अधरों पर कितने सवाल हैं
आज करोड़ों आँखें नम हैं
भौंचक तकती हुई निगाहें,
कहाँ जा रहा देश आज है
किसने दूषित कर दीं राहें !
अधरों पर कितने सवाल हैं
कितने दिल मायूस हुए हैं,
कितने आँसू रोये हैं दिल
कितने अरमां टूट गए हैं !
जिस पर बड़ा गर्व करते थे
दुनिया का आदर्श बताते,
जिस लोकतंत्र की गाथाएं
सारे विश्व को गा सुनाते !
आज वहीं लोग लज्जित हैं
अपनों पर ही जुल्म हुए हैं,
जिनसे रक्षा की उम्मीद थी
उनसे ही तो ठगे गए हैं !
जिनसे थी गुहार लगाई
भ्रष्ट व्यवस्था को बदलो,
बहुत हो गया खेल पुराना
अब तो अपने ढंग बदलो !
वही सियासत के बाशिंदे
बन आये जब खूनी दरिंदे,
चैन से सोये लोगों पर
जब कसे कुशासन के फंदे !
वैचारिक क्रांति होनी थी
नयी हवा यहाँ बहनी थी,
मजबूरों को हक मिलना था
रोटी भूखों को मिलनी थी !
देशभक्त जो जूझ रहे हैं
सुनाम कर जायेंगे अपना,
भारत को समृद्ध बनाने
का सुंदर है उनका सपना !
जिन्हें कुशासन ने घेरा है
उनके दिल में जोश भरा है,
देशभक्ति के मतवालों का
किसने जज्बा कभी हरा है !
यह आग कभी बुझ ना पाए
देश की आशा बने फलवती,
काला धन भी वापस आये
भ्रष्टाचार न हो बलवती !
न्याय मिले, सम्मान मिले
हो सबको ही हक जीने का,
भारत दुनिया में मिसाल हो
हार हो विश्व के सीने का !
जितनी निंदा होगी कम है
अमानवीय कृत्य घटा जो,
देश कभी भी ना भूलेगा
कहर का बादल इक फटा जो !
अनिता निहालानी
६ जून २०११