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गुरुवार, मई 21

असली घर है रिक्त आकाश

असली घर है रिक्त आकाश



घर की चिंता करते करते 

समय और शक्तियाँ लगायी, 

साथ नहीं जाने वाला है 

धोखा देगा, पड़े सुनायी !


दीवारों से नहीं बना है 

असली घर है रिक्त आकाश, 

वातावरण विशुद्ध बना लें 

अंतर से उमड़ पड़े प्रकाश !


वायु शुद्ध हो, प्राण शुद्ध हों 

भाव विमल मुस्कान सजीली, 

घर के भीतर रहने वाला 

हर इक छेड़े तान सुरीली !


प्रेम बहे कोई द्वन्द्व न हो 

जीवन इक वरदान बनेगा, 

पलकों में शुभ स्वप्न सजेंगे 

सम्मुख वही अनाम रहेगा !

 

सोमवार, मार्च 16

जहाँ खुला आकाश मात्र था

जहाँ खुला आकाश मात्र था 


भ्रम के कितने सर्प पल रहे 

मानव को ख़ुद ही डसते हैं, 

 लगती होड़ सुपर होने की 

अहंकारी मुल्क भिड़ते हैं !


जहाँ खुला आकाश मात्र था 

मानव ने दीवारें गढ़ लीं, 

सीमाओं में बाँधा मन को 

जहाँ प्रेम था, हिंसा पढ़ ली ! 


पक्की, मोटी, दृढ़ दीवारें 

मान्यताओं, पूर्वाग्रहों की, 

कोई इन्हें तोड़ने निकले 

झर जाएँगी भुर भुर करतीं !


जो जैसा है, वैसा ही है 

होड़ छोड़ ख़ुद में टिक जाये, 

 तोड़ रहा जो सूत्र प्रेम का 

जोड़, मोड़ से वापस आये ! 


बुधवार, जनवरी 28

समुद्री यात्रा

समुद्री यात्रा


समुन्दर की असंख्य लहरों पर 

डोलती, झूमता हुआ मस्त खटोले सी 

बढ़ता जाता है जहाज 

आकाश और समुंदर जहाँ मिलते हैं 

क्षितिज पर धूमिल हो गया है भेद 

आकाश छू रहा है लहरों को 

या लहरें उठती चली गई हैं उस तक 

सर्पिली लहरें फेन बनाती हुई नाच रही हैं 

जो बिखर जाता है पल भर में 

जीवन की नश्वरता का बोध कराता हुआ 

 शाश्वत है जल पर लहरें नश्वर 

ज्यों शाश्वत है जीवन, जगत नश्वर 

सामने बिछी है जल की अनंत राशि 

 आह्लादित हैं सैकड़ों दिल जिसे निहार

 संजो रहे हैं मनों में 

यह अनुभव शायद पहली बार !



बुधवार, अगस्त 13

प्रकृति के सान्निध्य में

प्रकृति के सान्निध्य में 

भोर की सैर 


श्रावण पूर्णिमा की सुहानी भोर 

 छाये आकाश पर बादल चहूँ ओर 

प्रकृति प्रेमी एक छोटे से समूह ने 

कब्बन पार्क में एक साथ कदम बढ़ाये 

जो दिल में एक नये अनुभव का 

सपना संजोकर थे आये !


हरियाली से भरे झुरमुट 

और पंछियों के कलरव में 

एक सुंदर कविता से आगाज़ हुआ 

हर दिल में सुकून जागा 

और कुदरत के साथ होने का अहसास हुआ ! 


सम्मुख था आस्ट्रेलियन पाम

जिसे कैप्टन कुक पाइन ट्री भी कहते हैं 

जो झुक जाते हैं भूमध्य रेखा की ओर 

दुनिया में चाहे कहीं भी रहते हैं 

हर किसी ने जब उसके तने को छुआ था

शायद उस पल में  

एक अनजाना सा रिश्ता उससे बन गया था !


फिर बारी आयी आकाश मल्लिका की 

जिसकी भीनी ख़ुशबू से सारा आलम महका था !


वृक्षों में मैं पीपल हूँ, कृष्ण ने कहा था 

इसके नीचे ही बुद्ध को ज्ञान हुआ था 

पीपल में इतिहास और पुराण छिपे हैं 

बरगद के पैर चारों दिशाओं में बढ़े हैं 

घेर लेता यह भूमि को, अपनी जटाओं से 

कभी उग जाता किसी अन्य पेड़ की शाखाओं पे 

मिट जाता शरण देने वाला 

बस जाता मेहमान

बनियों की बैठकें 

हुआ करती रही होंगी इसके नीचे 

तभी नाम पाया है बैनियान !


ब्रह्मा ने किया था विश्राम 

सट शाल्मली के तने से, 

सेमल की कोमल रूई का 

जन्मदाता है ये !


जलीय भूमि के पौधों की दुनिया अलग थी 

हरियाली चप्पे-चप्पे पर 

जल को ढके थी !


चीटियों के घोसलें शाख़ों पर लगे देखे 

जब रोमांच से भरे उनके किस्से सुने 

 अनोखे राज जाने तब कुदरत के !


अरबों वर्ष पुरानी चट्टानें भी वहाँ हैं 

डायनासोर के विलुप्त होने की जो गवाह हैं 

श्वेत मकड़ियाँ श्वेत तने पर 

नज़र नहीं आती हैं 

शायद इस तरह शिकार होने से

 ख़ुद को बचाती हैं 

वृक्षों और कीटों का संसार निराला है 

जिसने जरा झाँका इसके भीतर 

मन में हुआ ज्ञान का उजाला है ! 


बुधवार, नवंबर 27


जो आकाश है 

वही सूरज बन गया है 

जो सूरज है 

वही धरा बना 

जो धरा है वही चाँद 

और सभी निरंतर होना चाहते हैं 

वह, जो थे 

जाना चाहते हैं वहाँ 

जहाँ से आये थे !


आदमी में 

आकाश है परमात्मा 

सूरज - आत्मा 

चाँद - मन और 

धरा है देह 

मन, देह से और 

देह, आत्मा से जुड़ना चाहती है 

आत्मा की चाह है परमात्मा से जुड़ 

आकाश होना 

यही गति जीवन है 

अंततः सभी आकाश हैं 

विस्तीर्ण, अनंत, शून्य आकाश !


शुक्रवार, मार्च 17

रिक्तता


रिक्तता 

जब ख़ाली हो मन का आकाश 

तो कोई राजहंस तिरता है

उसमें हौले-हौले 

नील निरभ्र आकाश में वह श्वेत बादल सा हंस 

जिसके पंखों की श्वेत आभा  

पथ को रोशन करती है 

जीवन में उजास भरती है 


जब ख़ाली हो मन का आकाश 

तो वंशी की धुन गूँजती है 

मद्धिम-मद्धिम 

खुले अंबर में वह प्यारी सी तान 

आह्लादित करती मन प्राण 

हृदय में विश्वास भरती है 


जब न रहे कोई दूसरा 

तो रस की एक धार बही आती है 

मंद-मंद हवा के झोंकों सी 

देखते-देखते 

सारे जग में छा जाती है ! 


बुधवार, जून 1

पल पल इसको वही निखारे

पल पल इसको वही निखारे

दी उसने ही पीर प्रेम की 

दिलों में भर देता विश्वास, 

उड़ने को दो पंख दिए हैं

दिया अपार  अनंत आकाश !


वही बढ़ाये इन कदमों को 

नित रचता नूतन राहों को, 

लघुता झरी ज्यों बासी फूल 

सदा जगाया शुभ चाहों को !


कूके जो कोकिल कंठों से 

महक रहा सुंदर फूलों में, 

उससे ही यह विश्व सजा है 

सीख छिपी शायद शूलों में !


कोई भूला उसे न जाने 

दुःख अपने ही हाथों बोता, 

केवल निज सत्ता पहचाने 

नित दामन अश्रु से भिगोता !


स्वामी है जो सकल जहाँ का 

उसकी जय में खुद की जय है,

नाम सदा उसका ही लेना

उस संग हर कोई अजय है !


वही गगन, जल, अगन बना है वही हवा, धरती बन धारे, उसने ही यह खेल रचाया पल पल इसको वही निखारे !


हम उसके बनकर जब रहते 

सहज पुलक  में भीगा करते, 

उसकी मस्ती की गागर से  

छक-छक कर मृदु हाला पीते !


सोमवार, सितंबर 27

अस्तित्त्व और चेतना

अस्तित्त्व और चेतना 

ज्यों हंस के श्वेत पंखों में 

बसी है धवलता 

हरे-भरे जंगल में रची-बसी हरीतिमा 

जैसे चाँद से पृथक नहीं ज्योत्स्ना 

और सूरज से उसकी गरिमा 

वैसे ही अस्तित्त्व से पृथक नहीं है चेतना 

अग्नि में ताप और प्रकाश की नाईं

शक्ति शिव में समाई 

ज्यों दृष्टि नयनों में बसती है 

मनन मन में 

आकाश से नीलिमा को कैसे पृथक करेंगे 

हिरन से उसकी चपलता 

वैसे ही जगत में है उसकी सत्ता 

लहरें जल से  हैं बनती 

जल क्या नहीं उसकी कृति !


मंगलवार, जुलाई 27

अस्तित्त्व

अस्तित्त्व 

जब अंतर झुका हो 

तब अस्तित्त्व बरस ही जाता है 

कुछ नहीं चाहिए जब 

तब सब कुछ अपनत्व की 

डोर से बंध जाता है 

कदमों को धरा का परस

माँ की गोद सा लगता 

सिर पर आकाश का साया 

पिता के मोद सा 

हवा मित्र बनकर सदा साथ है 

जल मन सा बहता भीतर 

अनल प्रेम की सुवास है 

हर घड़ी कोई आसपास है  

जब अनंत का स्पर्श किया जा सकता हो 

तो कोई क्यों बंधन सहे 

जब अनायास ही बरसता हो आनंद 

तो क्यों कोई क्रंदन बहे 

बस जाग कर देखना ही तो है 

स्वप्न में जी रहे नयनों को  

अपना मुख मोड़ना ही तो है 


शुक्रवार, जून 18

प्रकृति के कुछ रंग

प्रकृति के कुछ रंग

अपने–अपने घरों में कैद

खुद से बतियाते

अपने इर्दगिर्द ब्रह्मांड रचने वाले लोग

क्या जानें कि नदी क्यों बहती है

दूर बीहड़ रास्तों से आ

ठंडे पानी को अपने अंक में समेटे

तटों को भिगोती, धरा को ठंडक

पहुंचाती चली जाती है

क्यों सूरज बालू को सतरंगी बनाता

नदी की गोद से उछल कर शाम ढले उसी में सो जाता है

आकाश झांकता निज प्रतिबिम्ब देखने

संवारते नदी के शीशे में वृक्ष भी अपना अक्स

सदियों से सर्द हुआ मन

धूप की गर्माहट पा पिघल कर

बहने लगता है नदी की धारा के साथ

बर्फ की चादर से ढका धरा का कोना

जैसे सुगबुगा कर खोल दे अपनी आँखें

नन्हे नन्हे पौधों की शक्ल में

मन की बंजर धरती पर भी गुनगुनी धूप

की गर्माहट पाकर गीतों के पौधों उग आते

हल्की सी सर्द हवा का झोंका घास को लहराता हुआ सा

जब निकल जाये

तो गीतों के पंछी मन के आंगन से उड़कर

नदी के साथ समुन्दर तक चले जाते

धूप की चादर उतार, शाम की ओढ़नी नदी ओढ़े जब

सिमट आयें अपने-अपने बिछौनों में

अगली सुबह का इंतजार करते कुछ स्वप्न !