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सोमवार, अक्टूबर 23

शिकायत ख़ुद से भी अनजान हुई



  शिकायत ख़ुद से भी अनजान हुई 



खुद से खुद की जब पहचान हुई

ज़िंदगी फ़ज़्र की ज्यों अजान हुई 


जिन्हें गुरेज था चंद मुलाक़ातों से 

गहरी हरेक से जान-पहचान हुई 


तर था दामन अश्रुओं से जिनका 

मोहक अदा सहज मुस्कान हुई 


दिलोजां लुटाते हैं अब जमाने पर

  शिकायत ख़ुद से भी अनजान हुई 


फासले ही हर दर्द का सबब बनते 

मिटी दूरी सुलह सबके दरम्यान हुई 

गुरुवार, अगस्त 25

कौन फूल खिलने से रोके

कौन फूल खिलने से रोके 
  
बहे न दिल से धार प्रीत की
जाने कितने पाहन रोकें, 
हरियाली उग सकती थी जब 
कौन फूल खिलने से रोके !

सहज स्पंदित भाव क्यों उठते  
तर्कों के तट बांध लिए जब,
घुट कर रह जाती जब करुणा  
कैसे जगे ख़ुशी भीतर तब !

एक बीज धरती में बोते 
बना हजार हमें लौटाती,
इक मुस्कान हृदय से उपजी 
अनगिन दिल के शूल मिटाती !

बहना ही होगा मन को नित 
अंतर का सब प्यार घोलकर, 
भरते रहना होगा घट को 
उस अनाम का नाम बोलकर !

 उसी एक का प्रेम जगत में 
लाखों के अंतर  में झलके,
जो दिल इसमें भीग गया हो 
पा जाता है खुद को उसमें !

सोमवार, दिसंबर 6

एक अमिट मुस्कान छिपी है

एक अमिट मुस्कान छिपी है 

एक अमिट मुस्कान छिपी है 

उर अंतर की गहराई में, 

वह मनमोहन यही चाहता 

उसे खोज लें फिर बिखरा दें !


चलना है पर चल न पाए 

भीतर एक कसक खलती है, 

उस पीड़ा के शुभ प्रकाश में 

इक दिन हर बाधा टलती है !


मीलों का पथ तय हो जाता 

यदि संकल्प जगा ले राही, 

हाथ पकड़ लेता वह आकर 

जिसने उसकी सोहबत चाही !


अल्प बुद्धि छोटा सा मन ले 

जीवन को हम कहाँ समझते, 

जन्म-मरण सदा एक रहस्य 

आया माधव यही बताने  !


कण-कण में जो रचा बसा है, 

प्रीत सिखाने जग में आया 

अपनी शुभता करुणा से वह 

मानव को हरषाने आया !

गुरुवार, जुलाई 16

माया

माया 


कभी दर्द दिया 
कभी मुस्कानें
कभी रोये औरों के दुःख पर 
फिर दिए उन्हीं को ही ताने
कभी राह दिखाई मंजिल की 
कभी मन में  संशय भर डाला
कभी रोका जिस पथ चलने से 
फिर उसका पता बता डाला ! 
रिश्तों की ऐसी माया है 
कोई पार निकल कर ही जाने 
यह निज कर्मों की खेती है 
सुख-दुःख के बोये थे दाने !


गुरुवार, जनवरी 30

जीवन पग-पग पर मिलता है

जीवन पग-पग पर मिलता है 

नजर उठाकर जरा निहारें 
इंच भर ही राह संवारें,
आँचल में सुवास भर देता 
धीमे से बस उसे पुकारें !

किसी पुहुप में आ खिलता है 
जीवन पग-पग पर मिलता है !

शब्दों को नव अर्थ मिलेंगे 
चट्टानों के द्वार खुलेंगे, 
अनजाने रस्तों से आकर 
निर्मल निर्झर फूट पड़ेंगे !

नूतन पल्लव में हिलता है 
जीवन पग-पग पर मिलता है !

मुस्काने गह्वर में दबी थीं 
स्मृतियों की परतें ओढ़ी थीं,
परत दर परत खिसकती जाती 
व्यर्थ ही सीमाएं गढ़ ली थीं !

एक सूत्र घट-घट बसता है 
जीवन पग-पग पर मिलता है !

शनिवार, अगस्त 10

शब्दों का जो अर्थ बना है



शब्दों का जो अर्थ बना है



अंतर्मन की गहराई में
कोई निर्विशेष तकता है,
अंतरिक्ष की ऊँचाई में
कोई सरल मौन बसता है

चाँद, सितारे, सूरज दमकें
उसी मौन से गुंजन जग में,
दरिया, सागर, बरखा धारे
वही मौन गति देता पग में

हर मुस्कान वहीं से उपजी
मृदु, मोहक, मदमस्त छबीला,
ढका हुआ पर महकाये मन
ऋतुराजा सा सौम्य अलबेला

शब्दों का जो अर्थ बना है
उससे परे न जग में कोई,
बिखरा पवन धूप सा श्यामल
अरुणिमा कण-कण में समोई

सोमवार, दिसंबर 31

नए साल की दुआ

बीता बरस जरूर है
बीत न जाये प्यार,
आने वाले साल में
खुशियाँ मिलें हजार ।

जंग लगे न सोच पर
बना रहे उल्लास,
हर पल यहाँ अमोल है
जो भी अपने पास ।

श्वासों में विश्वास हो
उर में सुर संगीत,
कदमों में थिरकन भरी
कहता जीवन गीत ।

सुख की चादर ओढ़ कर
दुख न आये द्वार ,
पलकों के अश्रु बनें
अधरों पर मुस्कान ।

गुरुवार, फ़रवरी 25

उसका साथ


उसका साथ

एक अदृश्य हाथ सदा थामे रहता  
बढ़ो, तुम आगे बढ़ो !
कोमल स्पर्श उसका, सहला जाता  
छालों को पावों के
 स्मृति का आँचल समेट लेता
जब कभी बिखरते मोती मन के
जो सदा मित्र की तरह साथ दे   
उठा जमीन से बिठा फलक पर दे
एक खोल की तरह
वह छिपाए है अपने भीतर
उन्मुक्त होकर पर्वतों को लाँघ जाओ,
तेज बहती धार में भी या नहाओ !
उससे कुछ भी न बाहर है,
सब कुछ उसको ही जाहिर है
उसके कदमों पर अर्पित कर दो
अपनी मुस्कान की चमक
 धूपबाती बने स्वप्नों की महक
फौलादी इरादे ही आरती का थाल हो
जो सुनाया जाये उसको
अपने दिल की लगन से आगे
न कोई दूसरा हाल हो !

  


बुधवार, दिसंबर 10

जिन्दगी


जिन्दगी

खुद से खुद की पहचान हो गयी
जिन्दगी सुबह की अजान हो गयी

जिनको पड़ोसियों से भी गुरेज हुआ करता था
सारे जहान से जान-पहचान हो गयी

आंसुओं से भीगा रहता था दामन
हर अदा अब उनकी मुस्कान हो गयी

दिलोजां लुटे जाते हैं जमाने पर
दिल से हर शिकायत अनजान हो गयी

फासले खुद से थे हर दर्द का सबब
सुलह खुदबखुद सबके दरम्यान हो गयी



गुरुवार, अप्रैल 24

गुलाब और वह

गुलाब और वह


पूछा गुलाब से
 उसकी ख़ुशी का राज
काँटों में भी मुस्कुराने का
देख अनोखा अंदाज
रंगो-खुशबू की कर रहा था
अनायास ही बरसात
धूप-हवा पानी में
झूमता दिन रात !

बोला, उससे पहले
हँस दिया खिलखिला कर  
हुई दिशाएं लाल
उसकी मोहक अदा पर
चाहा सदा ही गुलाब होना
होकर कभी न पछताया
नहीं कुछ अन्यथा होने का
भाव भी मन में आया
सत्य हूँ सत्य को स्वीकारता
जैसा हूँ उसे ही अपना होना मानता !

चौंका वह बात सुन गुलाब की
कुछ और हो जाने की
जो भीतर जलती थी आग
हो आई बड़ी ही शिद्धत से याद
अचानक उतर गया कोई बोझ भारी मन से
भर गया कण-कण किसी अनजानी पुलक से
एक गहरी मुस्कान भीतर से सतह पर आई
जन्मों से छिपी थी जो तृप्ति छलक आई !




रविवार, फ़रवरी 16

इंतजार इक नयनों में पलने देना

इंतजार इक नयनों में पलने देना


कुछ करना कुछ ना करने की जिद करना
अच्छा है खुद से सब कुछ होने देना

करने में सीमा होगी श्रम भी होगा
अच्छा है बस उसको ही करने देना

जैसे कलियाँ फूल बनी इतराती हैं
किस्मत वाले बन सब कुछ घटने देना

क्या करना जब खबर नहीं कोई इसकी
इक मुस्कान न अधरों से हटने देना

खाली होकर कभी-कभी तो बैठ रहो
मिलजुल रहना रार नहीं तनने देना

हर दिन कुदरत एक चुनौती लाएगी  
दोनों बाहें फैला कर स्वागत करना

कितनी देर लगेगी उससे मिलने में
हौले से बस पलकों को खुलने देना

शुभ करने का दिल चाहे कर ही लेना
पछतावे से दिल का न आँगन भरना

खुला रहे हर पल ही दरवाजा मन का
भेद छिपा कर नहीं कभी उससे रखना

जीवन भर भी मिलने में है लग सकता
एक प्रतीक्षा अंतर में झरने देना






मंगलवार, फ़रवरी 11

कुछ बातें दिल से

कुछ बातें दिल से


शिकायतें कर लीं बहुत जमाने से
सिर कहीं अब तो झुकाया जाये

बोझ ढोयें अच्छाइयों का कब तक
चलो औरों को बेहतर बताया जाये

नेकियाँ कर के भी रोये बुराई कर के भी
आखिर इन्सान को किस तरह हंसाया जाये

उमगती ख्वाहिशें सताती दिलोजान को
  किसी के दर पे उनको चढ़ाया जाये

नेमतें सौंप दे तो बढ़ती ही जाएँगी
कर के अर्पण दुःख को भी घटाया जाये

मुगालता हो गया हासिल कुछ करने का
वरना क्या है जो रब को दिखाया जाये

न कुछ अपना न कुछ हस्ती है हमारी
जान इस सच को जरा मुस्कुराया जाये



सोमवार, सितंबर 23

बच्चे

बच्चे

मुस्कानों की खेती करते
स्वयं हँसते औरों को हँसाते
सदा बिखेरें धूप ख़ुशी की
न गम के बादल उन पर डालो !

अपनापन झलके आँखों से
अधरों से विश्वास टपकता,
जैसे रब से डोर बंधी हो
खुले नहीं ये देखो भालो !

पल-पल में उजास बिखराते
अभी स्वच्छ है पट अंतर का
वे जीवन हैं, वे आशा हैं
न भटकें वे, उन्हें संभालो !

जीवन घट रस से भर लाये
छोटे-बड़े का भेद न जानें,
अपना यह, वह कोई दूजा
उनके दिल में भेद न डालो !

स्वप्न वही हैं मानवता के
मित्र हैं ऐसे निकट हृदय के,
नहीं दिखावट नहीं शिकायत
उनकी फ़ितरत सदा संभालो ! 

रविवार, अप्रैल 14

कोई है


कोई है

कोई है
सुनो ! कोई है
जो प्रतिपल तुम्हारे साथ है
तुम्हें दुलराता हुआ
सहलाता हुआ
आश्वस्त करता हुआ !

कोई है
जो छा जाना चाहता है
तुम्हारी पलकों में प्यार बनकर
तुम्हारे अधरों पर मुस्कान बनकर
तुम्हारे अंतर में
सुगंध बनकर फूटना चाहता है !

कोई है
थमो, दो पल तो रुको
उसे अपना मीत बनाओ
खिलखिलाते झरनों की हँसी बनकर
जो घुमड़ रहा है तुम्हारे भीतर
उजागर होने दो उसे !

कोई है
जो थामता है तुम्हारा हाथ
हर क्षण
वह अपने आप से भी नितांत अपना
बचाता है अंधेरों से ज्योति बन के
समाया है तुम्हारे भीतर
उसे पहचानो
सुनो, कोई है !

शनिवार, मई 21

आज एक पुरानी कविता


याद तुम्हारी

हरी दूब, पंछी के पर सी
छूती मन को आहिस्ता से
कुछ गुनगुन कानों में करती
श्वासों के सँग गिरती-उठती
नीले आसमान सी निर्मल
याद तुम्हारी !

याद तुम्हारी फैली जल में
बिखरी फूल-फूल के दल में
प्रातः पवन में, सांध्य स्वप्न में
छत के हर सूने कोने में
सीढ़ी के खालीपन में भी
पुस्तक के इक इक पन्ने में
याद तुम्हारी !

चिडियों की चीं चीं में मिलती
मिट्टी की खुशबू में खिलती
दूर दूर तक नजर मिलाती
कभी निकट आकर सहलाती
अधरों के स्मित हास में गुपचुप
नयनों की मुस्कान में चुपचुप
मेरे पेन में, बुक शेल्फ में
लिखने वाली मेज पे सोयी
याद तुम्हारी !

अनिता निहालानी
२१ मई २००१