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बुधवार, दिसंबर 25

बड़े दिन की कविता

बड़े दिन की कविता 


ईसा ने कहा था 

चट्टान पर घर बनाओ 

रेत पर नहीं 

क्या ‘मन’ ही हमारा असली घर नहीं 

क्या हर कोई मन में नहीं रहता 

 आपस में जुड़े हैं मन

मन वस्तुओं से जुड़ा है 

या कहें दुनिया से जुड़ा है 

देखें यह घर किस पर टिका है

रिश्तों का आधार क्या है 

आधार चट्टान सा मज़बूत हो 

वह प्यार हो 

जो अटल है, अमर है और अनंत भी 

न कि मोह 

जो रेत सा अस्थिर है डांवाडोल है 

मोह बाँधता है, जकड़ता है  

वरना तो टिकेगा कैसे 

प्रेम मुक्त करता है, पंख देता है 

ईसा ने कहा था 

ईश्वर प्रेम है !

रिश्तों का आधार ईश्वर हो तो 

किसी बात से न डिगेगा 

तब हर दिन बड़ा दिन मनेगा ! 

 




बुधवार, जून 26

प्रेम

प्रेम 


 

बाँटने से बढ़ता है प्रेम

 भीतर भरा है प्रेम का जो स्रोत

उसे लुटाने का 

अवसर ही जीवन है 

बन जाता तब तुम्हारा मन

ईश्वर का आँगन है 

वही बहता है शिराओं में रक्त बनकर 

वही श्वास के साथ फेरा लगाता है 

उसकी याद में बहाया एक-एक अश्रु 

महासागरों की गहराई भर जाता है 

प्रेम कोई शब्द नहीं 

न ही भाव या भावना कोरी 

नहीं कृत्य या चाहत कोई 

यह तुम हो 

तुम्हारे होने का प्रमाण है 

यही तो धरा को धारने वाला आसमान है 

प्रेम श्रद्धा और विश्वास है 

किसी को कुछ देने की आस है 

हज़ार ख़ुशियों के फूल उगाने वाली बेल है 

प्रेम बना देता हर आपद को खेल है 

इसकी एक किरण भी उतर जाये मन में 

बिखेर देना किसी महादानी की तरह 

प्रेम में होना ही तो होना है 

यही बीज दिन-रात मनु को बोना है ! 


रविवार, जनवरी 22

सच में

सच में 


हम सच को स्वीकार नहीं करते 

वरना साफ़-साफ़ कह देते

 हम मंदिर आते हैं खुद के लिए 

हे ईश्वर ! हम तुमसे प्रेम नहीं करते 

शब्दों को एक-दूसरे के साथ बिठाकर 

गढ़ लेते हैं प्रार्थनाएँ 

जिनमें हमें भी यक़ीन नहीं होता 

तू हमारा कुशल-क्षेम रखेगा 

वरना क्या इस बात पर करते नहीं भरोसा

नहीं है अहम् हममें रत्तीभर भी

कहकर, अहंकार को ही फूल चढ़ाते 

जो पाठ खुद नहीं पढ़ पाए 

वह औरों को पढ़ाते 

स्वयं को कटघड़े में खड़े करके 

खुद वकील बन जाते 

फिर बनते न्यायाधीश और 

फ़ैसला भी अपने ही हक़ में सुनाते !


शनिवार, अप्रैल 24

वासन्ती प्रभात

 वासन्ती प्रभात 

जन्म और मृत्यु के मध्य 

बाँध लेते हैं हम कुछ बंधन

जो खींचते हैं पुनः इस भू पर 

भूमिपुत्र बनकर न जाने कितनी बार बंधे हैं 

अब पंच तत्वों के घेरे से बाहर निकलना है 

पहले निर्मल जल सा बहाना है मन को 

फिर अग्नि में तपना है 

होकर पवन के साथ एकाकार 

घुल जाना है निरभ्र आकाश में 

फिर आकाश से भी परे 

उस परम आलोक में जगना है 

जहां कभी दिन होता न रात 

सदा ही रहता है वासन्ती प्रभात 

जहाँ द्रष्टा और दर्शन में भेद नहीं 

जहाँ दर्शन और दृश्य में अभेद है 

आनंद के उस लोक में 

जहां आलोक बसता है 

वाणी का उदय होता है 

मौन के उस अनंत साम्राज्य में 

जहाँ चेतना निःशंक विचरती है 

अहर्निश कोई नाम धुन गूँजती है 

शायद वही कृष्ण का परम धाम है 

जहाँ मन को मिलता विश्राम है !


गुरुवार, सितंबर 3

अमर स्पर्श

                                                             अमर स्पर्श 

“वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान 

उमड़ कर आँखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान” 


इन कालजयी पंक्तियों के रचियता छायावाद के प्रमुख स्तम्भ, हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि, विचारक और दार्शनिक सुमित्रानंदन पंत को यूँ तो स्कूल में पढ़ा था किन्तु एक बार उनकी कुछ आध्यात्मिक कविताएं पढ़ने का सुअवसर मिला और संयोग की बात है कि उन्हीं दिनों योग साधना में प्रवेश हुआ था. जब इन कविताओं को पढ़ा तो लगा जैसे अंतर आकाश खुलता जा रहा है. पंत को बचपन से ही ईश्वर में अटूट आस्था थी। वे घंटों-घंटों तक ईश्वर के ध्यान में मग्न रहते थे। अपने काव्य सृजन को भी ईश्वर पर आश्रित मानकर कहते थे - 'क्या कोई सोचकर लिख सकता है भला, उसे जब लिखवाना होगा, वो लिखवाएगा।' 


‘’खिल उठा हृदय,

पा स्पर्श तुम्हारा अमृत अभय !


खुल गए साधना के बंधन,

संगीत बना, उर का रोदन,

अब प्रीति द्रवित प्राणों का पण,

सीमाएँ अमिट हुईं सब लय।’’


कवि अपनी चेतना को अनंत तक विस्तृत पाता है और इस अनुभव को शब्दों में इस तरह पिरोता है कि पढ़ते हुए पाठक को किसी ऋषि आत्मा की निकटता का अहसास होता है -

‘’सिन्धु मेरी हथेली में समा जाते हैं,

उन्हें पी जाता हूँ मैं,

जब प्यासा होता हूँ ।


प्राणों की आग में गल कर,

मैं ही उन्हें भरता हूँ ।

जब

सूख जाते हैं वे ।


सोने के दर्पण सी दमकती-

प्राणों की आग,

जिसमें आनंद

मुख देखता है ।’’


क्रमशः


मंगलवार, अक्टूबर 1

अबोला


अबोला

कितनी शांति है घर में
जब से तुमने अबोला धर लिया है
कोई टोका-टाकी नहीं बात-बात पर
नहीं खड़े रहते अब सिर पर चाय, खाने के वक्त में
एक मिनट की भी देरी होने पर
अब चुपचाप स्वयं ही ले लेते हो समझदार व्यक्ति की तरह
अब लिखने का वक्त भी मिल जाता है और पढ़ने का भी
घर में सब धीरे-धीरे बातें करते हैं
अब कुछ सिद्ध नहीं करना है किसी को
जो जैसा है उसे वैसा ही स्वीकारना है
सो स्वीकार लिया है तुम्हारे मौन को सहज होकर
अब नहीं बढ़ती दिल की धड़कन इस ख़ामोशी पर
क्योंकि बचाती है कितने ही छोटे-छोटे भयों  
और बेवजह की हड़बड़ी से
 अब घटती हैं शामें धीरे-धीरे
अब होती हैं रातें भी सुकून भरी
अब दौड़ नहीं लगानी पडती हर बार तुम्हारे साथ चलने की
अब सब कुछ चल रहा है जैसे उसे होना चाहिए सहज अपने क्रम से
तुम्हें भी अवश्य ही भा रहा होगा यह मौन
क्योंकि जोर से कहे वे शब्द कर जाते होंगे आहत तुम्हें भी तो
अति आग्रह से की गयी फरमाइश या आदेश
भर जाता होगा तुम्हें भी तो असामान्य उत्तेजना से
ईश्वर से प्रार्थना है शांति मिले तुम्हें अपने भीतर
ताकि सीख लो कि ऐसे भी जिया जाता है
रेल की पटरियों की तरह समानांतर एक दूसरे के
बिना उलझे और बिना उलझाए
करते हुए सम्मान अन्य की निजता का
कितना अच्छा हो यदि खत्म भी हो जाये तुम्हारा अबोला
 सिलसिला चलता रहे ऐसा ही घर का !

बुधवार, दिसंबर 14

जग में जितना ढूँढा उसको


जग में जितना ढूँढा उसको


क्या कोई ऐसा प्रांगण है
उगे जहाँ हैं सुरभि कमल ?
जहाँ पहुँच कर दोनों मिलते
 परम ब्रह्म व जीव अमल !

जग में जितना ढूँढा उसको
कहीं न पाया अविरत प्यार,  
होश जगे तो भीतर झाँकें,
सुना जहाँ है इक भंडार !

पल-पल जन्मे पल-पल हत हो,
इस सृष्टि का इक-इक कण-कण
यह तन एक नगर है जिसमें,
 छिपे हुए हैं अगणित पल-क्षण !

भुला दिया है जिसको हमने,
वह अपना ही होगा विस्तार
याद आ जाये जिस पल उसकी ,
शायद मिल जायेगा प्यार !




शनिवार, जून 25

हम और वह


हम और वह

हम अहसान जताते उस पर, जिसको अल्प दान दे देते
किन्तु परम का खुला खजाना, बिन पूछे ही सब ले लेते !

दो दाने देकर भी हम तो, कैसे निर्मम ! याद दिलाते
जन्मों से जो खिला रहा है, क्यों कर फिर उसके हो पाते ?

कैसे मोहित हुए डोलते, मैं बस मैं की भाषा बोलें
परम कृपालु उस ईश्वर का, कैसे फिर दरवाजा खोलें !

कटु वाणी के तीर चलाते, नहीं जानते बीज बो रहे
क्रोध की इस विष की खानि से, निज पथ में शांति खो रहे !

वह करुणा का सागर है, नित अकारण ही रहे दयालु
सदा सहारा देता सबको, शांति का सागर, प्रेम कृपालु !

अनिता निहालानी
२६ जून २०११