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बुधवार, अप्रैल 22

रहे जागरण भीतर प्रतिपल

रहे जागरण भीतर प्रतिपल

मन उपवन निशदिन सजा रहे

नहीं उग पाए खर-पतवार,

मंजिल की बाधा बन जाये 

जमे न ऐसा कोई विचार !

 

आशा के कुछ पुष्प उगायें, 

पोषण दे, ऐसा ही सोचें,

कंटक चुन-चुन बीनें पथ से, 

सदा अशुभ को बाहर रोकें !

 

प्रज्ञा की सुंदर बेलें  हो, 

दृढ़  इच्छाओं के वृक्ष लगे,

 धार प्रेम की बहती जाये 

मेधा,प्रज्ञा की ज्योति जगे !

 

अपसंस्कृति को प्रश्रय मत  दें 

सुसंस्कृति सदा  फैले-फूले, 

तहस-नहस न कभी हो उपवन 

जीवन सबके निशदिन महकें !

 

नया-नया सा नित विचार हो 

भीतर शुभ ज्ञान  तृषा जागे, 

जिज्ञासा जागृत हो मन में 

मन भय से दूर नहीं भागे !

 

रहे जागरण भीतर प्रतिपल 

प्रतिपल श्रद्धा कर लें अर्जित,

आगे ही आगे बढ़ना है 

भीतर हो अखंड स्मृति वर्धित !


 

शनिवार, अगस्त 31

जागरण

जागरण 


रात ढलने को है 

झूम रहा हर सिंगार हौले-हौले 

बस कुछ ही पल में 

हर पुष्प डाली से झर जाएगा 

श्वेत कोमलता से 

धरा का आँचल भर जाएगा 

कुनमुनाने लगे हैं पंछी बसेरों में 

दूर से आ रही कूक 

सूने पथ पर कदम बढ़ा रहे  

मुँह अंधेरे उठ जाने वाले 

उषा मोहक है 

उसकी हर शै याद दिलाती  

उस जागरण की 

जब चिदाकाश पर उगने को है

आत्मा का सूरज 

कुछ डोलने लगा है भीतर 

और झर गई हैं अंतर्भावनाएँ 

उसके चरणों में 

 गूँजने लगा है कोई गीत

 सहला जाता है अनाम स्पर्श

विरह की अग्नि में तपे उर को 

 भोर की प्रतीक्षा में 

यह अहसास होने लगा है 

एक दिन ऐसी ही होगी 

अंतर भोर !



शुक्रवार, नवंबर 24

स्वप्न और जागरण

स्वप्न और जागरण 

जाग गया जो

वह देख सकता है 

 जूझ रहा है कैसे 

सोया हुआ व्यक्ति

दु:स्वप्नों से !

सुख की चाह की ख़ातिर 

दुख देता है औरों को 

पर बोता है बीज दुख के

 ख़ुद के लिए 

शिशु के रुदन के प्रति भी 

नहीं पिघलता जो दिल 

घिरा नहीं क्या घोर तमस से 

आत्मा का स्पर्श हुए बिना 

सत्य दिखाई नहीं देता 

अभाव और दुखों से जूझते जन 

निज सुख के आगे देख नहीं पाता 

 परम का स्पर्श मिल जाता है जब

करुणा जागती है उसी क्षण

कोई उम्मीद न करे औरों से 

ख़ुदा होने की 

चढ़ाना होगा सूली पर सदा 

ख़ुद को ही 

औरों को न वेदी पर तुम बिठलाओ 

ख़ुद के भीतर ही देवता को पाओ 

ख़ुदा से मिलने की कोई और तो रीत नहीं 

ख़ुद से बढ़कर मिलती कहीं भी प्रीत नहीं 

स्रोत भीतर प्रेम का है 

दिल की राह से जाना होगा 

वहीं से झरती है संग करुणा

 गंगा ज्ञान, भक्ति यमुना 

और कर्म की वरुणा ! 


सोमवार, मार्च 28

स्वप्न और जागरण

स्वप्न और जागरण 

मन केवल नींद में  ही नहीं देखता स्वप्न

दिवा स्वप्न भी होते हैं 

जागती आँखों से देखे गए स्वप्न 

बात यह है कि 

खुद से मिले  बिना नींद खुलती ही नहीं 

या कहें कि खुद से बिछुड़ना 

है एक स्वप्न  

जो हर कोई देख रहा है 

अंतर में जगना जब तक नहीं हुआ 

 सोया ही हुआ है

अर्थात् इस या उस स्वप्न में खोया ही हुआ  है 

हर कोई  निर्माता है

निज सृष्टि का 

 दृष्टिकोण, विचार, मान्यताओं 

और धारणाओं की दीवारों से 

अपना महल सजाता है 

देखकर भी असलियत को 

नज़रें चुराता है 

जो करणीय है वह कल पर टाले जाता है 

हर कोई  क़ैद है 

अपने ही बनाए मायाजाल में

खुद से बिछुड़े हुए हम इक दिन तो जागेंगे 

उस क्षण से पूर्व नहीं हमारे दुःख भागेंगे 

स्वयं की अनंतता का अनुभव ही काम आएगा 

भीतर का प्रकाश ही ज्योति दिखाएगा ! 


मंगलवार, मार्च 8

गीत जागरण का जो गाए

गीत जागरण का जो गाए 


सच की नाव गुरू खेवटिया 

मीरा ने यह गीत सुनाया, 

जो समर्थ वह पार उतारे 

मन यह भेद समझ कब पाया !


डूबा जाए भवसागर में 

लहरों के आँदोलन में घिर, 

उहापोह, उलझन इस उस की 

राज न सीखा हो कैसे थिर !


सुख-दुःख बादल आ ढक लेते 

ज्ञान सूर्य जो भीतर चमके, 

अंधकार ही जाना उसने 

तम की रात घिरी है कब से !


गीत जागरण का जो गाया  

वही प्रीत का सामवेद है, 

सत्य मशाल जले जब भीतर 

शेष नहीं तिलमात्र खेद है !


झर जाता विषाद जीवन से 

अविरत स्नेह बरसता जाए, 

जागे शक्ति सुप्त अंतर की 

करुणा औ'  उल्लास जगाए !


सोमवार, नवंबर 22

खिला-खिला मन उपवन होगा

खिला-खिला मन उपवन होगा 


एक अनेक हुए दिखते हैं 

ज्यों सपने की कोई नगरी, 

मन ही नद, पर्वत बन जाता 

एक चेतना घट-घट बिखरी !


कैसे स्वप्न रात्रि में देखें 

कुछ खुद कुछ अज्ञात तय करे, 

जीवन में भी यही घट रहा 

जगकर देखें कहाँ खो गए !


एक जागरण नित्य प्रातः में 

स्वप्नों से जो मुक्ति दिलाए, 

परम जागरण ऐसा भी है 

जीते जी यह जग खो जाए !


एक तत्व में टिकना हो जब 

जीवन तब क्रीडाँगन होगा, 

अपने हाथों दुःख कब बोए 

खिला-खिला मन उपवन होगा !


जिस क्षण थामी बागडोर निज 

सुख-दुःख की ज़ंजीरें टूटीं, 

इक ही अनुभव व्यापा मन में 

समता उपजी ममता छूटी !



मंगलवार, अक्टूबर 13

उस लोक में

उस लोक में 


जहां आलोक है अहर्निश 

किंतु समय ही नहीं है जहाँ

रात-दिन घटें कैसे ? 

पर शब्दों की सीमा है 

जागरण के उस लोक में 

जहाँ नितांत एकांत है 

और निपट नीरव 

पर जहाँ जाकर ही मिलता है 

मानव को निजता का गौरव 

उस निजता का जिसमें कोई पराया है ही नहीं 

जहाँ हर पेड़-पौधे, हर प्राणी से 

जुड़ जाते हैं अदृश्य तार 

जहां वाणी के बिना ही संदेश 

लिए-दिए जाते हैं 

चेतना का वह प्रकाश ही 

बरस रहा है ज्योत्स्ना में 

जिसे हंस की तरह चुगना होगा 

उस आभा से ही भीतर

मन का आसन बुनना होगा 

जिससे बुनते हैं कबीर झीनी चादर 

जो ज्यों की त्यों रह जाती है 

उस जागरण की याद 

हमें क्यों नहीं सताती है ! 





सोमवार, सितंबर 28

पंख पसार उड़े क्षितिजों तक

 पंख पसार उड़े क्षितिजों तक 

एक जागरण ऐसा भी हो 

खो जाए जब अंतिम तन्द्रा, 

रेशा-रेशा नाचे ऊर्जित 

मिटे युगों की भ्रामक निद्रा !


मन जो सिकुड़ा-सिकुड़ा सा था 

पंख पसार उड़े क्षितिजों तक, 

सारी कायनात भरने फिर 

बाहें फैलें नीलगगन तक !


दूजा नहीं दिखाई देता 

संग पवन के चले डोलते,

चहूँ ओर वसन्त छाया हो 

नयन प्रेम के राज खोलते !


संशय, भ्रम, भय जलें अग्नि में 

अनहद घन मंजीरे बजते,

मानस भू पर बहे प्रीत रस 

थिरकें झूमें पुष्प ख़ुशी के !


एक जागरण ऐसा भी हो 

फिर न कभी मदहोशी घेरे, 

नहीं सताए कोई अभाव 

पलकों में ना स्वप्न अधूरे !


मंगलवार, अगस्त 18

स्वप्न से जागरण तक

 स्वप्न से जागरण तक 

 

स्वप्न अचेतन गढ़ता है 

 है वह आँख जिससे 

झाँका जा सकता है भविष्य में 

वह दर्पण भी, जिसमें, अनजाना रह गया 

खुद से ही 

मन का वह कोना झलकता है !

स्वप्न कहते हैं हमारी अनकही गाथाएं 

भूली-बिसरी पुरातन कथाएं

जिनकी खुटियाँ अब भी गड़ी हैं 

मन के उस अंधकार में  

जहाँ हम जाते नहीं 

जा सकते नहीं 

या जाना चाहते नहीं 

स्वप्न में उभर आती हैं विवशताएँ 

जिन्हें दूर नहीं कर पाया मन 

वे आशाएं, नहीं कर पाया जिन्हें पूर्ण 

स्वप्न को स्वप्न कहकर भूल जाता 

फिर अगली रात वही प्रपंच रचाता 

स्वप्न में ही जागना होगा 

अन्यथा अतीत से सदा भागना होगा 

स्वप्नों के पार ही खुद से मुलाकात होगी 

फिर स्वयं से स्वयं की कुछ बात होगी ! 

 


सोमवार, फ़रवरी 17

सोये हैं हम

सोये हैं हम... 


बस जरा सी बात इतनी 
सुख की चादर ओढ़ मन पर 
खोये हैं हम 
सोये हैं हम !
एक सागर रौशनी का 
पास ही कुछ दूर बहता 
पर तमस का आवरण है 
कह इसे कई बार 
यूँ ही रोये हैं हम…!
नींद में भी जागता मन 
फसल स्वप्नों की उगाता 
जाने कितने बीज ऐसे 
बोये हैं हम !
नींद उसकी जागरण भी 
चंचला मति आवरण भी 
जाग देखें कैसी 
भावना सँजोये हैं हम !

शनिवार, फ़रवरी 23

एक जागरण ऐसा भी हो



एक जागरण ऐसा भी हो


पल में गोचर हो अनंत यह
इक दृष्टिकोण ऐसा भी हो,
जिसकी कोई रात न आये
एक जागरण ऐसा भी हो !

कुदरत निशदिन जाग रही है
अंधकार में बीज पनपते,
गहन भूमि के अंतर में ही
घिसते पत्थर हीरे बनते !

राह मिलेगी उसी कसक से
होश जगाने जो आती है,
धूप घनी, कंटक पथ में जब
एक ऊर्जा जग जाती है !

प्रीत चाहता उर यदि स्वयं तो

अप्रीति के करे न साधन,
मंजिल की हो चाह हृदय में
अम्बर में उड़ने से विकर्षण ?


डोर बँधी पंछी पग में जब
कितनी दूर उड़ान भरेगा,
सुख स्वप्नों में खोया अंतर
दुःख की पीड़ा जाग सहेगा !