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रविवार, अक्टूबर 4

अस्तित्त्व और हम

 अस्तित्त्व और हम 

एक हवा का झोंका भी आकर 

उसकी खबर दे जाता है 

दूर गगन में उगता हुआ साँझ का तारा 

उसकी याद से भर जाता है 

बादलों में बना कोई आकार

छेड़ जाता है मन की झील को 

डाली पर एक फूल का खिलना 

कैसी मुस्कान अंतर में जगा जाता है 

तेरे मिलने के हजार ढंग हैं !

वर्षा की फुहार बनकर तू ही 

भिगोता है उर का आंगन 

कोयल की कूक में कोई नगमा सुना जाता है 

सूरज की पहली किरण 

छूती है चेहरे को 

लगता है तू ही चुपके से गुलाल लगा जाता है 

झरनों का संगीत या पंछियों का गीत 

ओस की छुवन या घास का परस

देता है तू ही हर रूप में 

हर रंग में हर शै में दरस 

तू ज्योति बनकर दीपक में जलता है 

जिसे देख अंतर में कोई स्वप्न पलता है  

मन भी ज्योति बनकर 

जले तेरी राह में 

कुछ भी न शेष रहे 

शून्य ही बरसे हर चाह में 

अस्तित्त्व के साथ एक हो जाना ही तो पूजा है 

उसके सिवा न साधन कोई दूजा है !


सोमवार, अप्रैल 3

एक रहस्य

एक रहस्य

थम जाती है कलम
बंद हो जाते हैं अधर
ठहर जाती हैं श्वासें भी पल भर को
लिखते हुए नाम भी... उस अनाम का
नजर भर कोई देख ले आकाश को
या छू ले घास की नोक पर
अटकी हुई ओस की बूंद
झलक मिल जाती है जिसकी
किसी फूल पर बैठी तितली के पंखों में
या गोधूलि की बेला में घर लौटते
पंछियों की कतारों से आते सामूहिक गान में
कोई करे भी तो क्या करे
इस अखंड आयोजन को देखकर
ठगा सा रह जाता है मन का हिरण
इधर-उधर कुलांचे मारना भूल
निहारता है अदृश्य से आती स्वर्ण रश्मियों को
जो रचने लगती हैं नित नये रूप
किताबों में नहीं मिलता जवाब
एक रहस्य बना ही रहता है..

मंगलवार, सितंबर 22

जीवन ! कितना पावन !

जीवन ! कितना पावन !

सदा अछूता ! कोमल शतदल
सरवर में ज्यों खिला कमल हो,
राजहंस या तिरता कोई
दूर गगन तक उड़ सकता हो !

नन्ही बूंद ओस की जैसे
इन्द्रधनुष या पंख मयूर
कोमलतम या प्रीत हृदय की
बाल रवि का अरुणिम नूर !

निर्मल नभ की शुभ्र नीलिमा
मंद पवन वासन्ती या फिर,
रुनझुन हल्की सी पत्तों में
कलकल मद्धिम धारा का स्वर !

तुलसी दल की गंध सुहानी
श्वेत मालती की ज्यों माला,
मन्दिर में जलता दीपक या
मोती से जो बहे उजाला !



बुधवार, जनवरी 29

जीवन का गीत

जीवन का गीत

हर तरफ है शोर
 भीड़ और दुःख का साम्राज्य...
बहते हुए अश्रु, सिसकियाँ और अर्थहीन आवाजें
जीवन जैसे एक खोल में सिमट आया हो
उड़ने के लिए गगन तो है मगर भरा है धुँए से
त्राण यदि पाना है तो भीतर ही जाना है
बाहर का सब कुछ कितना बेगाना है
शब्द हैं, चेहरे हैं, बातें हैं खोखली
पर इन अर्थहीन बातों में ही जीवन को पाना है
सरल दृष्टि सरल  उर सब पर लुटाना है
नहीं कहीं मुक्ति और, नहीं कोई स्वर्ग और
कला की ऊंचाइयों को
ओस की बूंदों में पिरोये हुए पाना है
शब्दों के जंगल से पार हुआ मन कहे
जीवन का गीत अब मौन में ही गाना है
कमी कुछ नहीं कहीं, हर घड़ी पूर्ण है
नहीं है अभाव कोई, नहीं कहीं जाना है !

सोमवार, जून 13

कुदरत न घूंघट खोलती



कुदरत न घूंघट खोलती 

जो घट रहा सब स्वप्न है
क्यों दिल जलाते हो यहाँ,
जो दिख रहा वह है नहीं
क्यों घर सजाते हो यहाँ !

है ओस की एक बूंद जो
मोती बनी, उड़ जायेगी,
मुड़ देख लो जरा रेत पर
मरीचिका खो जायेगी !

यहाँ बज रही नित बांसुरी
निज सुर लगाये हर कोई
क्यों चाह होती है हमें
वह गीत मेरा गाए ही !  

निज बोध न होता यदि  
कुदरत न घूंघट खोलती  
 पा कर परस इक किरण का   
सोयी कमलिनी बोलती !

अनिता निहालानी
१३ जून २०११  

शनिवार, अप्रैल 16

पुष्प बिखेरे सुरभि सुवासित


पुष्प बिखेरे सुरभि सुवासित

ओस की मोती जैसी बूंदें
सजा गयी हैं कोमल तन को,
सद्यस्नात पुष्प अति मनहर
भा जाता हर निर्मल मन को !

खिलकर कृत-कृत्य हो जाता
तप करता है वह मिटकर,
चढ़ जाता है उन चरणों पर
हो जाता अर्पित वह हंसकर !

अंतर हरा-भरा हो जाता
खुशियों की फसल लहराए,
पुष्प बिखेरे सुरभि सुवासित
जग को अपना आप चढ़ाए !

चलता-फिरता देवालय है  
अति पावन एक शिवालय है,
बहती प्रेम की गंगा जिससे
यह ऐसा एक हिमालय है !

अनिता निहालानी
१६ अप्रैल २०११