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सोमवार, मई 26

चुनाव

चुनाव 


 गा रहे पंछी 

 बह रही हवा 

घूम रही धरा  

 हो रहा अपने आप सब कुछ !


चल रही श्वास  

 बढ़ रही उम्र  

 दौड़ रहा मन  

 हो रहा अपने आप सब कुछ !


 साक्षी

भूताकाश व चित्ताकाश का 

जिस पर  

टिकी है सारी सृष्टि 


अकर्ता 

वह अनुमंता 

हर चुनाव 

जिसके हाथ में  !


शुक्रवार, नवंबर 22

प्रेम

प्रेम 


याद 

हवा की तरह आती है 

और छू कर चली जाती है 

किसी झील की शांत सतह पर 

उड़ते हुए पंछी के पंखों में 

क्योंकि अंततः सब एक है 

प्रेम बरसता है छंद बनकर 

किसी कवि की कविता से 

या चाँदनी बनकर सुनहरे चाँद से 

नहीं होता उस पर किसी का एकाधिकार 

वह तो सबके लिए है 

नदियों, सागरों, मरुथलों 

और बियाबानों तक के लिए 

जिनसे मिलने जाते हैं 

युगों से यात्री 

सितारों के बताये रास्तों से गुजर 

ऐसा प्रेम 

जिसका कोई नाम नहीं है 

वही बच रहता है 

संगीत बनकर 

हर दिल की धड़कन में ! 






शुक्रवार, अप्रैल 26

पंछी इक दिन उड़ जाएगा

पंछी इक दिन उड़ जाएगा 


जरा, रोग की छाया डसती 

मृत्यु, मुक्ति की आस बँधाये, 

पंच इंद्रियाँ शिथिल हुई जब  

जीवन में रस, स्वाद न आये !


कुछ करने की चाह न जागे  

फिर भी आशा देह चलाती, 

जीवन की संध्या बेला में  

पीड़ा उर में रहे सताती !


धन का मोह, मोह पदार्थ का 

अंतिम क्षण तक  रहता जकड़े,

ख़ुद की महिमा समझ न पाया 

मानव मरते दम तक अपने !


 ज्वाला क्रोध जलाया करती 

पहन मुखौटा जग से मिलता, 

कभी-कभी ही सहज प्रेम से 

अंतर कमल जीव का खिलता !


या निर्मल प्रेम संग मन में

काँटा भीतर चुभता रहता, 

भय का एक आवरण मन को 

भ्रमित करे, सुख हरता रहता !


सौ-सौ कष्ट सहे जाता है 

किंतु मोह अतीव जीवन से, 

पंछी इक दिन उड़ जाएगा 

बंधा हुआ जीव तन-मन से ! 


मोह मिटेगा, शांति मिलेगी, 

तोड़ा जब बंधन माया का, 

झुकी कमर, बलहीन हुआ तन 

पुनर्जन्म होगा काया का !


ख़ुशी-ख़ुशी जग विदा करेगा 

पाथेय प्रेम संग बांध दे, 

पथिक चला जो नयी राह पर 

शुभता से उसका मन भर दे !



शुक्रवार, फ़रवरी 4

पंछी, तुम और वसंत

पंछी, तुम और वसंत 
मदमाता वसंत ज्यों आया 
कुदरत फिर से नयी हो गयी, 
मधु के स्रोत फूट पड़ने को 
नव पल्लव नव कुसुम पा गयी !

भँवरे, तितली, पंछी, पौधे 
हुए बावरे सब अंतर में, 
कुछ रचने जग को देने कुछ 
आतुर सब महकें वसंत में !

 याद तुम्हें वह छोटी चिड़िया 
नीड़ बनाने जो आयी थी, 
संग सहचर चंचु प्रहार कर 
छिद्र तने में कर पाई थी ! 

वृत्ताकार गढ़ते घोंसला 
हांफ-हांफ कर श्रम सीकर से, 
बारी-बारी भरे चोंच में 
छीलन बाहर उड़ा रहे थे !

आज पुनः निहारा  दोनों को 
स्मृतियाँ कुछ जागीं अंतर में, 
कैसे मैंने ली तस्वीर 
प्रेरित कैसे किया तुम्हीं ने ! 

 देखा करतीं थी खिड़की से 
 क्रीडा कौतुक उस पंछी का, 
 मित्र तुम्हारा’ आया देखो 
कहकर देती मुझको उकसा !

कैद कैमरे में वह पंछी 
नीली गर्दन हरी पांख थी, 
तुमने मनस नयन से देखा 
लेंस के पीछे यह आँख थी !

पंछी तुम और मार्च

पंछी, तुम और मार्च 

मदमाता मार्च ज्यों आया 
 सृष्टि फिर से नयी हो गयी 
 मधु के स्रोत फूट पड़ने को 
नव पल्लव नव कुसुम पा गयी I 

 भँवरे, तितली, पंछी, पौधे 
हुए बावरे सब अंतर में 
कुछ रचने जग को देने कुछ 
आतुर सब महकें वसंत में I 

 याद तुम्हें वह नन्हीं चिड़िया 
नीड़ बनाने जो आयी थी 
संग सहचर चंचु प्रहार कर 
 छिद्र तने में कर पाई थी I 

 वृत्ताकार गढ़ रहे घोंसला 
हांफ-हांफ कर श्रम सीकर से 
बारी-बारी भरे चोंच में 
 छीलन बाहर उड़ा रहे थे I 

 आज पुनः देखा दोनों को 
स्मृतियाँ कुछ जागीं अंतर में 
कैसे मैंने चित्र उतारे 
प्रेरित कैसे किया तुम्हीं ने I 

 देखा करतीं थी खिड़की से 
 क्रीडा कौतुक उस पंछी का 
 ‘मित्र तुम्हारा’ आया देखो 
कहकर देती मुझको उकसा I

 कैद कैमरे में वह पंछी 
नीली गर्दन हरी पांख थी 
तुमने दिल की आँख से देखा 
 लेंस के पीछे मेरी आँख थी 

 अनिता निहालानी २९ मार्च २०१०

रविवार, सितंबर 12

फिर सुनहली भोर आयी


फिर सुनहली भोर आयी


पंछियों  के स्वर अनोखे 

बोल जाने भरे कैसे, 

क्या सुनाते गा रहे हैं 

भोर होते गूंजते से !


तोड़ते निस्तब्धता जो 

यामिनी भर रही छायी,  

दे रहे संदेश मानो 

फिर सुनहली भोर आयी !


कूक कोकिल की सुरीली 

चेतना में प्राण भरती, 

उल्लसित उर सहज होता 

रात का ज्यों अलस हरती !


कंठ में सुर कौन भरता

वाग्देवी ! वाग्देवी ! 

कह रहे हर बोल में वे 

कर रहे ज्यों वंदना ही ! 


सोमवार, फ़रवरी 22

दूजा निज आनंद में डूबा

दूजा  निज आनंद में डूबा

पंछी दो हैं एक बसेरा 

एक उड़े दूसरा चितेरा, 

निज प्रतिबिम्ब से चोंच लड़ाता

कभी जाल में भी फंस जाता !


कड़वे मीठे फल भी खाये 

बार-बार खाकर पछताए,

इस डाली से उस शाखा पर 

व्यर्थ ही खुद को रहा थकाए !


कुछ पाने की होड़ में रहता 

क्षण-क्षण जोड़-तोड़ में रहता, 

कभी तके दूजे साथी को 

जो बस देखे कुछ न कहता !


पलकों में जब नींद भरी हो 

फिर भी करता व्यर्थ जागरण,

दूजा  निज आनंद में डूबा  

देख रहा है उसका वर्तन !


 

शनिवार, अक्टूबर 3

लुटा रहा वह धार प्रीत की


लुटा रहा वह धार प्रीत की 


 

जीवन के इस महाविटप पर 

दो खग युगों-युगों से बसते, 

एक अविचलित सदा प्रफ्फुलित 

दूजे के पर डोला करते !


लुटा रहा वह धार प्रीत की 

दूजा  फल कटु-मृदु खोज रहा, 

इक है निःशंक निज गरिमा में 

कब दूजे को निज बोध रहा !


उड़ जाता है वह दूर दूर 

संघर्षों का अनुयायी है, 

नव नीड़ रचे ढूंढ प्रियजन 

अकुलाहट हिस्से आयी है !


फिर इक दिन तो ऐसा होगा 

बल कोई न पाँखों में रहा, 

नजरें फिर मोड़ उसे देखे 

जो सदा प्रतीक्षित था तकता !


वह घड़ी अनूठी ही होगी 

जब मिलन सुहृद से घट जाये, 

विमल असीम स्नेह से पूरित 

दो पंछी एक हुए गायें !




बुधवार, मई 6

लॉक डाउन में ढील

लॉक डाउन में ढील


ग्रीन, रेड और ऑरेंज जोंस में 
अब  बंट गए हैं लोग 
लगता है, विभाजन ही मानव की नियति है 
ग्रीन में आजादी अधिक है 
जिंदगी पूर्ववत होने का आभास दे रही है 
अति उत्साह में लोग भूल जाते हैं 
चेहरे पर मास्क लगाना 
और दो गज की दूरी बनाये रखना 
वे इस तरह बाहर निकल आये हैं 
जैसे पिंजरों से पंछी 
सब्जी-फल की दुकानों से ज्यादा 
लगी हैं लंबी-लंबी कतारें 
उन दुकानों पर, 
जहाँ मस्ती और चैन के नाम पर 
जहर बिकता है 
पर नशे का व्यसन उन्हें विवश करता है 
अथवा वे डूब जाना चाहते हैं 
जीवन की वास्तविकताओं को भुलाकर 
किसी ऐसे लोक में 
जहाँ न नौकरी जाने का गम है 
न कोरोना से ग्रस्त हो जाने का 
वे चैन की नींद सो सकेंगे चंद घण्टे शायद बेहोशी में 
काश ! कोई उन्हें बताये 
एक चैन और भी है, जो बेहोशी में नहीं 
होश में मिलता है 
जिसे पाकर ही दिल का कमल पूरी तरह खिलता है 
जहाँ टूट जाती हैं सारी सीमाएं 
मन उलझनों से पार... खुद से भी दूर लगता है 
यह अनोखा नशा ध्यान का 
ऊर्जा से भरता है 
और यह बिन मोल ही मिलता है !


शुक्रवार, फ़रवरी 9

अनुरागी मन



अनुरागी मन

कैसे कहूँ उस डगर की बात
चलना छोड़ दिया जिस पर
अब याद नहीं
कितने कंटक थे और कब फूल खिले थे
 पंछी गीत गाते थे
या दानव भेस बदल आते थे
अब तो उड़ता है अनुरागी मन
भरोसे के पंखों पर
अब नहीं थकते पाँव
' न ही ढूँढनी पड़ती है छाँव
नहीं होती फिक्रें दुनिया की
 उससे नजर मिल गयी है
घर बैठे मिलता है हाल
सारी दूरी सिमट गयी है !

मंगलवार, मई 5

छा गयी जब बदलियाँ

छा गयी जब बदलियाँ


हवा की सरगोशियाँ
पर झुलाती तितलियाँ,
डोलते से शाख-पत्ते
झूमती सी कहकशां !

एक चादर सी बिछी हो
या धरा पर चुनरियाँ ,
पुष्प जिस पर सज रहे हैं
मस्त यूँ नाचे फिजां !

आ गये मौसम सुहाने
छा गयी जब बदलियाँ,
धार अम्बर से गिरी ज्यों
रहमतें बरसें जवां !

गा रहे पंछी मगन हो
छा रही मदहोशियाँ,
हैं कहीं नजदीक ही वह
कह रही खामोशियाँ !

गुरुवार, मार्च 12

झर जाते फिर जैसे सपने

झर जाते फिर जैसे सपने



है अनोखा खेल उसका,  गूँज प्यारी पंछियों की
तिर रहे जो नील नभ में, कूक मनहर कोकिलों की !

सुन सकें तो हैं मधुरतम
कण-कण में जो बसे हुए,
दादुर, मोर, पपीहा के स्वर  
मेघ नीर भी सुर में बरसे !

टिप-टिप छन-छन बरसे बादल
पवन जरा हौले से बहती,
पीले पत्तों को शाखों से
लाकर भूमि पर धर देती !

छिप जाते पंछी डालों में
भीगे पंख झाड़ते अपने,
फूल सहा करते बूंदों को
झर जाते फिर जैसे सपने !

सृष्टि की लीला यह अनुपम
युगों-युगों से चली आ रही,
प्रेम भरे कातर नयनों को
उसी अलख की झलक दिखाती !


मंगलवार, दिसंबर 2

शांत झील के दर्पण पर

शांत झील के दर्पण पर



जैसे कोई फूलों वाली
डाल अचानक झर जाए,
या फिर तपती भू पर बादल
बरबस यूँ ही बरस जाए !

हो निस्तब्ध रात्रि बेला
बिखरी हो ज्योत्स्ना मधुरिम,
शांत झील के दर्पण पर या
सोया हो पंकज रक्तिम !

नील गगन में ओढ़े बदली
लुक-छुप नाज दिखाए चंदा,
भोर अभी होने को ही हो
पंछी का हो स्वर मंदा !

वैसा ही उसका आना है
बरसों जिसे पुकारा पाहुन,
उर उपवन दिप-दिप कर झूमे   
मदमाता मन का प्रांगण !

मंगलवार, अक्टूबर 28

पंछी उड़ जायेगा इक दिन


पंछी उड़ जायेगा इक दिन



कौन रुकेगा यहाँ व कब तक
देर नहीं, टूटेगा पिंजरा,
पंछी उड़ जायेगा इक दिन
कभी न देखा जिसका चेहरा !

उस पंछी को मीत बना ले
वही अमरता को पाता है,
लहर मिटी सागर न मिटता
जीवन सदा बहा करता है !

उससे जिसने लगन लगाई
ठहरा जो पल भर भी उसमें,
अमृत पाया अपने भीतर
मिटा बीज जीया अंकुर में !

खो जायेगा इक पल सब कुछ
अंधकार ही सन्मुख होगा,
बना साक्षी मुस्काता जो  
तब भी कोई शेष रहेगा !

खुद से पार खड़ा जो हर पल
उससे ही पहचान बना लें,
तृषा जगे उससे मिलने की
प्रीति बेल सरसे जीवन में !



सोमवार, अगस्त 11

याद दिलाता सावन उसकी


याद दिलाता सावन उसकी



नीला नभ जब ढका मेघ से
घोर घटा बन छाया करता,
मधुर स्वरों में दे संदेसे
संग उड़ान पंछी के भरता !

घड़ी-घड़ी वह रब मिलता है
पल-पल हृदय कमल खिलता है,
कभी सिमट आता बूंदों में
बन खग डाल-डाल हिलता है !

बहे चले आता अम्बर से
तिरछी-सीधी जल चादर संग,
नैसर्गिक संगीत बज रहा
 घुंघरू ज्यों बांधे हो छमछम !

अंत न आता दीख रहा है
उस अनंत का कृत्य अनंत,
लाखों धाराएँ बहतीं जब
खो जाते हैं दिग-दिगंत !

हरी घास पर काली मैना
बिछे पुष्प कुछ झरे पवन संग,
याद दिलाता सावन उसकी
श्वेत, पीत फूलों के रंग !