शनिवार, जुलाई 30

शुभ कर्मों का बहे मकरंद

शुभ कर्मों का बहे मकरंद

​​चेतन अमर, अजर, अविनाशी 

प्रेम, शांति व हर्ष का सागर, 

अहंकार बिंधता स्वयं से 

अहंकार सीमित सम कायर !


जीवन जैसा है, वैसा है 

अहम उसे  स्वीकार न पाए,  

निज झूठी शान की ख़ातिर 

लोकमत का शिकार हो जाए ! 


सीधी, सरल चेतना निर्मल 

अहंकार कई दाँव खेले,  

झूठ की कई दीवारों में  

अपने हाथों क़ैदी हो ले ! 


क़ैद हुआ उनमें फिर खुद ही  

कसता, घुटता, पीड़ित होता, 

सच की एक मशाल जलाकर 

अंधकार चैतन्य हटाता  !


जय वहीं जहाँ सत्य पनपता 

जीवन सत्य  की खोज अनंत,

सत्य का पुष्प खिलेगा, जहाँ 

शुभ कर्मों का बहे मकरंद !


गुरुवार, जुलाई 28

जाग कर देखें जरा

जाग कर देखें जरा 


कैद पाखी क्यों रहे 

जब आसमां उड़ने को है,

सर्द आहें क्यों भरे 

नव गीत जब रचने को है !


सामने बहती नदी 

भला ताल बन कर क्यों पलें,

छांव शीतल जब मिली 

घनी धूप बन कर क्यों जलें !


क्षुद्र की क्यों मांग जब

महा उच्च सम्मुख हो खड़ा,

क्यों न बन दरिया बहे 

भरा प्रेम भीतर है बड़ा !


तौलने को पर मिले 

प्रतिद्वंद्विता उर क्यों भरें,

आस्था की राह पर 

शुभ मंजिलें नई तय करें !


 धुन सदा इक गूंजती  

वहाँ शोर से क्यों जग भरें,

छू रहा हर पल हमें 

पीड़ा विरहन की क्यों सहें !


जाग कर देखें जरा 

हर ओर उसकी सुलभ छटा,

प्राण बन कर साथ जो 

 भिगो मन गया बन कर घटा !


 रूप के पीछे छिपा 

सदा प्राप्य अपना हो वही,

 नाम में सबके बसा   

वही नाम जिसका है नहीं !


मंगलवार, जुलाई 26

महाकाल सँग इक हो जाएँ

महाकाल सँग इक हो जाएँ 


लय खोयी छूटा छंद आज 

जीवन में छाया महा द्वंद्व, 

कविता सोयी भाव अनमने 

कहाँ खो गया मधुर मकरंद !


समय पखेरू उड़ता जाता 

काल चक्र अनवरत चल रहा, 

आयु पोटली से रिस घटती  

बढ़ती कह नर स्वयं छल रहा !


भूल ग़या दिल जिन बातों को 

उन पर अब क्यों वक़्त बहाएँ, 

मन थम जाए समय थमेगा 

महाकाल सँग इक हो जाएँ !


शनिवार, जुलाई 23

कहीं धूप खिली कहीं छाया

कहीं धूप खिली कहीं छाया  

 

यहाँ कुछ भी तजने योग्य नहीं 

यह जगत उसी की है माया,  

वह सूरज सा नभ में दमके 

कहीं धूप खिली कहीं छाया !


दोनों का कारण एक वही 

उसका कुछ कारण नहीं मिला, 

वह एक स्वयंभू शिव सम है 

उससे ही उर आनंद खिला !


नाता उससे क्षण भर न मिटे 

इक धारा उसकी ओर बहे, 

उससे ही पूरित हो अंतर 

वाणी नयनों से उसे गहे !


उसी मौन से प्रकटी हर ध्वनि

खग, कोकिल कूक पुकार बनी,

सागर में उठी लहर जैसे 

जल धारे ही पल-पल उठती !


जग नाटक है वह देख रहा 

मन भी उसका ही मीत बने, 

कुछ भी न इसे छू पायेगा 

निर्द्वन्द्व ध्यान से भरा  रहे !


गुरुवार, जुलाई 21

अंतर में इक दीप जलाये

अंतर में इक दीप जलाये


खुद का खुद से मिलना कैसा 

कली-पुष्प में खिलने जैसा, 

लहर सिंधु में ज्यों खो जाये 

सुरभि चमन में भरने जैसा !


नभ में कोई खुले झरोखा 

जल का इक सरवर दिख जाये, 

छुपी शिला में मूरत कोई 

मन की आँखों से लख जाये !


ध्वनियों का इक मधुरिम आकर 

निशदिन कोई तान सुनाये, 

अम्बर में अनगिन सूरज हैं 

अंतर में इक दीप जलाये !


पलक झपकते ही जैसे यह 

जग पल में विलीन हो जाता, 

अद्भुत मिलन घटे जब तुझसे 

जगत कहीं नजर नहीं आता !


सोमवार, जुलाई 18

जब याद कमल सर खिलता है

जब याद कमल सर खिलता है


तू हर उस पल में मिलता है 

जब याद कमल सर खिलता है, 

नहीं अतीत न भावी में ही 

दर्पण दर्शन का मिलता है !


मन जो नित भागा ही रहता 

कही हुई को फिर-फिर कहता, 

व्यर्थ कल्पना महल बनाए 

इस पल में ना कभी झाँकता !


जिसके पीछे ही अनंत इक 

अमन समंदर लहराता है, 

उस पल का उर बने आवरण 

जाने क्यों स्वयं को छल रहा !


शुक्रवार, जुलाई 15

यह पल

यह पल 


जो अनंतानंत ब्रह्माडों का स्वामी है 

वही भीतर ‘मैं’ होकर बैठा है 

 एक होकर मानो दो में बंट गया है 

समय अखंड है, अखंड है चेतना

जैसे जीवन अखंड है 

जन्म-मृत्यु, प्रकाश-छाया, 

जगत-जगदीश्वर  

भेद सारे माया ने दिखाए !

हर नया पल बन सकता है बीज 

आने वाले हजार पलों का जन्मदाता 

यदि जाग जाये कोई इस पल में 

तो धीरे से वह अनंत मन को छू जाता 

न जाने किस श्वास में 

वर्तमान का एक पल

प्रेम की डाली से झरे फूल की तरह 

भर जाये विश्वास की सुवास 

या सीप में गिरी 

मोती बनने को उत्सुक बूँद की तरह 

छू जाए अंतर का आकाश !

बुधवार, जुलाई 13

सदगुरु दोनों हाथ लुटाता


सदगुरु दोनों हाथ लुटाता

खुद से बढ़कर कुछ भी जग में

पाने योग्य नहीं है, कहता,

उसी एक को पहले पालो

सदगुरु दोनों हाथ लुटाता !

 

जग में होकर नहीं जगत में

सोये जागे वह तो रब में,

उसके भीतर ज्योति जली है

देखे वह सबके अंतर में !

 

भीतर का संगीत जगाता

खोई सी निज याद दिलाता,

जन्मों का जो सफर चल रहा

उसकी मंजिल पर ले जाता !

लूट मची है राम नाम की

निशदिन उसकी हाट सजी है,

झोली भर-भर लायें हम घर

उसको कोई कमी नहीं  है !


ऐसा परम स्नेही न दूजा

अनुपम उसका द्वार खुला है,

बिगड़ी जन्मों की संवारें 

सुंदर अवसर आज मिला है ! 


गुरु पूर्णिमा पर हार्दिक शुभकामनाओं सहित


सोमवार, जुलाई 11

एक कंकर चाहतों का

एक कंकर चाहतों का 


टुकड़ा-टुकड़ा जोड़ा मन 

  बुत इक अद्भुत बना लिया, 

 कभी सोया जागा कभी 

कुछ स्वप्नों से सजा लिया !


दर्पण झील हुआ जब थिर  

था चाँद उसमें झाँकता ,

एक कंकर चाहतों का 

तिलिस्म पल में मिटा गया !


जो था नहीं, है न होगा 

 उसे सँवारा करता  जग,

 छुपा नजर के पीछे जो

 खुद को उससे बचा गया  !


राज क्या उनकी ख़ुशी का 

राहबर बन जो मिले थे, 

मिले सब यह रोग छूटा 

जो पाया गुनगुना लिया !


शनिवार, जुलाई 9

फलसफा मन का

फलसफा मन का


कह रहा है कोई कब से 

सुनो सरगोशियाँ उसकी 

बेहद महीन सी आवाज़ 

पुकारे है जिसकी 

शोर ख़्वाहिशों का दिल में 

थम जाए जिस घड़ी 

 इक पुर सुकून पवन 

आहिस्ता से छू जाती  

कोई कशिश, तलाश कोई 

अनजान राहों पर लिए जाती  

वह जो अपना सा लगे 

 याद जिसकी बरबस सताती  

चैन उसकी पनाह में है 

यह राज अब राज नहीं 

 भुलाना नहीं मुमकिन 

क्या दिल को यह अंदाज नहीं 

उसकी फ़िक्रों  में नींद रातों की गंवायी 

जिक्र उसका हर नज्म में जो भी गायी 

रहे  उस गली में वही

समाते जहाँ दो नहीं 

हवा है, धूप या 

पानी का कतरा 

सबब जीवन का 

या फलसफा मन का !




गुरुवार, जुलाई 7

स्वप्न में मन बुने कारा


स्वप्न में मन बुने कारा


एक का ही है पसारा

गुनगुनाता जगत सारा,

निज-पराया, अशुभ-शुभता,

स्वप्न में मन बुने कारा !


मित्र बनकर स्नेह करता 

शत्रु बन खुद को डराता, 

जाग कर देखे, कहाँ कुछ ?

सकल पल में हवा होता !


जगत भी यह रोज़ मिटता 

आज, कल में जा समाता, 

अटल भावी में  यही कल 

देखते ही जा सिमटता !


नींद में किस लोक में था 

भान मन को कहाँ होता,   

जाग भीतर कौन जाने  

खबर स्वप्नों की लगाता !


अचल कोई कड़ी भी है  

जो पिरोती है समय को, 

जिस पटल पर ख़्वाब दिखते 

सदा देती जो अभय को !


क्या वही अपना सुहृद जो 

रात-दिन है संग अपने, 

जागता हो हृदय या फिर 

रात बुनता मर्त्य सपने !

सोमवार, जुलाई 4

अनजानी राहों से आकर


अनजानी राहों से आकर 

एक बात भूली बिसरी सी 
एक स्वपन चिर काल पुराना,
एक तंतु जो जोड़े तुझ से 
मधुरिम स्मृति की बहती धारा !

कोई  है जो छिपा हुआ भी 
जैसे चारों ओर बिछा है, 
शब्दों  की गहराई में जो 
मीलों मधुर मौन फैला है !

सुरभि लिए पवन  का झोंका
ज्यों उसका संदेशा लाये, 
कोयल की मधु कूजन जैसे 
सुमिरन की माला सी गाये !

कोई तार जुड़ा है जैसे 
मन क्यों उसकी राह ताकता,
अनजानी राहों से आकर 
सुधिया अपनी फिर भर जाता !

जीवन कोई बंद द्वार ज्यों 
अपनी ओर बुलाता सबको, 
ज्यों उज्ज्वल उपहार प्रीत का 
सहज बँट रहा पालो इसको !

शुक्रवार, जुलाई 1



बेबस हृदय बना है दर्शक


आज समाज में एक अविश्वास का वातावरण फैला है, सदियों से जो साथ रहते आये थे, उनमें दूरियाँ बढ़ रही हैं, कितने प्रश्न हैं

जिनके उत्तर आपसी सौहार्द में ही छिपे हैं

एक याद भूली बिखरी सी 

अब भी जैसे साथ चल रही, 

सपना होगी सत्य नहीं, जो  

विकट दुराशा हृदय छल रही !


कभी हँसा होगा यह मन भी 

होता खुद को ही कहाँ यकीं,

कभी चले होंगे संग हम

सपनों की सी बात लग रही !


जाने किस दुविधा ने जकड़ा 

कैसे कंटक उग हैं आये, 

शब्दों के अम्बर में ढककर 

कितने विषधर तीर चलाये !


किस गह्वर से उपजी पीड़ा 

बुझा-बुझा सा दिल का दीपक, 

मैत्री का दामन थामा था 

बेबस हृदय बना है दर्शक !


कंपित श्वासें नयन ढगे से 

दिल की धड़कन बढ़ती जाती, 

बरसों में जो चैन मिला था 

कहाँ गँवायी अनुपम थाती !


क्या कोई आशा है अब भी 

हे करूणामय !  तुम्हीं आश्रय, 

कदम-कदम पर हाथ थाम लो 

सिद्ध हो सके पावन आशय !