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बुधवार, जून 3

सीधे सच्चे - कुछ दोहे



सीधे सच्चे - कुछ दोहे


जीवन इक पहेली है,  बूझ ले सो ज्ञानी

सपनों सा संसार है, आँख खुलते फानी

 

हवा, धूप, माटी, गगन,  या अनल की मूरत

अंतर में जो झांक ले, दिखती वही सूरत

 

चिंता, लालच, डाह, मोह, मन के ये विकार 

तज कर उस की शरण ले, उतरे सागर पार

 

बीता जो वह कब रहा, भावी से अनजान

जो पल अपने सामने, उसकी कीमत जान

 

यह जग एक सराय है, पक्का नहीं मुकाम

आना-जाना अटल है, रहने का ना काम

 

सूरज, धरती से मिला, रश्मि कर फैलाये

वसुधा कातर प्रेम से, अश्रु ओस बहाए 


गुरुवार, मई 14

सागर सी आत्मा

सागर सी आत्मा 


दिन-रात 

सागर में लहरें उठती हैं 

फेन, बुदबुदे, तरंगें 

सभी तो जल हैं !

आत्मसिन्धु में वृत्तियाँ 

भाव, विचार, कल्पनाएँ 

सभी तो ऊर्जा हैं !!


सागर अपनी गरिमा में रहता है 

जल भी तत्वतः वैसा का वैसा, 

आत्मा स्वयं में प्रतिष्ठित 

ऊर्जा अपरिवर्तित ।


लहरें बाहर से नहीं आयी 

सागर का ही विवर्त हैं !

आत्मा निरंजन है 

मन मात्र विवर्त है !!


गुरुवार, अप्रैल 9

भव सागर का कूल किनारा

भव सागर का कूल किनारा


 परम एक था ! निपट अकेला 

उपजा जिससे जगत पसारा, 

 ढूँढ रहा हर कोई जिसमें 

भव सागर का कूल किनारा ! 


 दिखता नहीं दूसरा कोई

कितना खोजा युगों-युगों से। 

 बना जीव वही, वही आत्मा 

खुद को ढूँढे है सदियों से !


कैसा आना, कैसा जाना, 

 बसा हुआ है जो कण-कण में, 

कैसे हुआ अनेक एक से 

बिना किसी भी उपादान के !


 बोध आत्मा का करें किस विधि

कहाँ उस आनंद को पाएँ, 

  उपजी है जिस स्रोत से सृष्टि

कैसे लौट वहाँ घर जायें !

 

बुधवार, अप्रैल 1

जग इक अनुभव

जग इक अनुभव 


उर की सरिता बहती जाये 

सागर से यह कहती जाये, 

तेरा-मेरा साथ पुराना 

तुझसे हुई, तू ही बुलाये !


आना सुख था, जाना भी है 

किया पसार, समेट रही अब, 

जग इक अनुभव, कब यह दुख है?

बिखरे सूत्र लपेट रही अब ! 


विमल दृष्टि दे सृष्टि मनोहर 

देव सहायक नित सुखदायक, 

भर जाती जब तुष्टि ह्रदय में

बनती समर्थ आत्मा नायक !




गुरुवार, जनवरी 16

भव सागर में डोले नैया

भव सागर में डोले नैया 


मन ही तो वह सागर है 

जिसमें उठती हैं निरंतर लहरें 

मन ही तो वह पानी है 

जो तन नौका के छिद्रों से 

भीतर चला आया है 

तभी तन की यह नाव 

जर्जर होती जाती है 

नाविक ने कहा भी था 

छिद्रों को बंद करो 

पानी को उलीचो बाहर 

नाव हल्की हुई तो तिर जाएगी 

ज्यों की त्यों उस पार उतर जाएगी 

अथवा तो आने दो 

परम सूर्य की

किरणों को 

मन को सुखाने दो  

मन वाष्प होकर उड़ जाएगा 

देह ख़ाली होगी 

पानी भर जाये तो डुबाता है 

बाहर रहे तो पार ले जाता है 

मन जितना अ-मन हो 

उतना ही भला है 

उसकी तर्क पूर्ण बातें 

केवल मदारी की कला है ! 


मंगलवार, अगस्त 20

सुधि

सुधि   


छाया बना प्रतिक्षण डोले 

स्मरण तुम्हारा बंधन खोले, 

जब से जीवन का स्पर्श हुआ 

कण-कण हँसकर जैसे बोले !


मेरे कदमों की ये छापें 

कितनी मिलतीं उन कदमों से, 

मेरे शब्दों का ज़िद्दीपन 

कितना मिलता तेरी ज़िद से !


मन के हरियाली आँगन में 

पंछी तो है तेरे वन का, 

मन के उजियाले दर्पण में 

अंकन तो है तेरे मन का !


मन मेरा है सोचें तेरी 

दृग मेरे में सूरत तेरी, 

दिल मेरा है साँसें तेरी 

अधरों ऊपर बातें तेरी !


तेरी आँखों का सूनापन 

मेरे सपनों की सच्चाई, 

मन के मतवाले सागर  में 

किश्ती डोले तेरी सुधि की !


गुरुवार, अगस्त 15

स्वतंत्रता दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएँ

स्वतंत्रता दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएँ 


गगन  रंगा  केसरिया आज 

प्रकृति  भी फहराये तिरंगा, 

माटी का इक खंड नहीं है 

भारत भू है दिल धरती का !


देश आज आगे बढ़ता है 

बाधायें कितनी भी आएँ, 

क़ुर्बानी देकर जो पायी 

आज़ादी नव स्वप्न दिखाए !


सागर की धुर गहराई हो 

या अंतरिक्ष की ऊँचाई, 

देश-विदेश भारतीयों ने 

प्रतिभाओं की अलख जगायी !


माना अभी राह लंबी है

विकसित होने में भारत के,

इकजुट होकर पूर्ण करेंगे 

स्वप्न सभी भारतीय मिल के !


सोमवार, जुलाई 1

गंध झरे जिससे कोमल

गंध झरे जिससे कोमल

जीवन के झुलसाते पथ पर 

मनोहारी शीतल इक छाँव है, 

सूने कँटीले इस मार्ग पर 

सुंदर सलोना सा ठाँव है !


सागर की चंचल लहरों में 

नौका को भी थामे रखता, 

हर इक बार भटकता राही  

पा ही जाता एक गाँव है !


कोई कभी अनाथ हुआ कब 

वह पग-पग साथ निभाता है,  

कैसे जीना इस जीवन में 

ख़ुद आकर सदा सिखाता है !


 कदमों में गति वही भरे है

श्वासों में बनकर प्राण रहा,

नहीं कभी कोई भय व्यापे 

अंतर में दृढ़ विश्वास भरा !  


तेरे होने से ही हम हैं 

तेरे कदमों में आये हैं,  

  गंध झरे जिससे कोमल

वे मौन गीत ही गाये हैं ! 





मंगलवार, मई 28

अंबर पर है सूरज का घर

अंबर पर है सूरज का घर 


उर अंतर लघु पात्र बना है 

सम्मुख विशाल अतीव सागर, 

रह जाता प्यासा का प्यासा 

ख़ाली रहती उर की गागर !


आशाएँ पलती हैं अनगिन 

लेकिन त्याग बहुत छोटा सा,  

अंबर पर है सूरज का घर 

आख़िर कैसे मिलन घटेगा !


 मौन छिपा इक भीतर सबके

बुद्ध विहरते जहाँ रात-दिन,  

हर सीमा मन की टूटेगी 

उगेंगे तुष्टि के नंदन वन !


ख़ुद ही ज्योति पुष्प बनना है

खिलेगा जो शांति सरवर में,

हर दुख बाधा मिट जाएगी 

बढ़ना होगा नयी डगर में !



सोमवार, मार्च 18

गहराई में जा सागर के

गहराई में जा सागर के 


हँसना व हँसाना यारों 

 अपना शौक पुराना है,

आज जिसे देखा खिलते 

कल उसको मुरझाना है !

 

जाने कब से दिल-दुनिया 

ख़ुद के दुश्मन बने हुए, 

बड़े जतन कर के इनको 

तम से हमें जगाना है !

 

बादल नहीं थके अब भी  

कब से पानी टपक रहा ,

आसमान की चादर में 

 हर सुराख़ भरवाना है !


सूख गये पोखर-सरवर  

 दिल धरती का अब भी नम, 

उसके आँचल से लग फिर 

जग की प्यास बुझाना है !


दर्द छुपा सुख  के पीछे  

 संग फूल के ज्यों कंटक, 

किसी तरह  हर बंदे को 

 माया से भरमाना है !


ऊपर ही सोना भीतर 

पीतल, पर उलटा भी है 

गहराई में  सागर के  

सच्चा मोती पाना है !


मंगलवार, जनवरी 30

जल

जल 

हम छोटे-छोटे पोखर हैं 

धीरे-धीरे सूख जाएगा जल 

भयभीत हैं यह सोचकर 

सागर दूर है 

पर भूल जाते हैं 

सागर ही 

बादल बनकर बरसेगा 

भर जाएँगे पुन:

हम शीतल जल से

नदिया बन जल ही 

दौड़ता जाता है  

सागर की बाहों में चैन पाता है ! 


बुधवार, जनवरी 10

एक लपट मृदु ताप भरे जो

एक लपट मृदु ताप भरे जो 



बैंगनी फूलों की डाल से

फूल झर रहे झर-झर ऐसे, 

लहरा कर इक पवन झकोरा 

सहलाये ज्यों निज आँचल से !


याद घेर लेती है जिसकी 

बनकर अनंत शुभ नील गगन, 

कभी गूंजने लगता उर में 

अनहद गुंजन आलाप सघन ! 


एक लपट मृदु ताप भरे जो 

हर लेती हृदय का संताप, 

सुधियाँ किसी अरूप तत्व की 

बनी रहतीं फिर भी अनजान ! 


सागर-लहर, गगन-मेघा सा 

नाता उस असीम से उर का, 

कौन समाया किस पल क़िसमें  

ज्योति अगन या गंध सुमन में !