मृत्यु ! तुम्हारा स्वागत है
तुम्हीं सत्य हो इस जीवन का
मिलना तुमसे सबको होगा,
तुमसे ही जीवन, जीवन है
यह सच इक दिन जाहिर होगा !
लेकिन तब, जब श्वासें उखड़ीं
बोल अटक जायेंगे मुख के,
भाव सिमट के आँखों में भी
रह जायेंगे भीतर घुट के !
मृण्मय देह साथ छोड़ेगी
जिसका लिया सहारा हमने,
चिन्मय भीतर छिपा रहेगा
जाना कभी न जिसको हमने !
मिट्टी-मिट्टी में मिल जाये
परिचय मृत्यु से क्यों न कर लें,
जीते जी उसको पहचानें
दिव्य ऊर्जा भीतर भर लें !
चला गया जो पार मृत्यु के
जीवन महा मिलेगा उसको,
खुद मर के जो पुनः जन्मता
कब कोई मार सके उसको !
अनिता निहालानी
८ दिसम्बर २०१०
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