शनिवार, जनवरी 31
कोई
गुरुवार, मई 22
देवी कवच
देवी कवच
शैलपुत्री सी अडिग हो
नित ब्रह्म में विचरण करे,
चन्द्र ज्योति निनाद घंटा
शुभ चेतना धारण करे !
स्कन्द जैसी वीरता हो
कात्यायनी सी मधुर छवि,
कालरात्रि सी अति भीषण
गौरी माता सी हो द्युति !
सिद्धिदात्री हो प्रदाता
चेतना पावन बनेगी,
हर काल औ’ हर देश में
सत्य का साधन बनेगी !
जगे प्राणशक्ति बन प्रबल
उर भाव सारे शुद्ध हों,
मन समर्पित हों हमारे
सभी सर्वदा प्रबुद्ध हों !
हर दिशा में वह हमारा
मार्ग दर्शन मंगल करें,
देवी कवच सी बन सदा
नित भक्ति की रक्षा करें !
रविवार, फ़रवरी 16
गहराई
गहराई
चेतना जुड़ती है जगत में
इससे-उससे
लोगों, विचारों
क्रिया और वस्तुओं से
शायद कुछ भरना चाहती है
नहीं जानती
भीतर अंतहीन गहराई है
जो नहीं भरी जा सकती
किसी भी शै से
इसी कोशिश में
कुछ न कुछ पकड़ लेता है मन
और जिसे पकड़ता
वह जकड़ लेता है
फिर छूटने उस जकड़न से
साधता है वैराग्य
ऐसे ही बनता है
मानव का भाग्य !
गुरुवार, दिसंबर 19
स्वतंत्रता
स्वतंत्रता
मुक्त चेतना
उड़ जाती है अनंत की ओर
अब कल्पनाओं की दीवार
आड़े नहीं आती
भरभरा कर गिर जाती है
जैसे हवा में उठा रेत का महल
अंततः वह एक छाया ही तो है !
उस असीम को
अनुभव करके ही
होती है तृप्त
अनायास ही चेतना !
पंछी के पैरों में ज़ंजीरें नहीं बंधी
वह चाहे तो उड़ सकता है
पिंजरा खुला है
हर बंधन ढीला है
एक भ्रम है
स्वतंत्र है हर आत्मा
स्वतंत्रता उसका
जन्मसिद्ध अधिकार है !
सोमवार, मई 13
निर्मल बुद्ध चेतना लेकर
मंगलवार, नवंबर 1
नव भारत का निर्माण करें
नव भारत का निर्माण करें
स्वर्णिम युग इस भू पर लाने
योग धर्म का ध्वज लहराने,
व्यर्थ जले, रहे शेष सार्थक
मिलकर हम यही प्रयास करें !
नव भारत का निर्माण करें !
तोड़ें हर गढ़ रूढ़िवाद का
कट्टरता औ' मिथ्या हठ का,
झूठे दुर्ग, क़िले जो भीतर
मतान्धता के सम्पूर्ण गिरें !
नव भारत का निर्माण करें !
नए हृदय की कोमल भू पर
चट्टानों सम निर्णय लेकर,
शिव जैसे कैलाश विराजें
मानवता उच्च उड़ान भरे !
नव भारत का निर्माण करें !
किसने रोका है कदमों को
स्वार्थ हृदय से झर जाने को,
प्रतिपल बने चेतना पावन
शुभ मुल्यों का सम्मान करें !
नव भारत का निर्माण करें !
शुक्रवार, जुलाई 15
यह पल
यह पल
जो अनंतानंत ब्रह्माडों का स्वामी है
वही भीतर ‘मैं’ होकर बैठा है
एक होकर मानो दो में बंट गया है
समय अखंड है, अखंड है चेतना
जैसे जीवन अखंड है
जन्म-मृत्यु, प्रकाश-छाया,
जगत-जगदीश्वर
भेद सारे माया ने दिखाए !
हर नया पल बन सकता है बीज
आने वाले हजार पलों का जन्मदाता
यदि जाग जाये कोई इस पल में
तो धीरे से वह अनंत मन को छू जाता
न जाने किस श्वास में
वर्तमान का एक पल
प्रेम की डाली से झरे फूल की तरह
भर जाये विश्वास की सुवास
या सीप में गिरी
मोती बनने को उत्सुक बूँद की तरह
छू जाए अंतर का आकाश !
शनिवार, फ़रवरी 19
चलना है हमको नव पथ पर
देश, प्रदेश, शहर, गाँव सभी
बुला रहे हैं हसरत भर कर,
हाथ मिला लें, कदम बढ़ा लें
चलना है हमको नव पथ पर !
माना लंबी राह सामने
निकल पड़ें हम साथ डगर पर,
इक दूजे का हाथ थामते
सारा जग लगता आँगन घर !
बनें चेतना की चिंगारी
जगमग दीप जलाएँ मिलकर,
ज्योति उस करुणामयी माँ की
चलती फिरती आग बनें फिर !
भस्म करे सारी भय बाधा
पथ प्रशस्त कर दे जीवन का,
बाहर भीतर भेद मिटा दे
पावन वही प्रकाश बनें हम !
चाहे दुःख की ज्वालाएँ हों
शीतल सावन हो अंतर में,
जो न कभी कम हो बहने से
नयनों का उल्लास बनें हम !
मंगलवार, जनवरी 25
एक चेतना की डोरी से
एक चेतना की डोरी से
विजयगान गूँजे दुनिया में
जय हिंद ! जय भारत न्यारा !
दिप-दिप दमक रहा गौरव से
महिमा मंडित भाल तुम्हारा !
युग-युग से करते आये हो
संगम चिन्मय आदर्शों का,
बहती आयी गंगा में नित
ज्ञान, भक्ति व कर्म की धारा !
सदा सत्य के रहे पुजारी
उपनिषदों का शुभ ज्ञान दिया,
कोटि-कोटि जनों ने मिलकर
सदा दिया उत्कर्ष का नारा !
एक चेतना की डोरी से
बँधा हुआ हर भारत वासी,
भिन्न बोलियाँ, भिन्न प्रांत हैं
जुड़ा हुआ है भाग्य हमारा !
भारत माता की संतानें
उसके हित कर्त्तव्य निभातीं,
दुश्मन आँख उठा भर देखे
वीर सैनिकों ने ललकारा !
सोमवार, नवंबर 22
खिला-खिला मन उपवन होगा
खिला-खिला मन उपवन होगा
एक अनेक हुए दिखते हैं
ज्यों सपने की कोई नगरी,
मन ही नद, पर्वत बन जाता
एक चेतना घट-घट बिखरी !
कैसे स्वप्न रात्रि में देखें
कुछ खुद कुछ अज्ञात तय करे,
जीवन में भी यही घट रहा
जगकर देखें कहाँ खो गए !
एक जागरण नित्य प्रातः में
स्वप्नों से जो मुक्ति दिलाए,
परम जागरण ऐसा भी है
जीते जी यह जग खो जाए !
एक तत्व में टिकना हो जब
जीवन तब क्रीडाँगन होगा,
अपने हाथों दुःख कब बोए
खिला-खिला मन उपवन होगा !
जिस क्षण थामी बागडोर निज
सुख-दुःख की ज़ंजीरें टूटीं,
इक ही अनुभव व्यापा मन में
समता उपजी ममता छूटी !
गुरुवार, अक्टूबर 21
शून्य का अर्थ
शून्य का अर्थ
घुटनों पर नोटबुक कलम हाथ में
मानो कोरा काग़ज़ आमंत्रण दे
दिल से होते
कुछ बंध उतरे
मन व हाथों में यह कैसा नाता है
अंतर्जगत को जो पन्ने पर उकेर आता है
अमूर्त को मूर्त किया
शब्द का रूप दिया
उपजे थे चेतना से
कोई नहीं जिससे परे
अंतत: शून्य को ही
कलम पन्ने पर उतारती
लाख प्रयत्न करें पर
जिसे हम पढ़ नहीं पाते
क्या इसीलिए लोग कविता के
अपने-अपने अर्थ लगाते !
सोमवार, सितंबर 27
अस्तित्त्व और चेतना
अस्तित्त्व और चेतना
ज्यों हंस के श्वेत पंखों में
बसी है धवलता
हरे-भरे जंगल में रची-बसी हरीतिमा
जैसे चाँद से पृथक नहीं ज्योत्स्ना
और सूरज से उसकी गरिमा
वैसे ही अस्तित्त्व से पृथक नहीं है चेतना
अग्नि में ताप और प्रकाश की नाईं
शक्ति शिव में समाई
ज्यों दृष्टि नयनों में बसती है
मनन मन में
आकाश से नीलिमा को कैसे पृथक करेंगे
हिरन से उसकी चपलता
वैसे ही जगत में है उसकी सत्ता
लहरें जल से हैं बनती
जल क्या नहीं उसकी कृति !
मंगलवार, अप्रैल 27
पावन परिमल पुष्प सरीखा
रविवार, अप्रैल 18
श्वासें
श्वासें
गा रही हैं नाम
जिसे हम सुन नहीं पाते
या कर देते हैं सुनकर भी अनसुना
श्वासें कीमती हैं कितनी
यह बात सिखा रहा है एक वायरस आज
चेतना के समंदर में उठती-गिरती लहरों सी
ही तो हैं ये श्वासें
उथली और छोटी होंगी तो
नाप नहीं पाएंगी गहराई उसकी
तीव्र और कंपित होंगी
तो मन को भयभीत बनाएंगी
गहरा करें इन्हें
उस परम की ऊर्जा भरें उनमें
यही प्राणों का आयाम हमें मुक्त करता है
भर देती हैं शक्ति से जब भीतर आती हैं
बाहर जाती हुई समर्पित हो जाती हैं
‘सो’ कहकर चेतना को भरतीं
‘हम’ में स्वयं को अर्पित करतीं
इन्हीं श्वासों का आवागमन ही जीवन है
इनसे ही चलता मन है
श्वासें हल्की और धीमी हो जाएँ
एक लय में पिरो ली जाएँ
तो टिक जाता है मन का अश्व भी
और चैतन्य उसमें झलक जाता है !
बुधवार, नवंबर 4
चेतना हर हल बनेगी
चेतना हर हल बनेगी
आग
भीतर जो जलाती
पथ
प्रदर्शक भी वही है,
अश्रु
बनकर जल बहा जो
मनस
शोधक भी वही है !
शोक
पाहन सा चुभे जो
पाँव
की सीढ़ी बनेगा,
घन
विपत्ति का अंधेरा
एक
दिन सूरज बनेगा !
गर
कोई संघर्ष न हो
सुवर्ण
न कुंदन बनेगा,
बिना
मंथन सिंधु से भी
क्योंकर
मधु अमृत झरेगा !
तप
रही जो आज माटी
नीर
कल धारण करेगी,
प्रश्न
बनकर जो खड़ी है
चेतना
हर हल बनेगी !
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