रविवार, अगस्त 29

कृष्ण जन्माष्टमी



कृष्ण जन्माष्टमी 


बुद्धि हमारी देवकी मानस है वसुदेव

दोनों का शुभ मिलन बने आनंद का गेह !


तन यह कारागार है अहंकार है कंस

पंचेंद्रियाँ पहरा दें भीतर बंदी हंस !


पहरेदार सोए इन्द्रियाँ हुईं उपराम

मन बुद्धि में लीन हुआ भीतर प्रकटे श्याम !


आसक्ति कालिंदी है जाना गोकुल धाम

छूटे मन का राग तो  मिल जाय घनश्याम !



शनिवार, अगस्त 28

जब वसंत का मौसम आता

जब वसंत का मौसम आता
मेरे घर के पिछवाड़े में
एक आम का वृक्ष खड़ा है,
अनगिन हैं शाखाएँ उसकी
लम्बा-चौड़ा तना बड़ा है I

जब वसंत का मौसम आता
बौरों से वह लद जाता है,
मधु की सी मीठी सुवास पा
भौरों का दल छा जाता है I

नन्हीं-नन्हीं अमियाँ लगतीं
कभी हवा सँग धरा पे गिरतीं,
खुशबू से कोयल आ जाती
मैं झट उनको चुन कर खाती I

तेज हवा में झूमा करते
पत्ते सन सन शोर मचाते,
वर्षा में कितने ही प्राणी
शाखों पर आके छुप जाते I

मई जून में फल पक जाते
उनको पेड़ स्वयं न रखता,
जग में सदा मिठास बाँटता
मन ही मन में हर्षित होता I

मेरा मन होता उदास तो
पेड़ साथ देता साथी सा,
कभी तने से सत्कर बैठूँ
झूला कभी झुलाती शाखा I

गुरुवार, अगस्त 26

तुम

तुम

तुमसे ही मधुमास मेरा, तुमसे ही संसार है
तुम न हो तो व्यर्थ सारा, यह मेरा श्रृंगार है !

मन अभी खिलने न पाया, जब नया था यह सफर
हाथ तुमने था यह थामा, चल पड़े हम इस डगर

तब से हर पल इस हृदय को, प्रेम का आधार है
तुम न हो तो व्यर्थ सारा, यह मेरा श्रृंगार है !

जिंदगी में ज्वार-भाटे, है नदी सुख-दुःख भरी
धूप-छांव से हैं रस्ते, सूखतीं डालें हरी

किन्तु रहता एक सा ही, बस तुम्हारा प्यार है
तुम न हो तो व्यर्थ सारा, यह मेरा श्रृंगार है !

एक मंजिल एक रस्ता, एक ही अपना चलन
चाँदनी ओढ़ी है मिलके, संग सूरज की तपन

पुलक से कपते अधर, नयन में मनुहार है
तुम न हो तो व्यर्थ सारा, यह मेरा श्रृंगार है !

२६ अगस्त २०१०

स्मृतियाँ

स्मृतियाँ

दिल के आँगन की मुंडेर पे, यादों की गौरैया चहकी
फूलों वाले इस मौसम में, मदमाती पुरवैया महकी I

स्मृतियों की चुनर ओढ़े, मन राधा ने गठरी खोली
बौर लदे आमों के वन में, इठलाती कोयलिया बोली I

सिंदूरी वह शाम सुहानी, बचपन जब हो गया विदा
कोई मेघ प्रीत बन बरसा, मन उस पर हो गया फ़िदा I

बाबा की वह हंसतीं आँखें, माँ का भीगा-भीगा प्यार
याद आ रहा बरसों पहले, छलका भैया का दुलार I

जीवन कितना बदल गया, मन का अलबम आज खुला
फेरे वाली साड़ी का पर, अब तक नहीं है फाल खुला I

२६ अगस्त २०१०

विपश्यना

विपश्यना

चंचल हिरण सा, कुलांचे भरता मन
क्षण भर में जा पहुँचा, कहाँ से कहाँ
भ्रम में बेचारा कोमल दूब के,
लगा चबाने कटु पत्तियाँ !

हुआ बेचैन, अकुलाया सा फिरे
कडवाहट झेले, मान्यताओं की
पूर्वाग्रहों की, प्रतिक्रियाओं की
झूठी, सच्ची कल्पनाओं की !

सिखाया विपश्यना ने, ठहरना
घुलतीं चली गयीं ठोस मान्यताएं
देखना, जानना और झाँकना
खुलतीं चली गयीं मजबूत गाँठें !

बहता गया विरोध चुपचाप
रह गया बस, शांत मुक्त मन
गगन सा निर्मल और अनंत
शुद्ध, असीम, स्वच्छ, पावन मन !


२६ अगस्त २०१०

बुधवार, अगस्त 25

तेरा पता

तेरा पता

तेरा पता मिला है अब जग से क्या मिलें,
पहुंचेंगे तेरे दर पे अरमान ये खिलें

तुझसे ही आ रही है पुरनम सी यह हवा
सब को मेरी दुआ से मिलने लगी शफा

जब से लगी लगन उठा है कुछ धुआँ
माटी का तन तपा कंचन सा यह हुआ

आखिर जगत का सच आ ही गया सम्मुख
फानी है सब यहाँ सुख हो कि कोई दुःख

दिल यह बना है दिल जब से मिले नयन
पहले पहल थी चिनगी भभकी हुई सघन

जलते हुए जगत में शीतल किया है मन
कैसी अनोखी आग बुझने लगी तपन

२५ अगस्त २०१०

शुक्रवार, अगस्त 13

१५ अगस्त

पंद्रह अगस्त

ओ मेरे देश !
भर आयी है आँख, द्रवित अंतर
भीगा है अंचल तेरा
रिस रहे हैं घाव
टप-टप बहता है रक्त
कैसे कहूँ, मुबारक जश्ने आजादी !

उत्तर है घायल
दक्षिण बेकल, पश्चिम रहा किसी तरह सम्भल
पूर्व में आग लगी
फिर भी इस देश के हर उस
सजग इंसान के भीतर आस जगी
जिसने गाये हैं तराने,
समोयी है इस माटी की गंध
फ़िदा है जो तेरे हर रूप पर !

ओ मेरे देश !
साया आतंक का हो चाहे कितना गहरा
तेरा सूरज उसे लील जायेगा
न मंसूबे गैरों के, न तांडव भ्रष्टाचार का
तेरे परचम को लहराने से रोक पायेगा
मनेगी आजादी की सालगिरह !

क्या हुआ जो छलक आये अश्रु
मुस्काते हैं लब अब भी
देख के झूमती हुई फसलों को
नाचते हैं लोग अब भी
नई नस्ल दौड़ी आती है तेरा ध्वज लिये
नहीं बुजदिल, दिलों में तेरी मुहब्बत लिये !

अनिता निहालानी
१३ अगस्त २०१०

सोमवार, अगस्त 9

प्रीत भरी पाती

प्रीत भरी पाती

श्वासें महकें  अंतर चहके, पल पल नव गीत बजें भीतर
जीवन जो भी भेंट दे रहा, स्वीकारें उत्साहित  होकर I

कभी-कभी ढक गया उजाला, कुछ भी नजर नहीं आता है 
खुशियों के पीछे-पीछे ही, गम का दूत चला आता है I

लेकिन बादल कब तक आखिर,अंशुमान को ढक पाए हैं
कब तक पर्वत रोक सकेंगे, तूफान से टकराए हैं I

चलते जाना है रस्ते पर, कंटकमय या पथरीला है
मंजिल दूर नहीं है साथी, अनथक थोड़ा सा चलना है I

खाली करके मन में भर लें, नए जोश औ' नए होश को
उपवन बन जाये मन आंगन, आतुर है सूरज उगने को I

हर उत्सव संदेशा लाया, थम कर थोड़ा भीतर झाँकें 
दुःख के पीछे छिपा हुआ जो, सुख के उस दरिया को पाके  I

ध्यान का फूल कली योग की, उर उद्यान में यदि खिलेगी
कृपा का बादल बरस रहा है, मंजिल हाथ थाम चलेगी I

अनिता निहालानी
९ अगस्त २०१०

गुरुवार, अगस्त 5

रक्षाबंधन

रक्षाबंधन

एक अनूठा पर्व प्रीत का मन भाया रक्षाबंधन
याद दिलाने स्नेह जगाने फिर आया रक्षाबंधन !

एक नीड़ में पले सहोदर एक सुनी थी मीठी लोरी
मात्र नहीं है कच्चा धागा प्रेम की यह पक्की डोरी

अंतर के दर्पण में कितने रंग बिरंगे धागे आते
बरसों बरस बीतते जाते नन्हें हाथ बड़े हो जाते !

बचपन के वे खेल-खिलौने छूटा वह रूठना मनाना
नए-नए परिवारों से जुड़, अपने निज परिवार बसाना

बहन करे प्रार्थना दिल से, हो रक्षा उसके भाई की
स्वस्थ रहे, सानंद रहे, है पुकार उसकी ममता की !

भाई देता वचन हृदय से सुख-दुःख में है साथ सदा
कभी भरोसा टूटेगा ना स्मरण दिलाता रहे सदा

राखी साक्षी है वर्षों की सदा जगायेगी यह प्रीत
बांटे ढेर दुआएँ हर दिल उत्सव की अनोखी रीत

अनिता निहालानी
५ अगस्त २०१०

मंगलवार, अगस्त 3

पन्द्रह अगस्त

पंद्रह अगस्त

नक्सलवाद उबाल खा रहा, 

रह-रह कर सुलगे काश्मीर

कॉमन वेल्थ गेम सर पे हैं, 

कौन हरे भारत की पीर !


आए दिन बढ़ रहे हादसे, 

कभी संसद में घेरा बंदी

मंहगाई सुरसा सी बढ़ती, 

रोजगार में आयी मंदी


नेतागण जेब लगे भरने

ब्यूरोक्रेसी के क्या कहने,

नेतृत्व चुप्पी साधे है

क्या लज्जा के गहने पहने?


धर्म जाति के नाम अभी भी 

सरकारें गिरतीं या बनतीं,

काम करें या समय बितायें, 

जवाबदेही किस की बनती?


कहीं बाढ़ अतिवृष्टि कहीं पर  

सड़कों पर भी नावें चलतीं,

नकली मुद्रा बाजारों में 

आतंकी हरकत  भी बढ़तीं !


लेकिन फिर भी अपना भारत 

आगे ही बढ़ता है जाता,

दुनिया के मानचित्र पर नित 

नयी-नयी पहचान बनाता !


लोककला या कला शास्त्रीय 

कलाकार भारत के अनुपम,

गीत, नृत्य, संगीत, साहित्य

सभी क्षेत्रों में अति उत्तम !


वैज्ञानिक, शिक्षक, डॉक्टर भी 

हो सम्मानित आदर पायें,

अर्थपति मिल दुनिया भर में

भारत का परचम लहरायें !


कहीं कहीं ही उन्नत राहें 

कहीं अभी पगडंडी पिछड़ी,

करनी होगी मेहनत सबको 

हैं चुनौतियाँ बहुत सी बड़ी !


आजादी की वर्षगाँठ पर 

मिलकर हम यह शपथ लें आज,

हर व्यक्ति कुछ करे भारत हित 

 जाग उठे सारा यह समाज !



अनिता निहालानी
३ अगस्त २०१०