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शनिवार, जनवरी 31

कोई

 

कोई 
एक नीड़ है जग यह सारा
कोई समेटे है अपने पंखों की आंच में
और पोषता है जीवन को अहर्निश
चेतना की अखंड धार से
कोई रखे है आँख अपनी सन्तान पर
उड़ने का देता है हर अवसर
देखता रहता है हर छलांग आह्लाद से
प्रसन्न होता, जब भर जाता है आसमान गुंजार से !

बुधवार, जून 7

हे कृष्ण !

हे  कृष्ण !


कितना दुर्लभ है इस जग में 

कोई निर्दोष हास्य 

निष्कपट अंतर 

हे  कृष्ण !  बहुत ऊँचे मापदंड 

नहीं बना दिये है तुमने !

यहाँ तो हर मुस्कान के पीछे

 छिपा है कोई अभिप्राय 

और तुम कहते हो 

हरेक भीतर ऐसा ही है 

कि अधम से अधम भी

 बन सकता है तुम्हारा प्रिय 

जिस क्षण वह मोड़ लेता है 

अपनी दिशा तुम्हारी ओर ! 


गुरुवार, दिसंबर 29

सदा रहे जो

सदा रहे जो 


यहाँ-वहाँ, इधर-उधर 

उलझे हैं जो धागे मन के 

उन्हें समेटें 

बाँधें फिर समता खूँटे से

 डोर तान लें 

आज किसी का सम्बल पाया 

कल जब छलती होगी माया 

सदा रहे जो 

ऐसा इक आधार जान लें 

बाहर जग यह छिटक रहा है 

भीतर से एक द्वार खान लें !

जब निज का यह अंग बनेगा 

भेद कहीं तब कहाँ  रहेगा 

सारे उसके ही प्रतिनिधि  यहाँ 

यही जान बस उन चरणों के  

गा गान लें ! 


मंगलवार, अक्टूबर 18

भाव सधे तो प्रेम खिलेगा



भाव सधे तो प्रेम खिलेगा 

जितना दौड़ो कम पड़ता है
यह जग अंधा एक कुआँ है,
कभी तृप्त  कब हो सकता यह
सदा अधूरा ही मिलता है !

दो पल थम कर खुद सँग हो ले
जिसने पाया, भीतर पाया,
नहीं छोड़ना कुछ भी बाहर
जिसको तृष्णा तजना आया !

कर-कर के भी जो ना मिलता
शांत हुए से सहज मिलेगा,
कुछ भी नहीं शांति के आगे
भाव सधे तो प्रेम खिलेगा !

जीवन का यही महा रहस्य
जिसने छोड़ा उसने पाया,
सहज रहा जो जैसा भी है
उसने साथ स्वयं का पाया !

मानव होने का आशय क्या
निज के भीतर खुद को पाना,
तोड़ के मन, बुद्धि के घेरे
आत्म शक्ति से प्रीत लगाना !

गुरुवार, जुलाई 21

अंतर में इक दीप जलाये

अंतर में इक दीप जलाये


खुद का खुद से मिलना कैसा 

कली-पुष्प में खिलने जैसा, 

लहर सिंधु में ज्यों खो जाये 

सुरभि चमन में भरने जैसा !


नभ में कोई खुले झरोखा 

जल का इक सरवर दिख जाये, 

छुपी शिला में मूरत कोई 

मन की आँखों से लख जाये !


ध्वनियों का इक मधुरिम आकर 

निशदिन कोई तान सुनाये, 

अम्बर में अनगिन सूरज हैं 

अंतर में इक दीप जलाये !


पलक झपकते ही जैसे यह 

जग पल में विलीन हो जाता, 

अद्भुत मिलन घटे जब तुझसे 

जगत कहीं नजर नहीं आता !


शनिवार, जून 18

'है' एक अपार अचल कोई

'है' एक अपार अचल कोई

गर ‘है’ में टिकना आ जाए 

 ‘नहीं’ का कोई सवाल नहीं, 

तृण भर भी कमी कहाँ ‘है’ में 

‘नहीं’ उलझन की मिसाल वहीं !


‘नहीं’ कुछ भी हल नहीं होता 

जग सागर में उठतीं लहरें, 

‘है’  एक अपार अचल कोई 

बन शीतलता देता पहरे !


‘है’ की तलाश में ‘नहीं’ लगा 

हल भी मिलता आधा आधा, 

कैसे यह बुझनी सुलझेगी 

जब तक न बने उर यह राधा !


शुक्रवार, अप्रैल 29

निज विलास में खोयी थी जो

निज विलास में खोयी थी जो

जग जब मुझमें ही बसता है 

क्या पाना क्या खोना इसका,

 युग बीतें जब इक पल में ही

मिलना और बिछड़ना किसका !


 पल-पल में घटता है दर्शन

पट पर दृश्य बदलता जाता, 

द्रष्टा छुपा हुआ दर्शन में 

एक तत्व ही बस रह जाता !


अबदल अचल अगोचर कोई 

मायामय नूतन रूप धरे, 

नित निरभ्र अनंत अंबर सा 

बदली बन उर जिसमें विचरे !


छाने लगी सघन नीरवता 

गहन गुफा में सोयी थी जो, 

आना-जाना मिटा गयी है 

निज विलास में खोयी थी जो !


महक भरी जर्रे-जर्रे में 

उसी एक चेतन प्रज्ञा की, 

कब पत्ता भी हिला उस बिना 

आधार वही हर संज्ञा की !





सोमवार, अप्रैल 4

जो शून्य बना छाया जग में



जो शून्य बना छाया जग में 


जग जैसा है बस वैसा है 

निज मन को क्यों हम मलिन करें, 

जो पल-पल रूप बदलता हो 

उसे माया समझ नमन करें !

 

मन सौंप दिया जब प्रियतम को 

उन चरणों में ही झुका रहे,

फ़ुरसत है किसके पास यहाँ 

निज महिमा का ही हाथ गहें !

 

जो शून्य बना छाया जग में 

कण-कण में जिसकी आभा है, 

वह राम बना है कृष्ण वही 

उसका दामन ही थामा है !

 

जो जाग गया मन के भीतर 

वह  सिक्त सदा सुख सरिता में,

जग अपनी राह चला जाता 

वह ठहर गया इस ही पल में !


शनिवार, नवंबर 21

देखे वह अव्यक्त छिपा जो


देखे वह अव्यक्त छिपा जो

कंकर-कंकर में है शंकर 

अणु-अणु में बसते महाविष्णु, 

ब्रह्म व्याप्त ब्राह्मी सृष्टि में 

क्यों भयभीत कर रहा विषाणु !


वास यहाँ जर्रे-जर्रे में 

अलख निरंजन वासुदेव का, 

इस धरती पर जटा बिखेरे 

गंगा धारी महादेव का !


मन में हो विश्वास घना जब 

देखे वह अव्यक्त छिपा जो, 

अपरा-परा शक्तियां उसकी 

 कहा स्पष्ट कान्हा ने जिसको !


जिसने रचा खेल यह सारा 

कैसे वह अनभिज्ञ रहेगा,

उसके ही हम बनें खिलाड़ी 

जग यह सारा खेल लगेगा ! 

 

सोमवार, नवंबर 16

परिचित जो अंतर पनघट से

परिचित जो अंतर पनघट से

जग जैसा है बस वैसा है

हर नजर बताती कैसा है

 

कोई इक बाजार समझता

कोई खालिस प्यार समझता

विकट किसी को सागर जैसा

कोई धारे गागर जैसा

 

जग तो अपनी राह चल रहा

नादां मन स्वयं को छल रहा

 

कोई फूलों को चुन लेता

दूजा काँटों को बुन लेता

ताज बनाकर सिर पर पहने

आँसू बहा तुष्टि भर लेता

 

जग में दानव रहते आए

देव बहिष्कृत होते आए

 

देवों को इक सबल बनाता

दूजा रह विरक्त छुप जाता

जगत किसी को बंधन जैसा 

कोई निशदिन गीत सुनाता

 

वही पार उतरा इस तट से

परिचित जो अंतर पनघट से

 

जग की चिंता कौन करे अब

जगपति की वह शरण गहे जब

न बदला है न बदलेगा यह

बुद्ध, कबीर, नानक कहें सब   

सोमवार, सितंबर 21

नीला अम्बर सदा वहीं था

 नीला अम्बर सदा वहीं था

संशय, भ्रम, भय, दुःख के बादल  

जग को हमने जैसा देखा, 

छिपा लिया था दृष्टि पथ ही 

मन पर पड़ी हुई थी रेखा !


कैसे दिखे विमल नभ अम्बर

आशाओं की ओट पड़ी हो,

कैसे कल-कल निर्मल सरिता 

भेदभाव की भीत गड़ी हो !


दुराग्रहों के मोटे पर्दे 

नयनों को करते हों धूमिल,

नीला अम्बर सदा वहीं था 

जहां छँटे ये काले बादल !


स्रोत खुले जो बंद पड़े थे 

जहाँ गिरी मन से हर बाधा,

बहते हुए प्रीत के दरिया

श्यामल जीवन में थी राधा !


अपनेपन की फसल उगी थी   

दृष्टि मिली यह राज बहा झर, 

जाना, आकर जाने कितने 

बन्द पड़े हैं मन के भीतर !


बुधवार, फ़रवरी 12

जाने क्यों


जाने क्यों

फूलों के अंबार जहाँ हम काँटों को चुन लेते, सुंदरता की खान जहाँ कुरूपता हम बुन लेते ! देव जहां आतुर नभ में आशीषों से घर भरने, स्वयं को ही समर्थ मान लगते बाधा से डरने ! भेद जरा जाना होता इस अनंत जग में आकर, किसके बल पर टिका हुआ किसे रिझाते गा गाकर ! सुख की आशा में डोले झोली में दुःख भर जाता, ‘मन’ होने का ढंग यही कुछ ना उसे और आता !

गुरुवार, दिसंबर 26

वक्त चुराना होगा

नया वर्ष आने पर हम हर बार संकल्प लेते हैं, नियमित भ्रमण और व्यायाम करेंगे, नियमित योग और ध्यान करेंगे, नियमित अध्ययन और लेखन करेंगे, किन्तु कुछ दिनों बाद जब जीवन अपने पुराने क्रम में आ जाता है तो सबसे पहले यही शब्द निकलते हैं, क्या करें समय ही नहीं मिलता. मुझे लगता है आने वाले वर्ष में यदि हम जीवन में कुछ सकारात्मक बदलाव चाहते हैं तो हमें अपने लिए कुछ वक्त चुराना होगा।


वक्त चुराना होगा !

काल की तरनि बहती जाती 
तकता तट पर कोई प्यासा,
सावन झरता झर-झर नभ से 
मरुथल फिर भी रहे उदासा ! 

झुक कर अंजुलि भर अमृत का भोग लगाना होगा 
वक्त चुराना होगा !

समय गुजर ना जाए यूँ ही 
अंकुर अभी नहीं फूटा है,
सिंचित कर लें मन माटी को 
अंतर्मन में बीज पड़ा है !

कितने रैन-बसेरे छूटे यहाँ से जाना होगा 
वक्त चुराना होगा !

कोई हाथ बढ़ाता प्रतिपल 
जाने कहाँ भटकता है मन, 
मदहोशी में डुबा रहा है 
मृग मरीचिका का आकर्षण !

उस अनन्त में उड़ना है तो सांत भुलाना होगा 
वक्त चुराना होगा !

जग की नैया सदा डोलती 
हिचकोले भी कभी लुभाते, 
जिन रस्तों से तोबा की थी 
लौट-लौट कर उन पर आते !

नई राह चुनकर फिर उस पर कदम बढ़ाना होगा 
वक्त चुराना होगा !



बुधवार, नवंबर 27

तू


तू 


जर्रे जर्रे में छिपा है तू ही
बोलता है हर जुबां से तू ही,
हरेक दिल, हर जिगर का बाशिंदा
हर सवाल का जवाब है तू ही !

हर चुनौती इक खेल है जहाँ में
चप्पे-चप्पे पर बिछा है तू ही,
हर दर्द तुझसे मिलने का सबब
हरेक तरंग, हर लहर है तू ही !

किसलिए डरें, तंज करें जग  पर
जब कि हर बात बनाता है तू ही,
तुझ से उपजा हर फलसफा जग का
तेरी रहमत जानता है तू ही !

हर फ़िक्र तुझसे दूर रखती है
हर निशां से झलकता है तू ही,
हर  रस्ता मंजिल की तरफ  जाता
इशारे दिए जाता है तू ही !

बुधवार, अप्रैल 11

मुक्त हुआ हर अंतर उस पल

मुक्त हुआ हर अंतर उस पल


पैमाना हम ही तय करते
जग को जिसमें तोला करते,
कुदरत के भी नयन हजारों
भुला सत्य यह व्यर्थ उलझते !

जो चाहा है वही मिला है
निज हाथों से जीवन गढ़ते,
बाधाएँ जो भी आती हैं
उनमें स्वयं का लिखा ही पढ़ते !

दुःख के बीज गिराए होंगे
कण्टक हाथों में चुभते हैं,
मन संकीर्ण राह का राही
भय के जब दानव डसते हैं !

सुख की महज आस भर की थी
जब ग्लानि के पुल बांधे थे,
आशंकाएं भी पाली थीं
महल गढ़े थे सुख स्वप्नों में  !

मुक्त हुआ हर अंतर उस पल
जिसने राज हृदय में जाना,
जो अबूझ  कर रहा इशारे
उस दर पाया सहज ठिकाना !

सोमवार, जून 12

लौट चलें क्यों ना अपने घर


लौट चलें क्यों ना अपने घर


गर तलाश सुकून की दिल में
भटक-भटक यदि ऊब गया उर,
राह तके कोई बैठा है
लौट चलें क्यों ना अपने घर !

ठोकर ही खायी हो जिसने
पलकों पर यह उसे बिठाये,
सदा मुखौटा ही ओढ़ा हो
सहज सादगी से देगा भर !

स्वर्ग-नर्क, सुख-दुःख के सपने
नहीं दिखाता कभी किसी को,
सौगातें अनमोल लिए यह
सहज लुटाता जीवन  के स्वर !

नहीं माँगता कीमत कोई
मोल बिना बिकने को आकुल
धूल छान ली हो जग की तो
झुका दें निज द्वार यह अंतर !