वह आज भी प्रतीक्षा रत है..
लुकाछिपी खेलने वाले बच्चों में
एक जन छिप गया दूर सबकी नजरों से
ऐसी जगह, जहाँ ढूँढ न सका कोई भी उसे
कुछ देर वे ढूँढते रहे थे
फिर ढलती शाम देख
जाने लगे एक-एक कर
भूल ही गए अपने उस सखा को,
जो छिपा था दूर बड़े पाषाण के पीछे
गुल्म-लताएँ उग आयी थीं जिसके चहुँ ओर
मन ही मन था वह प्रतीक्षारत अपने साथियों का
जिनमें से एक व्यस्त था
पथ पर आते-जाते वाहनों को निहारने में
दूसरा खिलौनेवाले की बंसी की धुन में खो गया था
एक स्वादिष्ट व्यंजन की तलाश में खिंचा चला गया
खोमचेवालों की तरफ
और किसी को उसकी माँ सहलाते हुए ले गयी
कोई मित्र से झगड़ने में हो गया मशगूल
यानि की हर कोई गया भूल
उस साथी को
जो शाम ढलने तक करता रहा था प्रतीक्षा
और शायद हर रोज करता रहेगा....
.......
.......
क्यों न हम ही उसे ढूँढें !