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गुरुवार, अप्रैल 24

पहलगाम में आतंक

पहलगाम में आतंक 

 

कातर असीम दुख से

हर भारतीय का ह्रदय

उबल रहा हर मन 

क्रोध और बेबसी से 

देख आतंक का ऐसा भयावह रूप 

नम हैं करोड़ों आँखें 

  कानों में गूँजती 

 चीख-पुकार उन निर्दोष पर्यटकों की

जिन्हें मौत के घाट उतारा गया

 परिजनों के सामने 

वह नव विवाहिता 

 बैठी पति की मृत देह के समीप 

जैसे बैठी हो सावित्री  

पर जीवित नहीं होगा उसका सत्यवान

पत्नी और पुत्र के सामने गोली उतार दी 

जिस व्यक्ति के सीने में 

 दिल चीर देती है उनकी मुस्कान

जब कश्मीर को जन्नत बता रहे थे 

 एक दिन पहले शिकारे में बैठे हुए 

कश्मीर में कितना खून बहा है 

पर आतंक का ऐसा घिनौना रूप 

शायद पहली बार दिखा है 

नाम पूछ और पढ़वा कलमा 

जहाँ क़त्ल तय किया गया

हुई मानवता की नृशंस हत्या 

जहाँ अब नहीं जाएँगे यात्री 

सूना रह जाएगा पहलगाम और गुलमर्ग 

नहीं देखेगा कोई डल झील की ख़ूबसूरती 

क़िस्मत बदल रही थी जब कि 

दशकों बाद कश्मीर की !


सोमवार, दिसंबर 31

नए वर्ष की दास्तान


नए वर्ष की दास्तान

कैसे कहें शुभ हो नव वर्ष
जब की बिछी है सामने
जाते हुए वर्ष की खून से लथपथ देह
पिछले वर्ष भी तो यही कहा था
पर नहीं थमा आतंक
रुका नहीं मौत का तूफान...
लील गया
कभी निर्दोष स्कूली बच्चों को
लुटती रही अस्मत मासूमों की
कभी राजधानी की सड़कों पर
इतना बेरहम हो गया इंसान !
 आज कौन किसकी सुनता है ?
दी, ली, जाती हैं शुभकामनाएँ
पहले से कहीं ज्यादा पर  
कौन किसको सुनता है ?
बादल गरज कर चले गए, मोर नहीं नाचे
कौन रुकता है कूक कोकिल की सुनने 
सड़क पर खून से सने व्यक्ति की
सुनी नहीं पुकार जब किसी ने
कान नहीं दिए पड़ोसी ने
जब मचता रहा हाहाकार...
नहीं सुनती जनता भी जब सच की आवाज
तो नहीं ही सुनते नेता बैठकर
होता जब अत्याचार...
बदल जायेगा कैलेंडर आधी रात को
पर क्या बदल पायेगा नसीब हम मानवों का
जो बने हैं दुश्मन अपनी ही जान के
तो कैसे कहें शुभ हो नव वर्ष...

गुरुवार, जुलाई 28

बहुत रुलाते हैं


नार्वे, लीबिया हो या अफगानिस्तान, या अपना भारत, हर देश के निर्दोष आज हिंसा का शिकार हो रहे हैं.... जाने कब होगा इसका अंत.... 



बहुत रुलाते हैं

बहुत रुलाते हैं आतंक का शिकार हुओं के
परिवार वालों के आँसू
जो अखबार के दूसरे पन्ने पर अंकित हैं, सूखे नहीं हैं
वह रुदन और क्रन्दन
जो एक अर्थहीन हत्या से उपजा है
बहुत दंश देता है !

कुकुरमुत्तों की तरह उग आये हैं
हथियार और बीमार मानसिकताएं
छिड़ा है एक अनाम युद्ध
मुल्क दर मुल्क होते हैं निहत्थों पर वार
आतंक और जनतंत्र में टूटे हुए विश्वास
बहुत रुलाते हैं  !

गोली से व्यक्ति नहीं मरता
मरती है आस्था, टूट जाती है
प्यार की अनवरत धारा
बेबसी, पीड़ा झेलने को बाधित
परिवारों के आँसू
बहुत रुलाते हैं !