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मंगलवार, अप्रैल 7

माना अभी दूर जाना है

माना अभी दूर जाना है


कितनी पूनम जागेंगे हम

कितने सूरज और देखने, 

 छुपा गर्भ में यह भावी के

किंतु सजा सकते हैं सपने !


वर्तमान की कोख से उपज 

कल का वृक्ष अभी नव अंकुर, 

धूप प्रीत की, जल करुणा का 

सहलायेगा संबल देकर !


माना अभी दूर जाना है 

मानव को विकास के क्रम में, 

पल भर भी अब व्यर्थ न जाये 

 लौटे न पीछे किसी भ्रम में !


 द्वार ज्ञान के खुले हुए जब 

क्यों न दौड़ कर कदम बढ़ायें, 

अंधकार में जग यह खोया

दीप जागरण का ले आयें !

 

मंगलवार, फ़रवरी 10

चक्र सृष्टि का

चक्र सृष्टि का 


पाँच बज गये 

भोर हो गई 

धरा के इस भाग ने मुख मोड़ लिया हैं

सूरज की ओर

धीरे-धीरे उजाला होगा 

अलसाये, उनींदे बच्चे जागेंगे 

मंदिरों में शंख व घंट नाद होंगे 

भोर में करेंगे किसान रूख खेतों का 

महिलाएँ चौके का 

और बच्चे स्कूलों का 

धरा और सूरज जब आमने-सामने होंगे 

प्रखर प्रकाश ज़ाहिर कर देगा 

हर कतरा कोना

सब कुछ स्पष्ट नज़र आएगा 

लोग घरों में छुप जाएँगे 

ताप का सामना कौन करे 

सत्य का प्रकाश ऐसा ही होता है 

चमकदार प्रखर तेज 

खिड़कियों पर पर्दे लग जाएँगे 

कड़कती धूप में ख़ाली हो जाएँगीं सड़कें 

धरा फिर घूम  जाएगी जरा

गोधूलि की बेला में 

बगीचे किलकारियों से भर जाएँगे 

जब घूमते-घूमते सूरज से दूर जाएगी 

धुँधलका छायेगा संध्या का 

फिर अंधकार का साम्राज्य और लोग 

घरों में बंद हो नींद के आग़ोश में खो जाएँगे 

यह एक चक्र प्रकृति का 

न जाने कब से चल रहा है 

सूरज और धरती के इस प्रेम में 

हर प्राणी पल रहा है !


बुधवार, नवंबर 27


जो आकाश है 

वही सूरज बन गया है 

जो सूरज है 

वही धरा बना 

जो धरा है वही चाँद 

और सभी निरंतर होना चाहते हैं 

वह, जो थे 

जाना चाहते हैं वहाँ 

जहाँ से आये थे !


आदमी में 

आकाश है परमात्मा 

सूरज - आत्मा 

चाँद - मन और 

धरा है देह 

मन, देह से और 

देह, आत्मा से जुड़ना चाहती है 

आत्मा की चाह है परमात्मा से जुड़ 

आकाश होना 

यही गति जीवन है 

अंततः सभी आकाश हैं 

विस्तीर्ण, अनंत, शून्य आकाश !


शनिवार, अगस्त 31

जागरण

जागरण 


रात ढलने को है 

झूम रहा हर सिंगार हौले-हौले 

बस कुछ ही पल में 

हर पुष्प डाली से झर जाएगा 

श्वेत कोमलता से 

धरा का आँचल भर जाएगा 

कुनमुनाने लगे हैं पंछी बसेरों में 

दूर से आ रही कूक 

सूने पथ पर कदम बढ़ा रहे  

मुँह अंधेरे उठ जाने वाले 

उषा मोहक है 

उसकी हर शै याद दिलाती  

उस जागरण की 

जब चिदाकाश पर उगने को है

आत्मा का सूरज 

कुछ डोलने लगा है भीतर 

और झर गई हैं अंतर्भावनाएँ 

उसके चरणों में 

 गूँजने लगा है कोई गीत

 सहला जाता है अनाम स्पर्श

विरह की अग्नि में तपे उर को 

 भोर की प्रतीक्षा में 

यह अहसास होने लगा है 

एक दिन ऐसी ही होगी 

अंतर भोर !



मंगलवार, मई 28

अंबर पर है सूरज का घर

अंबर पर है सूरज का घर 


उर अंतर लघु पात्र बना है 

सम्मुख विशाल अतीव सागर, 

रह जाता प्यासा का प्यासा 

ख़ाली रहती उर की गागर !


आशाएँ पलती हैं अनगिन 

लेकिन त्याग बहुत छोटा सा,  

अंबर पर है सूरज का घर 

आख़िर कैसे मिलन घटेगा !


 मौन छिपा इक भीतर सबके

बुद्ध विहरते जहाँ रात-दिन,  

हर सीमा मन की टूटेगी 

उगेंगे तुष्टि के नंदन वन !


ख़ुद ही ज्योति पुष्प बनना है

खिलेगा जो शांति सरवर में,

हर दुख बाधा मिट जाएगी 

बढ़ना होगा नयी डगर में !



गुरुवार, अक्टूबर 13

अभय



अभय 


सूरज की एक किरण 

सागर की एक बून्द 

सारी पृथ्वी की धूल का एक कण 

अनंत ध्वनियों में एक स्वर 

हम वही हैं 

पर जब जुड़े हैं स्रोत से 

तो कोई भय नहीं !


शनिवार, जुलाई 23

कहीं धूप खिली कहीं छाया

कहीं धूप खिली कहीं छाया  

 

यहाँ कुछ भी तजने योग्य नहीं 

यह जगत उसी की है माया,  

वह सूरज सा नभ में दमके 

कहीं धूप खिली कहीं छाया !


दोनों का कारण एक वही 

उसका कुछ कारण नहीं मिला, 

वह एक स्वयंभू शिव सम है 

उससे ही उर आनंद खिला !


नाता उससे क्षण भर न मिटे 

इक धारा उसकी ओर बहे, 

उससे ही पूरित हो अंतर 

वाणी नयनों से उसे गहे !


उसी मौन से प्रकटी हर ध्वनि

खग, कोकिल कूक पुकार बनी,

सागर में उठी लहर जैसे 

जल धारे ही पल-पल उठती !


जग नाटक है वह देख रहा 

मन भी उसका ही मीत बने, 

कुछ भी न इसे छू पायेगा 

निर्द्वन्द्व ध्यान से भरा  रहे !


मंगलवार, मार्च 15

कुदरत की होली

कुदरत की होली 


झांको कभी निज नयनों में 

और थोड़ा सा मुस्कुराओ,

रंग भरने हैं अंतर में मोहक यदि  

हाथ कुदरत से अपना मिलाओ !

नीले नभ पर पीला चाँद 

रूपहले सितारों में जगमगाये  

कभी स्याह बादलों में 

इंद्र धनुष भी कौंध अपनी दिखाए !

हरे रंग से रंगी वसुंधरा

जिस पर अनगिन फूल टंके हैं 

ज़रा संभल कर जाना पथ पर

तितलियों के झुंड उड़े हैं !

होली खेलती दिनरात यह कुदरत 

जगाना उल्लास ही इसकी फ़ितरत 

केवल आदमी लड़ाई के बहाने खोजता  

जहाँ रंगों के अंबार लगते

तुच्छ बातों को एक मसला बना लेता  !

रंग सजते बन उमंग जीवन में 

भर जाते तरंग तन और मन में 

अगर रंग भरने हैं सदा के लिए अंतर में 

सहज हर भोर में

संग सूरज के खिलखिलाओ 

हाथ कुदरत से अपना मिलाओ !


गुरुवार, दिसंबर 16

जीवन मिलता है पग-पग पर

जीवन मिलता है पग-पग पर 


एक शृंखला चलती आती 

अंतहीन युग बीत गए हैं, 

इच्छाओं को पूरा करते 

हम खुद से ही रीत गये हैं !


प्रतिबिंबों से आख़िर कब तक 

खुद को कोई बहला सकता, 

सूरज के सम्मुख ना आए 

मन पाखी मरने से डरता !


जीवन मिलता है पग-पग पर 

कब तक रहें गणित में उलझे, 

हर पूजा की क़ीमत चाहें 

दुविधा उर की क्योंकर सुलझे !


धूप, हवा, जल, अम्बर बनकर 

बँटता ही जाता है रहबर, 

आनंदित होते रहते हम 

छोटे से दामन में भरकर !


सोमवार, सितंबर 27

अस्तित्त्व और चेतना

अस्तित्त्व और चेतना 

ज्यों हंस के श्वेत पंखों में 

बसी है धवलता 

हरे-भरे जंगल में रची-बसी हरीतिमा 

जैसे चाँद से पृथक नहीं ज्योत्स्ना 

और सूरज से उसकी गरिमा 

वैसे ही अस्तित्त्व से पृथक नहीं है चेतना 

अग्नि में ताप और प्रकाश की नाईं

शक्ति शिव में समाई 

ज्यों दृष्टि नयनों में बसती है 

मनन मन में 

आकाश से नीलिमा को कैसे पृथक करेंगे 

हिरन से उसकी चपलता 

वैसे ही जगत में है उसकी सत्ता 

लहरें जल से  हैं बनती 

जल क्या नहीं उसकी कृति !


गुरुवार, अगस्त 26

दूर और पास

 दूर और पास 

दूर से सूरज की आभा में 

 नीला पर्वत लग रहा था मोहक 

और उसके नीचे फैला हरा

मैदान बुला रहा था 

पर तपती दोपहरी में 

चला नहीं जाता पर्वत पर 

और मैदान के कंटक पैरों में चुभते थे 

थोड़ी सी दूरी तो चाहिए न 

आकर्षण बनाये रखने के लिए 

नील नभ पर बादल भले लगते हैं 

पर फट कर आंगन में गिर जाएँ तो दुःख देते हैं 

बच्चा नहीं जानता वह माँ के निकट है 

अलिप्त है सो सुंदर है उनके मध्य बहता प्रेम 

ज्यादा निकटता

कुरूपता को जन्म दे सकती है 

मान लेना ही काफी है 

 ‘वह’ सदा हमारे साथ है 

शायद उससे दूरी ही 

उसके प्रति प्रेम को बनाये रखती है ! 


शुक्रवार, जून 18

प्रकृति के कुछ रंग

प्रकृति के कुछ रंग

अपने–अपने घरों में कैद

खुद से बतियाते

अपने इर्दगिर्द ब्रह्मांड रचने वाले लोग

क्या जानें कि नदी क्यों बहती है

दूर बीहड़ रास्तों से आ

ठंडे पानी को अपने अंक में समेटे

तटों को भिगोती, धरा को ठंडक

पहुंचाती चली जाती है

क्यों सूरज बालू को सतरंगी बनाता

नदी की गोद से उछल कर शाम ढले उसी में सो जाता है

आकाश झांकता निज प्रतिबिम्ब देखने

संवारते नदी के शीशे में वृक्ष भी अपना अक्स

सदियों से सर्द हुआ मन

धूप की गर्माहट पा पिघल कर

बहने लगता है नदी की धारा के साथ

बर्फ की चादर से ढका धरा का कोना

जैसे सुगबुगा कर खोल दे अपनी आँखें

नन्हे नन्हे पौधों की शक्ल में

मन की बंजर धरती पर भी गुनगुनी धूप

की गर्माहट पाकर गीतों के पौधों उग आते

हल्की सी सर्द हवा का झोंका घास को लहराता हुआ सा

जब निकल जाये

तो गीतों के पंछी मन के आंगन से उड़कर

नदी के साथ समुन्दर तक चले जाते

धूप की चादर उतार, शाम की ओढ़नी नदी ओढ़े जब

सिमट आयें अपने-अपने बिछौनों में

अगली सुबह का इंतजार करते कुछ स्वप्न !