एक कलश मस्ती का जैसे


एक कलश मस्ती का जैसे

बरस रहा सावन मधु बन कर
या मदिर चाँदनी मृगांक की,
एक कलश मस्ती का जैसे
भर सुवास किसी मृदु छंद की !

जीवन बँटता ही जाता है
अमृत का एक स्रोत बह रहा,
लहराता सागर ज्यों नाचे
अंतर में नव राग उमगता !

टूट गयी जब नींद हृदय की
गाठें खुल-खुल कर बिखरी हैं,
एक अजाने सुर को भर कर
चहूँ दिशाएं भी निखरी हैं !

भीतर बाहर एक वही है 
एक ललक ही प्रतिपल महके,
धरती अंबर एक सदा हैं
मुस्काता नभ वसुधा लहके !

मंगलवार, जुलाई 26

ढाई आखर भी पढ़ सकता

ढाई आखर भी पढ़ सकता


उसका होना ही काफी है
शेष सभी कुछ सहज घट रहा,
जितना जिसको भाए ले ले
दिवस रात्रि वह सहज बंट रहा !

स्वर्ण रश्मियाँ बिछी हुई हैं
इन्द्रधनुष कोई गढ़ सकता,
मदिर चन्द्रिमा भी बिखरी है
ढाई आखर भी पढ़ सकता !

बहा जा रहा अमृत सा जल
अंतर में सावन को भर ले,
उड़ा जा रहा पवन गतिमय
चाहे तो हर व्याधि हर ले !

देना जब से भूले हैं हम
लेने की भी रीत छोड़ दी,
अपनी प्रतिमा की खातिर ही
मर्यादा हर एक तोड़ दी !

क्यों न हम भी उसके जैसे
होकर भी ना कुछ हो जाएँ,
एक हुए फिर इस सृष्टि से
बिखरें, बहें और मिट जाएँ !


शुक्रवार, अगस्त 28

राखी का उत्सव



राखी का उत्सव

सावन की पूनम जब आती है
साथ चला आता है
बचपन की यादों का एक हुजूम
नन्हे हाथों में बंधी
सुनहरी चमकदार राखियाँ
और मिठाई से भरे मुँह
उपहार पाकर सजल हुए नेत्र
और मध्य में बहती स्नेह की अविरत धारा
एक बार फिर आया है राखी का त्योहार
लेकर शुभभावनाओं का अम्बार
खुशियाँ भरें आपके जीवन में ये नेह भरे धागे
जीवन का हर क्षण सौभाग्य लिए जागे 

शुक्रवार, अक्टूबर 17

इतनी शिद्दत से जीना होगा



इतनी शिद्दत से जीना होगा

जैसे फूट पडती है कोंपल कोई
सीमेंट की परत को भेदकर
ऊर्जा बही चली आती है जलधार में
चीर कर सीना पर्वतों का
या उमड़-घुमड़ बरसती है बदली सावन की
न कि किसी जलते-बुझते दीप की मानिंद  
या अलसायी सी छिछली नदी की तरह
पड़े रहें और बीत जाये जीवन... का यह क्रम
लिए जाए मृत्यु के द्वार पर
सिर झुकाए खड़े होना पड़े
देवता के चरणों में चढ़ाने लायक
फूल तो बनना ही होगा
इतनी शिद्दत से जीना होगा...


सोमवार, अगस्त 11

याद दिलाता सावन उसकी


याद दिलाता सावन उसकी



नीला नभ जब ढका मेघ से
घोर घटा बन छाया करता,
मधुर स्वरों में दे संदेसे
संग उड़ान पंछी के भरता !

घड़ी-घड़ी वह रब मिलता है
पल-पल हृदय कमल खिलता है,
कभी सिमट आता बूंदों में
बन खग डाल-डाल हिलता है !

बहे चले आता अम्बर से
तिरछी-सीधी जल चादर संग,
नैसर्गिक संगीत बज रहा
 घुंघरू ज्यों बांधे हो छमछम !

अंत न आता दीख रहा है
उस अनंत का कृत्य अनंत,
लाखों धाराएँ बहतीं जब
खो जाते हैं दिग-दिगंत !

हरी घास पर काली मैना
बिछे पुष्प कुछ झरे पवन संग,
याद दिलाता सावन उसकी
श्वेत, पीत फूलों के रंग !


बुधवार, जून 27

जमीन से जुड़े लोग


जमीन से जुड़े लोग

आपके पावों में अभी
चुभा नहीं है कांटा
दर्द आप कैसे जानेंगे
फूंक फूंक कर पीते हैं वे छाछ भी
दूध के जले हैं, इतना तो मानेंगे....

नहीं लगी आग कभी
आलीशान महलों में आपके
फूस की झोंपड़ी थी, जल गयी
बस कहकर यह, लंबी तानेंगे...

पानी बाढ़ का भला, कैसे
करे हिमाकत
चढ़ने की सीढियाँ, महलों की आपके
गाँव के गाँव डूब गए जिसमें
उस सैलाब को
उड़ के आसमां से जानेंगे...

सुलगती रेत में जले नहीं
तलवे जिनके
क्या जानेंगे वे राज माटी का
बरसती आग में न झुलसे तन
बरसते सावन का मजा
खाक जानेंगे...

बारिशें उड़ा ले गयीं न छप्पर जिनका
कैसे भिगोएँगे भला, बादल उनको
उगाते हैं जमीं से जो सोना
पसीने को उन्हीं के, धोयेंगे बादल

कडकती शीत में न कटकटायीं
हाड़ें जिनकी
तपिश अलाव की, न दे पायेगी सुकून
गल न गयीं बर्फ में
 उंगलियाँ जिसकी
क्या कदर होगी गर्म वस्त्रों की उसे...

मुश्किलों से जो दो चार हुआ करते हैं
वही श्वासों की कीमत अदा करते हैं
जमीन से जुड़े हैं जो लोग यहाँ
वही जगत की जीनत बना करते हैं !




रविवार, जुलाई 24

जुड़े मन, जुड़े नयन


सावन

पुलक उठी बादलों में
बूंद बन ढलक गयी,
ताप तप्त वसुंधरा
नीर पा संवर गयी !

दग्ध किया था हिया
पवन वह शरमा गयी,
रूप नया धर लेप
नेह का लगा गयी !

जी उठे तड़ाग, नद
कूप लबालब हुए,
पंछियों के बैन भी
मीत पा थम गए !

खिल उठे बहार बन
झुलस गए थे जो वन,
श्रावण की भेंट पा
जुड़े मन, जुड़े नयन !  



सोमवार, नवंबर 29

बिन बदली बरसे ज्यों सावन

बिन बदली बरसे ज्यों सावन

भीतर ही तो तुम रहते हो
खुद से दूरी क्यों सहते हो,
जल में रहकर क्यों प्यासे हो
स्वयं ही स्वयं को क्यों फांसे हो !

भीतर एक हँसी प्यारी है
खनक न जिसकी सुनी किसी ने,
भीतर एक खुला आकाश
जगमग जलता परम प्रकाश !

खुशी का एक मतवाला सोता
झर-झर झरता बहता जाता,
एक अनोखा है संसार
ईंट ईंट है जिसकी प्यार !

फूट फूट कर बहे उजाला
छलक छलक जाये ज्यों प्याला,
उमग उमग कर फैले सुरभि
दहक दहक जले अंगारा !

ऐसे उसकी स्मृति झलके
तारों भरा नीला आकाश,
बिन बदली बरसे ज्यों सावन
बिन दिनकर होता प्रकाश !

अनिता निहालानी
२९ नवम्बर २०१०