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मंगलवार, अगस्त 26

शुभता के प्रतीक गणनायक

शुभता के प्रतीक गणनायक 


गणपति हैं जन-जन के नायक 

हर घर-आँगन में बस जाते, 

नृत्य, गायन, साज-सज्जा के 

जाने कितने ढंग सिखाते !


पाहन, माटी, काष्ठ  की मूर्ति 

स्वर्ण, रजत, पीतल, क्रिस्टल की, 

कलावृंद प्रेरित हो रचते 

भक्त प्रेम से पूजा उसकी !


मूषक, मोदक, रूप सुहाना 

भर देते उमंग ह्रदयों में, 

कहीं स्तोत्र, मंत्रों का गायन 

हवन यज्ञ होता कुंडों में !


शुभता के प्रतीक गणनायक 

मंगलकारी, बाधा हरते,  

वरद हस्त, अभय मुद्रा धरे 

हर दिल में उल्लास  जगाते !



रविवार, सितंबर 8

गणपति हैं आधार जगत के

गणपति हैं आधार जगत के  


 चले रौंदते हर बाधा को

गणपति अनुपम ज्ञान प्रदाता

पावन करते सारे जग को

रस बिखराते हैं मुदिता का !


माँ की तन-माटी से उपजे 

मानो गुरुत्व शक्ति भूमि की,

गणनायक नित जुड़े धरा से 

जिस कारण धुरी पर टिकी हुई !


वचन दिया जो गौरी माँ को  

शीश कटाया उसकी खातिर, 

अहंकार तज शिव को जाना  

बुद्धि हुई सुबुद्धि बन जाहिर !


मूलाधार में छिपे हुए हैं  

इंद्रियों को पोषित करते, 

 खो जाते मन की हलचल में

दिशा ज्ञान मानव को देते ! 


अष्ट विनायक आनंदमय हैं  

तीनों कालों के वह ज्ञाता, 

निर्विकल्प, अलख निरंजन 

कौतुक से परिपूर्ण विधाता !


ऐसा ही प्रयास हो अपना 

श्री गणेश जीवन में भर लें, 

वाणी शुद्ध, सरल, मीठी हो 

 रुचि हर एक सुरुचि में बदले !


यदि छल-छिद्र नहीं हों मन में  

मोह-मान के पार हुआ हो, 

उसी ह्रदय में डालें डेरा 

हर संकट में धीर खड़ा जो !


बहिर्मुखी जब अंतर्मन है 

भय से नित्य काँपता रहता, 

बाहर शक्ति बिखेरे पल-पल 

मन में उतना बल घट जाता !


ह्रदय केंद्रित, सहज शांत मन

आत्मस्वरूप गणपति प्रकटते,  

जिनसे जग सारा प्रकट हुआ  

जो सबके रक्षक बने हुए !


 उर में प्रेम, भाव में शुचिता

तपस पूर्ण हो जीवन सबका, 

एक तत्त्व है सबके भीतर 

भेदभाव मिट जाये मन का !


शक्ति जगे उनके अनुग्रह से

अध्यात्म का बढ़े ख़ज़ाना, 

सत्व और पवित्रता जागे 

बाँधें बंधन पावनता का !


रोग-विषाद न हों जीवन में

संबंधों में आये गरिमा,

धरती के प्रति पूज्य भाव हो 

अष्टविनायक की हो महिमा !


शुक्रवार, सितंबर 10

गणपति का पूजन करते हैं

गणपति का पूजन करते हैं


मूल आधार में स्थित रहते 

हैं शुभता का प्रतीक गणेश, 

प्रिय अबोध बालक देवी के 

चैतन्य परम प्रसाद गणेश !


विघ्नों की बाधा हरते हैं 

मानवता को राह दिखाते, 

पवित्रता असीम फैलाएँ 

पुण्य शक्ति की रक्षा करते !


अंतर सहज समृद्ध बनाते 

गणपति का पूजन करते हैं, 

मानवों की बुद्धि सीमित है 

गज का वह मस्तक धरते हैं !


भीतर जब शुचिता छायी हो 

माँ की तभी कृपा बरसेगी, 

नित्य साधना गणपति की जब 

शुभ शक्ति तभी जागृत होगी !


मेधा को पावन करते हैं 

सत् असत् का रहस्य बताते, 

दृष्टि हो पावन चित्त भी स्थिर 

नीर-क्षीर मनीषा जगाते !


शनिवार, अगस्त 1

आया अगस्त


आया अगस्त 

नव उजास नव आस लिए फिर 
नव प्रभात अगस्त ले आया, 
त्योहारों  का उल्लास लिए  
शुभ अष्टम सु-मास यह  आया !

रक्षा सूत्र बँधे हाथों में 
अंतर प्रीत प्रकट हो इनमें, 
अमर अदाह्य अभेद चेतना 
सदा अभय ही जाना जिसने !

राम बसे जो रोम रोम में 
महिमावान प्रभु पुनः विराजें, 
मंगलमय संदेश प्रेम का 
छाये, हर दुर्बलता त्यागें !

मोहक मधुर तीज हरियाली 
कान्हा का अवतरण दिवस भी, 
ध्वज आरोहण लालकिले पर 
गणपति का होगा पूजन  भी !

कौशल पा सब कर्मशील हों 
भारत की सुनीति शुभकारी
श्रद्धा सँग विश्वास पर टिकी,
शिक्षा में भी अब झलकेगी !

सदा रहे चहुँ ओर सुरक्षित 
सुंदर रीति नीति अपनाए, 
सजग और सतर्क रहकर ही 
स्वयं बचे और को बचाए !


रविवार, सितंबर 8

गणेश चतुर्थी पर हार्दिक शुभकामनायें - ऐसा है वह गणराया

 ऐसा है वह गणराया  



मौन मुखर हो उठा है उसका
सदियों से जो चुप बैठा है,
इक मुस्कान से उगता सूरज
दूजे से चंदा उगता है !

फूल भी तो कह जाते सब कुछ
मौन टूटता ही रहता है,
नदियाँ, पर्वत, पंछी गाते  
गणनायक न कुछ कहता है !

कर्महीन न रहता पल भर
पल-पल नया रचे जाता है,
ढूँढ़ ढूँढ़ मन हुआ अचम्भित
 वह अनंत सृजे जाता है !

करुणा का इक सागर भीतर
हर कल्पित सुख हो साकार,
ज्ञान, शब्द से बाहर आकर
 क्षण-क्षण लेता है आकार !

क्षितिज बना है उसका अंतर
जल, थल, अनल, अनिल से सजकर
स्वयं ही पूजित स्वयं ही पूजा
 स्वयं पुजारी जाता रचकर !

अशना और पिपासा जागे
जब सत्य की मानव उर में,
 तभी शुरू होता है सुख का
सफर एक अनुपम जीवन में !

गुरुवार, सितंबर 1

गणपति उत्सव पर हार्दिक बधाई !




हे गणपति ! हे विघ्न विनाशक !

हे गणपति हम तुझे चाहते
तुझसे बस हम प्रेम मांगते,
जग करता तेरी आराधना
पूर्ण करे तू सबकी साधना !

ज्ञान का सागर विघ्न विनाशक
रिद्धि सिद्धि का तू है दाता,
तू अचिन्त्य, अव्यक्त, अविनाशी
है हमारी आत्मा गणेषा !

तू विशाल, निर्भय, गर्वीला
दर्शन तेरा शक्ति जगाता,
तेरे गुण अनुपम अनंत हैं
चेतनता को जगाए गनेशा !

बड़ी शान है, बड़ा दबदबा
हर बाधा को तू रौंदता,
आगे बढने का बल देता
तू है दयालु, विघ्न को हरता !

कर्ण विशाल तू सबकी सुनता
नयनों में असीम गहराई,
जो भी झांके इन नयनों में
प्रज्ञा उसकी भी जग आई !

छोटे-बड़े सभी हैं तेरे
तू जागृत सजग प्रहरी सा,
कोई प्रेम से बंधता तुझसे
दुर्जन को तेरा पाश बंधता !

नन्हा सा मूषक भी तेरा
मोदक है आनंद का रसमय,
तुझे समर्पित है तन-मन-धन
हे अनंत जग तुझको ध्याता ! 





शुक्रवार, सितंबर 10

गणेश चतुर्थी

गणेश चतुर्थी

नन्हा गणेशा याद आ रहा
मन ही मन, मन मुस्करा रहा !

नाम अनेकों कृत्य अनगिनत
गणपति के आयाम अनगिनत !

सुख-दुख में सब उसे पुकारें
प्रथम वन्दन नाम उच्चारें !

चिठ्ठी हो या पोथी पत्रा
लिखते सभी श्री गणेशाया !

रिद्धि सिद्धि के हैं वरदाता
विद्या दायक बुद्धि प्रदाता !

मूलाधार के देव गणपति
महेश्वरी  नंदन गणाधिपति !

लम्बोदर हेरम्ब विनायक
विघ्नहर्ता सुखद फलदायक !

आओ मिलकर उसे रिझाएँ
भीतर निज तुष्टि-पुष्टि पाएँ !

अनिता निहालानी
१० सितम्बर २०१०