नदी और जीवन
नदी ढूंढ लेती है अपना मार्ग
सुदूर पर्वतों से निकल
हजारों किलोमीटर की यात्रा कर
बिना किसी नक्शे की सहायता के
और पहुँच जाती है
एक दिन सागर तक
नदी अनवरत बहती है
कभी दौड़ती हुई
कभी मंथर
समतल धरा पर थोड़ा विश्राम
लेती होती है प्रतीत
पर भीतर-भीतर गतिमान है
नदी एक जीवन की तरह है
जीवन जो कभी टकराता है
बाधाओं रूपी चट्टानों से
कभी सिमट जाता है कन्दराओं में
अंधेरी सीलन भरी
पा जाता है कभी खुला मार्ग
दूर तक सपाट और कभी ढलान
जिस पर फिसलता जाता है
पर हर जीवन भी एक न एक दिन
पा लेता है गंतव्य
चाहे हजारों जन्म लेने पड़ें
हर दो जन्मों के मध्य कुछ आगे बढ़ता है !
कभी विकारों की दलदल में फँसता है
कभी द्वेष के रेगिस्तानों में झुलस जाता है
फिर किसी जन्म में शीतल छाँव मिलती है
दोनों तटों पर घने वृक्षों की
तो एक दिशा पा लेता है
संयम और विश्वास के तटों के मध्य बहता हुआ
पहुँच जाता है अनंत में
जल जो मुक्त हुआ था सागर से वाष्प बनकर
वही तो हिम शिलाओं पर बरस कर
दौड़ता है पुनः अपने घर की ओर
जीवन जो प्रकटा है अनंत से
वही तो पुनर्मिलन चाहता है
घर जाना है दोनों को
वही पूर्ण विश्राम है
उसी में छिपा राम है !







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