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शुक्रवार, जून 3

तुमने उसका घर देखा है


तुमने उसका घर देखा है

है विस्तीर्ण, अनंत, असीम
कोई द्वार नजर न आता,
स्वर्णिम सी ज्योति बिखरी है
मद्धिम स्वर में कोई गाता !

नहीं क्षितिज की भी रेखा है
तुमने उसका घर देखा है !

मौन गूंजता प्रेम विहंसता
शांति पुष्प आनंद लुटाते,
सुख छौना अबाध विहरता
पावन अमृत के नद बहते !

उसी प्रिय का सब लेखा है
तुमने उसका घर देखा है !

खो जाते सब भाव इतर तब
ऊपर उठ जाता मन जग से
झलक यदि मिल जाये पल भर,
जल जाते संशय सब उर के !

दुःख केवल एक भुलेखा है
तुमने उसका घर देखा है !

अनिता निहालानी
३ जून २०११



शुक्रवार, जनवरी 28

जब से तुमसा खुद को जाना !



जब से तुमसा खुद को जाना !


धरा वही है, वही गगन है
वही सूर्य, चन्द्रमा, तारे
किन्तु हुई है मधुमय, रसमय
मिले हैं जब से नयन हमारे !

यूँ ही नहीं हूँ मनु का वंशज
हुआ सार्थक जग में आना,
अर्थ मिला है इक-इक क्षण को
जब से तुमसा खुद को जाना !

सृजन ऊर्जा, प्राण ऊर्जा
है अनंत, असीम हो बांटे,
मुक्तिबोध प्रबल है इतना
सम है पथ पर पुष्प व कांटे !

लक्ष्य एक ही उस अनंत का
कण कण में जो रहा समोए,
निर्मल अंतर घट घट में जा
प्रेम सिंधु में सहज डुबोए !

अनिता निहालानी
२८ जनवरी २०११  




सोमवार, जनवरी 10

पल-पल पूजित ज्यों देवालय !

पल-पल पूजित ज्यों देवालय !


परे विचारों, भावों से है  
जो शब्दों में कहा न जाये,
लेन-देन न जिसका संभव
अनुभव से ही जिसको पाएँ !

निमिष मात्र में मिल सकता जो  
परों से हल्का, फूल से कोमल,
छूकर देखें शून्य गगन को
इतना पावन, इतना निर्मल !

वह अनंत, नित फ़ैल रहा है
अविचल जैसे महा हिमालय,
सदा से है और सदा रहेगा
पल-पल पूजित ज्यों देवालय !

जल जैसे लहर बन जाता
कभी बूंद बन हमें भिगाता,
वही सरोवर बन लहराता
भेद न उस का जाना जाता !

अनजाने ही हमें लुभाता
बना बहाने निकट बुलाता
जिसके होने से ही हम हैं  
सोये जग वो सदा जगाता !

अनिता निहालानी
१० जनवरी २०११