मार्ग लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मार्ग लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, अप्रैल 12

नदी और जीवन

नदी और जीवन 


नदी ढूंढ लेती है अपना मार्ग 

सुदूर पर्वतों से निकल 

हजारों किलोमीटर की यात्रा कर 

बिना किसी नक्शे की सहायता के 

और पहुँच जाती है 

एक दिन सागर तक 

नदी अनवरत बहती है 

कभी दौड़ती हुई 

कभी मंथर 

समतल धरा पर थोड़ा विश्राम 

लेती होती है प्रतीत 

पर भीतर-भीतर गतिमान है 

नदी एक जीवन की तरह है 

जीवन जो कभी टकराता है 

बाधाओं रूपी चट्टानों से 

कभी सिमट जाता है कन्दराओं में  

अंधेरी सीलन भरी 

पा जाता है कभी खुला मार्ग 

दूर तक सपाट और कभी ढलान

 जिस पर फिसलता जाता है 

पर हर जीवन भी एक न एक दिन 

पा लेता है गंतव्य 

चाहे हजारों जन्म लेने पड़ें 

हर दो जन्मों के मध्य कुछ आगे बढ़ता है !

कभी विकारों की दलदल में फँसता है 

कभी द्वेष के रेगिस्तानों में झुलस जाता है 

फिर किसी जन्म में शीतल छाँव मिलती है 

दोनों तटों पर घने वृक्षों की 

तो एक दिशा पा लेता है  

 संयम और विश्वास के तटों के मध्य बहता हुआ 

पहुँच जाता है अनंत में 

जल जो मुक्त हुआ था सागर से वाष्प बनकर 

वही तो हिम शिलाओं पर बरस कर 

दौड़ता है पुनः अपने घर की ओर 

जीवन जो प्रकटा है अनंत से 

वही तो पुनर्मिलन चाहता है 

घर जाना है दोनों को 

वही पूर्ण विश्राम है 

उसी में छिपा राम है ! 

 

मंगलवार, जुलाई 28

घर-बाहर

घर-बाहर 

तुम्हारे भीतर जो भी शुभ है 
वह तुम हो 
और जो भी अनचाहा है 
मार्ग की धूल है 
सफर लंबा है 
चलते-चलते लग गए हैं 
कंटक  भी कुछ वस्त्रों पर 
 मटमैले से हो गए हैं 
पर वे सब बाहर-बाहर हैं 
धुल जायेंगे 
एक बार जब पहुंचे जाओगे घर !

मार्ग में दलदल भी थे लोभ के 
थोड़ा सा कीचड़ लगा है पैरों पर 
गुजरना पड़ा होगा कभी जंगल की आग से भी 
धुआँ और कालिख चिपक गयी होगी 
कभी राग के फल चखे होंगे 
मधुर जिनका रस-रंग भी टपक गया है 
कभी द्वेष की आंच में तपा होगा उर 
सब कुछ बाहर ही उतार देना 
घर में प्रवेश करने से पूर्व !

घर में शीतल जल है 
प्रक्षालन के लिए
तुम्हारा जो भी शुभ है स्वच्छ है 
नजर आएगा तभी 
मिट जाएगी सफर की थकान 
और पाओगे सहज विश्राम 
घर बुलाता है सभी को 
पर जो छोड़ नहीं पाते मोह रस्तों का 
भटकते रहते हैं 
अपने ही शुभ से अपरिचित 
 वे कुछ खोजते रहते हैं !

मंगलवार, जुलाई 14

एक -अनेक

एक -अनेक 


ऊपर चढ़ने का मार्ग एक ही है 
नीचे उतरने के मार्ग हजारों 
पांडव पांच हैं,  कौरव सौ 
ब्रह्म एक है, जीव अनंत 
विद्युत एक  
उसके कार्य अनेक 
समाधान वहीं है जहाँ एक है
 दो होते ही 
प्रपंच का हो जाता श्रीगणेश है 
जो भी आया है जहां में 
जाल फैलाया है उसी ने 
समेटना होगा एक-एक-कर सारे तंतुओं को 
बटोर कर करना होगा एक ही पुल का निर्माण 
जिसके पार वह एक है
सौंप देना होगा सब 
देह धरा को 
मन जल को 
मेधा अग्नि को
और जुड़ जाना होगा 
एक से ही.... !

रविवार, अप्रैल 26

भेद - अभेद

भेद - अभेद 


शब्दों को मार्ग दें तो वे 
भावनाओं के वस्त्र पहन 
 बाहर चले आते हैं 
यदि राह में कण्टक न हों 
बेहिसाब इच्छाओं के 
प्रमाद के पत्थर न रोक लें उनका मार्ग 
तो विमल सरिता से वे बहते चले आते हैं 
धोते हुए अंतर्जगत 
और बाहर भी उजास फैलाते हैं 
शब्दों में छुपा है ऋत
और वाग्देवी ने उन्हें तराशा है 
मानव के पास अस्तित्त्व का 
अनुपम उपहार उसकी भाषा है 
इन्हें मैला न होने दें  
इन्हें तोड़ने का नहीं जोड़ने 
का साधन बनाएं 
मानवता को सुलाने के लिए लोरी न बनें ये 
इनमें क्रांति की चिंगारी सुलगाएँ
कि गिर जाएँ मिथ्या दीवारें 
खो जाएँ सारे भेद 
एक गुलदस्ते की तरह 
नजर आये दुनिया 
घटे अभेद !

मंगलवार, जुलाई 2

चरैवेति चरैवेति



चरैवेति चरैवेति

जीवन को नयनों भर
तकते ही रहना मन !

मार्ग यदि मिल गया हो
तो चलते ही रहना, 
न थकना न ही रुकना
बस बढ़ते ही रहना !

नत माथ हो छाँव में
पल भर ही सुस्ता कर,
गढ़ते ही रहना कल
कदमों में आशा भर !

सपनों सी फुलवारी
मंजिल की झलक दिखे,
पलने ही देना मन
नयनों में चमक जगे !

लौटेंगे किसी दिन
स्वेद बिंदु, मोती बन,
राह में गिरे थे जो
माटी में गये सन !

गुरुवार, सितंबर 15

भोर नयी थामे जब अंगुली

भोर नयी थामे जब अंगुली

महक रहा कण-कण सृष्टि का
अनजानी सी गंध बहे है,
गुंजित गान सुरीले निशदिन
जाने किससे कौन कहे है !

पलकों में तंद्रा भर जाता
स्वप्न दिखा ताजा कर जाता,
भोर नयी थामे जब अंगुली
नये मार्ग हर रोज सुझाता !

रचे रास अदृश्य कन्हाई
तन का पोर-पोर हुलसाता,
झांक रहा नीले नयनों से
साँझी प्रीत उड़ेंले जाता !  

शुक्रवार, दिसंबर 19

मन को जरा पतंगा कर ले

मन को जरा पतंगा कर ले

तू ही मार्ग, मुसाफिर भी तू
तू ही पथ के कंटक बनता,
तू ही लक्ष्य यात्रा का है
फिर क्यों खुद का रोके रस्ता !

मस्ती की नदिया बन जा मिल
तू आनंद प्रेम का सागर,
कौन से सुख की आस लगाये
तकता दिल की खाली गागर !

सूर्य उगा है नीले नभ में
खिडकी खोल उजाला भर ले,
दीप जल रहा तेरे भीतर
मन को जरा पतंगा कर ले !

मन की धारा सूख गयी है
कितने मरुथल, बीहड़ वन भी,
राधा बन के उसे मोड़ ले
खिल-खिल जायेंगे उपवन भी !

एक पुकार मिलन की जागे
खुद से मिलकर जग को पाले,
सहज गूंजता कण कण में जो
उस पावन मुखड़े  को गाले !


शुक्रवार, अगस्त 8

स्वतंत्र हैं हम

स्वतंत्र हैं हम



यही सच है कि
अपने ही हाथों खोदे हैं
अपने मार्ग में हमने गड्ढे
गिर कर उनमें फिर पछताए हैं

हाँ, यही सच है
अपने ही कारण बार-बार
ठगे गये हैं हम जीवन के खेल में

जब हर तरफ ख़ुशी की
 बरसात हो रही थी
ओढ़ लिया था हमने ही मायूसी का छाता
जब परमात्मा सूर्य बनकर
चमचमा रहा था गगन में
हम छुप गये थे
गहन, गीली, संकरी कन्दराओं में
रेंगने को मजबूर  

जब हवाएं आकाश में डोलती फिरती थीं
हमने माटी के नीचे खोद ली थीं खंदके
और डर कर मौत से छुपते फिर रहे थे

हाँ, यह सच है
हम ही चूक गये हैं बार-बार
उस अनंत की यात्रा पर जाने से
हमने ही स्वर्ण पिंजरों में
चाह था कैद होना

जब पुकार लगाई जा रही थी
प्रातः समीरण के साथ मन्दिर
की घंटियों के संग आती
मधुर झंकार के रूप में
हम किसी गहरी नींद में सोये थे
उसी बेहोशी में शायद हमने ही
बीज बोये थे
अब जब नजर आते हैं
बबूल के जंगल अपने चारों ओर
तो याद आती हैं वह तंद्रालस से भरी सुबहें


यह भी सच है
अपने ही हाथों खड़े कर सकते हैं
हम सुवर्ण महल अपने चारों ओर
जहाँ सुनाई देता है दैवीय संगीत
और छाई है एक अपूर्व शांति की सुगंध
जहाँ से उठती हैं ऋचाएं और शंखनाद
जहाँ से बहती है प्रेम की अजस्र धारा
जहाँ मिलता है हर जीवन को
आश्रय आनंद पूर्ण
जहाँ से उगते हैं दिव्य कमल
जहाँ प्रीत है अतीव सुकोमल

सच दोनों हैं
चुनाव हमें करना है
अपने अन्तस् को हमें भरना है
जो चाहे कर लें
जो चाहे भर ले

स्वतंत्र हैं हम...

सोमवार, जुलाई 28

जहाँ मौसम बदलते नहीं

जहाँ मौसम बदलते नहीं


जहाँ कोई नहीं दूसरा
एक ऐसा भी देश है
जो नहीं धारण किया जाता प्रदर्शन के लिए
एक ऐसा भी वेश है
जहाँ टूट जाती हैं सब बेड़ियाँ
छूट जाती हैं रागात्मक छवियाँ
एक ऐसा भी प्रदेश है
जहाँ ठहर जाता है काल का रथ
ध्वनि का होता नहीं प्रवेश है
जहाँ नहीं कोई विरोध
जन्म लेती नहीं कोई कुंठा
कोई विडम्बना भी नहीं सताती
जहाँ दो न रहने से कोई स्मृति भी नहीं रह जाती
जहाँ खो जाती है अपनी छाया भी
नितांत एकांत ही जिसका होना है
एक ऐसा भी आदेश है
जहाँ मौसम बदलते नहीं पल-पल
जहाँ वसंत पतझड़ के आने की आहट नहीं देता
जहाँ बिन बरसे बादल कभी गुजरा ही नहीं
जहाँ नित एक रस मधुरता छायी है
जिसमें होना विपदा का मानो विदेश है
जहाँ निर्धूम अग्नि जलती है
 ज्योति की अखंड शिला पल-पल पिघलती है
जहाँ कोई मार्ग नजर नहीं आता
पर मंजिल हर कदम पर मिलती है
ऐसा भी एक स्वदेश है
जाना जहाँ संकट के मार्ग से गुजरना है
जहाँ टिकना तलवार की धार पर चलना है
 जो स्वयं को खो कर ही जाना जाता है
एक ऐसा भी महेश है !  


रविवार, अक्टूबर 7

नहीं, यह मंजिल नहीं है



नहीं, यह मंजिल नहीं है  

नहीं, यहाँ राजपथ नहीं हैं
पगडंडियाँ हैं, जो खो गयी हैं कंटीले झाड़ों में
स्वयं निर्मित मार्ग पर ही बढ़ सकेंगे
नहीं खोजना है चिन्ह कोई
छोड़ गया हो जो, कोई राहगीर
अनजाने मार्गों से प्रवेश करेंगे..

नहीं, कंटक दुखद नहीं हैं
यदि बच के निकल सकेंगे
घाटियों से गुजर कर ही पाएंगे शिखर..

नहीं, यह मंजिल नहीं है
द्वार है केवल, जिससे होकर गुजरना है
छोड़ देना होगा ताम-झाम बाहर ही
द्वार संकरा है यह
समय भी छूट जायेगा बाहर
क्षुद्र सब गिर जायेगा
धारा के साथ जब बहेंगे
पंख बिना ही तब उडेंगे..

नहीं, यहाँ पाना नहीं है कुछ
अनावरण करना है उसे जो है
व्यापार नहीं करंगे जो प्रेम में
वही उसकी गहराई में उतर सकेंगे..

शुक्रवार, जुलाई 6

अपनी ही छाया डसती है


अपनी ही छाया डसती है

ज्यों अपनी ही छाया
ढक लेती है सम्मुख मार्ग को
जब चल पड़ते हैं हम
प्रकाश से विमुख होकर !

वैसे ही विचार
भाव से विमुख हुआ यदि  
स्वयं के आग्रहों से होता है ग्रसित
कोई नहीं है अन्य
 कोई भी नहीं
जो हो मित्र होने को उत्सुक
तो शत्रु होने की कौन कहे...?
सब कैद हैं अपनी ही छायाओं में...

हर पल जब
स्वछन्द होता है विचार
बुनियाद रख रहा होता है
एक नए संघर्ष की
जो लड़ा जायेगा भविष्य में
 जिसका भागी होना होगा स्वयं को
और देह को भी भुगतना होगा दंड
जब जब आक्रामक होगा
चाहेगा मान
खोदता ही जायेगा गढ्ढे
जिसमें गिरने ही वाला है भविष्य में
भाव की ओर मुख किया विचार
प्रकाशित होता है
कोई छाया उसके सम्मुख नहीं पड़ती
खो जाता है अनंत की आभा में...