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शनिवार, जुलाई 18

मन का शावक थिर हो जाता

मन का शावक थिर हो जाता


भर श्रद्धा-विश्वास ह्रदय में 

भीतर कदम बढ़ाना होगा, 

पूर्ण समर्पण उस अनाम में 

प्रेम विशुद्ध जगाना होगा !


वह भी भीतर राह देखता 

बाधाएँ कभी पथ न रोकें, 

जीवन का कोई भी अनुभव 

अंतर की यह प्यास न सोखे ! 


श्वासें ही रस्ता दिखलायें 

जब भी कोई भीतर जाता, 

भीतर की गुंजन को सुनकर 

मन का शावक थिर हो जाता !


हर भ्रम एक द्वार बन जाता 

हर दुविधा आगे ले जाती, 

दुख भी यहाँ सहायक होते 

सुख चाहत ऊर्जा दे जाती !

 

बुधवार, जून 17

मंज़िल और रास्ते

मंज़िल और रास्ते

जिसने जाना, जो भी जाना 

वह कहा नहीं जा सकता 

जो कहा गया है 

वह मार्ग की खबर देता है 

मंज़िल की नहीं 

वहाँ तो ख़ुद ही जाना होता है 

कोई चल सकता है जिस मार्ग पर 

वही सौंपा जाता है 

अस्तित्त्व के द्वारा 

हरेक का मार्ग उसका अपना है 

भाग्य भी उसका साथ देता है 

जो चल पड़ा है 

उसका नहीं 

जो अभी सोच में ही पड़ा है 

या रास्ते पर ही खड़ा है 

औषधि है हर रोग की यहाँ 

इलाज हर किसी का होता है 

भगोड़ा बन गया जो जीवन से 

वह बार-बार उसे खोता है !

 

बुधवार, जून 3

सीधे सच्चे - कुछ दोहे



सीधे सच्चे - कुछ दोहे


जीवन इक पहेली है,  बूझ ले सो ज्ञानी

सपनों सा संसार है, आँख खुलते फानी

 

हवा, धूप, माटी, गगन,  या अनल की मूरत

अंतर में जो झांक ले, दिखती वही सूरत

 

चिंता, लालच, डाह, मोह, मन के ये विकार 

तज कर उस की शरण ले, उतरे सागर पार

 

बीता जो वह कब रहा, भावी से अनजान

जो पल अपने सामने, उसकी कीमत जान

 

यह जग एक सराय है, पक्का नहीं मुकाम

आना-जाना अटल है, रहने का ना काम

 

सूरज, धरती से मिला, रश्मि कर फैलाये

वसुधा कातर प्रेम से, अश्रु ओस बहाए 


शनिवार, अप्रैल 25

नई मंजिलें राह देखतीं

नई मंजिलें राह देखतीं

 

जाने कहाँ-कहाँ से आते 

मन दिन-रात गुना करता है,

कई विचारों के गालीचे

यह दिन-रात बुना करता है !

 

सोये-सोये जन्मों बीते ,

 अब तो जगे भाग्य जो खोया, 

वही मिलेगा इस जीवन में 

जो कुछ कल हमने था बोया!

 

रंग भरें सुकल्पनाओं में, 

जीवन का पथ सुंदर होगा

नित्य नया निखार आयेगा, 

पहले से सुंदर कल होगा !

 

ऋतु आने पर बीज पनपते 

भीतर कोई चेता देता,

शुभ संकल्प बीज के सम ही 

सही समय पर ही फल देता!

 

नई मंजिलें राह देखतीं, 

रस्ते कुछ नव बुला रहे हैं

कर्म सदा हों सबके हित में, 

गीत यही तो सुना रहे हैं!


गुरुवार, फ़रवरी 12

जीवन

जीवन 


जीवन एक मधुर सुवास सा 

चारों ओर बिखरा है 

मानव ने खोज ली हैं 

हजार तरकीबें उससे बचने की 

वह सरल है, सहज प्राप्य है 

आदमी जटिल बन गया है 

एवरेस्ट पर चढ़ना चाहता है 

पड़ोसी के घर का रास्ता उससे तय नहीं होता 

जहां सुंदर फूल खिलाए हैं जीवन ने 

वह बम बनाकर क्या सिद्ध करना चाहता है 

जीवन बिखरा है 

प्रकृति का हास बनकर

आदमी ने बंद कर लिए हैं अपने कान 

या भर लिए हैं मशीनों की आवाज़ों से 

अथवा तेज फूहड़ संगीत से 

वह होश खोना चाहता है 

जबकि परम होश ही परम आनंद है 

जीवन बिखरा है उजास बनकर  !


मंगलवार, फ़रवरी 3

अनुराग बहे भीतर

अनुराग बहे भीतर 

जड़ता से मुक्त हृदय 
आओ नव सृजन करें, 
बिखरा दें श्रम सीकर  
सुमनों से धरा भरें ! 

संतोषी अंतर मन 
पुलकित हो गात सदा, 
जीवन को खेल समझ 
बढ़ती हो बात सदा ! 

विराग ना राग रहे 
अनुराग बहे भीतर, 
उन्माद पिघल जाये 
बस जाग रहे भीतर ! 

भावों के दीप जलें 
विवाद ना शुष्क करें 
उर सदा कृतज्ञ रहे 
जन्मों का दर्द हरें ! 

अग्निमयी  बुद्धि  जले 
भीतर आनंद पले,  
युग-युग से मुरझाया 
जीवन का पुष्प खिले ! 

बुधवार, जनवरी 28

समुद्री यात्रा

समुद्री यात्रा


समुन्दर की असंख्य लहरों पर 

डोलती, झूमता हुआ मस्त खटोले सी 

बढ़ता जाता है जहाज 

आकाश और समुंदर जहाँ मिलते हैं 

क्षितिज पर धूमिल हो गया है भेद 

आकाश छू रहा है लहरों को 

या लहरें उठती चली गई हैं उस तक 

सर्पिली लहरें फेन बनाती हुई नाच रही हैं 

जो बिखर जाता है पल भर में 

जीवन की नश्वरता का बोध कराता हुआ 

 शाश्वत है जल पर लहरें नश्वर 

ज्यों शाश्वत है जीवन, जगत नश्वर 

सामने बिछी है जल की अनंत राशि 

 आह्लादित हैं सैकड़ों दिल जिसे निहार

 संजो रहे हैं मनों में 

यह अनुभव शायद पहली बार !



मंगलवार, नवंबर 11

जीवन राग


जीवन राग 

मिट जाते हैं सारे द्वन्द्व 

झर जाता है हर विरोध 

ख़त्म हो जाता है सदा के लिए संघर्ष 

जब नत मस्तक होता है मन (तेरे सम्मुख)

खो जाती है हर चाह 

विलीन हो जाती है जगत की कामना 

तुष्टि, पुष्टि और संतुष्टि भी 

खिलौनों सी प्रतीत होती है 

तब कर्मबंधन नहीं बंधता 

जीवन राग बन जाता है ! 


पात्र 

ऋषि मंत्रों के द्रष्टा थे 

देखते थे, देख लेते थे 

अस्तित्त्व में छुपे विचारों को 

सारा ज्ञान सिंचित है कहीं 

बस उसे उजागर करना है 

जैसे जल बहुत है कूप में 

उसे पात्र में भरना है 

हम कब और कैसे पात्र बनें 

यही तय करना है ! 

बुधवार, अक्टूबर 22

जीवन एक सुवास अनोखी

जीवन एक सुवास अनोखी 

ह्रदय शुद्ध हो 
भाव विमल हों 
मन भी खाली-खाली अपना 

जीवन जैसे कोई लीला 
या फिर भोर काल का सपना !

चाह न जागे
 लौ जब लागे  
अंतर चरणों पर झुक जाये 

जीवन जैसे गीत खुशी का 
या कान्हा की बंसी  गाये !

जो जैसा है 
वैसा ही हो 
मनस  से हर द्वन्द्व मिट जाये 

जीवन एक सुवास अनोखी 
पल-पल अपना साथ निभाये !

 भय कैसा अब
कैसी उलझन 
चला रहा है वह जग सारा 

जीवन इक उपहार अनोखा 
नित्य  नूतन राज खुल जाता !

कभी धूप है 
कभी बदरिया 
बदल रहा नित मौसम बाहर 

जीवन इकरस पलता भीतर
बिछी हो ज्यों फूल की चादर !

शांति बरसती 
कृपा बह रही 
जिस पल द्वार ह्रदय का खुलता

जीवन जैसे मधुर पहेली 
हौले-हौले अंतर खिलता !
 

गुरुवार, सितंबर 11

हर पल जीवन नया हो रहा

हर पल जीवन नया हो रहा 


साथ समय के चलना होगा

वरना ख़ुद को छलना होगा, 

शब्द उगें पन्ने पर, पहले

मन को भीतर गलना होगा!


छंद, ताल, लय, बिंब अनोखा 

हर युग में नव रचना होगा, 

ओढ़ पुरानी चादर कब तक 

इतिहासों को तकना होगा!


हर पल जीवन नया हो रहा 

नूतन ढब से सजना होगा, 

परिपाटी का रोना रोते 

आदर्शों से बचना होगा!


सच को सच औ' झूठ-झूठ को 

कहना,लिखना,पढ़ना होगा। 

कब तक आख़िर कर समझौते 

राग पुराना रटना  होगा!


सोमवार, अगस्त 25

जीवन बीता ही जाता है

जीवन बीता ही जाता है


ज्वालामुखी दबे हैं भीतर 

काश ! हमें सावन मिल जाता, 

रिमझिम-रिमझिम बूँदों से फिर 

अंतर  का उपवन खिल जाता !


बाहर अंबर बरस रहा है 

भू हुलसे पादप हँसता है, 

किंतु गई पीर नहीं मन की 

जीवन बीता ही जाता है !


यूँ तो अंचल में हैं ख़ुशियाँ 

कोई कहीं अभाव नहीं है, 

लेकिन फिर भी उर के भीतर 

कान्हा वाला भाव नहीं है !


काव्यकला में ह्रदय न डूबे 

मोबाइल से नज़र न हटती, 

फ़ुरसत कहाँ घड़ी भर उसको 

हर द्वारे से दुनिया आती !


कैसे अंतर रस में भीगे 

कैसे सावन की रुत भाये, 

जीवन भी जब फिसला जाता 

मौत का ताँडव यही रचाये !


शनिवार, अगस्त 2

जीवन एक अदृश्य ज्योति सा

जीवन एक अदृश्य ज्योति सा 

कोई कहीं तलाश न करता 

भीतर न सवाल कोई शेष, 

नहीं राग अब सुख का उर में 

रह नहीं गया दुखों से द्वेष !


एक खेल सा जीवन लगता 

 अब न मोह में डाले माया,

एक अनंत मिला है बाहर 

एक शून्य भीतर जग आया !


इस पल में ही छुपा काल है 

एक बिंदु में सिंधु समाया, 

कण-कण में ब्रह्मांड बसे हैं 

इसी पिंड में उसको पाया !


जीवन एक अदृश्य ज्योति सा 

चारों ओर हवा सा बिखरा, 

सुमिरन की सुवास इक हल्की 

श्वासों से जाता है छितरा !


रविवार, जुलाई 6

अब

अब 


चीजें अब साफ़ हो गयीं 

 अंधेरा छँटने लगा है

 पहचान रहा मन मंज़िल को

जो भ्रमित करता रहा है 

 पकड़ी है प्रकाश की डोरी

जीवन जैसे एक किताब कोरी 

जिसमें लिखा जाना है 

हर पल एक शब्द नया

 हो चाह कोई भी 

मन सरवर कर देती है गंदला

चीजें जैसी हैं 

वैसी बहुत सुंदर हैं 

 अंतर सहलाती 

भोर की शीतल पवन

तृप्त करे पंछियों का कलरव 

आकाश सब ओर घेरे है 

और धरती में  

फैल गई हैं जड़ें नीचे तक 

जब सरल हो जाये जीना 

तब मरने का भय नहीं !