रविवार, नवंबर 28

कहानी एक दिन की

कहानी एक दिन की

दिनकर का हाथ बढ़ा

उजियारा दिवस चढ़ा,

अंतर में हुलस उठी

दिल पर ज्यों फूल कढ़ा !


अपराह्न की बेला

किरणों का शुभ मेला,

पढ़कर घर लौट रहे

बच्चों का है रेला !


सुरमई यह शाम है

तुम्हरे ही नाम है,

अधरों पर गीत सजा

दूजा क्या काम है !


बिखरी है चाँदनी

गूंजे है रागिनी,

पलकों में बीत रही

अद्भुत यह यामिनी !


शुक्रवार, नवंबर 26

जाग भीतर कौन जाने

जाग भीतर कौन जाने  


एक का ही है पसारा

गुनगुनाता जगत सारा,

निज-पराया, अशुभ-शुभता,

स्वप्न में मन बुने कारा !


मित्र बनकर स्नेह करता 

शत्रु बन खुद को डराता, 

जाग कर देखे, कहाँ कुछ ?

सकल पल में हवा होता !


जगत भी यह रोज़ मिटता 

आज में कल जा समाता, 

अटल भावी में  यही कल 

देखते ही जा सिमटता !


नींद में किस लोक में था 

भान मन को कहाँ होता,   

जाग भीतर कौन जाने  

खबर स्वप्नों की सुनाता !


अचल कोई कड़ी भी है  

जो पिरोती है समय को, 

जिस पटल पर ख़्वाब दिखते 

सदा देती जो अभय को !


क्या वही अपना सुहृद जो 

रात-दिन है संग अपने, 

जागता हो हृदय या फिर 

रात बुनता मर्त्य सपने !


बुधवार, नवंबर 24

नया दिन

नया दिन 


मिलता है कोरे काग़ज़ सा 

हर नया दिन 

जिस पर इबारत लिखनी है 

ज्यों किसी ख़ाली कैनवास पर 

रंगों से अनदेखी आकृति भरनी है 

धुल-पुंछ गयीं रात की बरसात में 

मन की गालियाँ सारी 

नए ख़्यालों की जिनसे 

बारात गुजरनी है 

हरेक दिन 

एक अवसर बनकर मिला है 

कई बार पहले भी 

कमल बनकर खिला है 

हो जाता है अस्त साथ दिनकर के 

पुनः उसके उजास में 

 कली उर की खिलनी है 

जीवन एक अनपढ़े उपन्यास की तरह 

खुलता चला जाता है 

कौन जाने किस नए पात्र से 

कब मुलाक़ात करनी है 

हर दिन कोई नया ख़्वाब बुनना है 

हर दिन हक़ीक़त भी 

अपनी राह से उतरनी है 

अनंत सम्भावनाओं से भरा है जीवन 

कौन जाने कब किसकी 

क़िस्मत पलटनी है !




सोमवार, नवंबर 22

खिला-खिला मन उपवन होगा

खिला-खिला मन उपवन होगा 


एक अनेक हुए दिखते हैं 

ज्यों सपने की कोई नगरी, 

मन ही नद, पर्वत बन जाता 

एक चेतना घट-घट बिखरी !


कैसे स्वप्न रात्रि में देखें 

कुछ खुद कुछ अज्ञात तय करे, 

जीवन में भी यही घट रहा 

जगकर देखें कहाँ खो गए !


एक जागरण नित्य प्रातः में 

स्वप्नों से जो मुक्ति दिलाए, 

परम जागरण ऐसा भी है 

जीते जी यह जग खो जाए !


एक तत्व में टिकना हो जब 

जीवन तब क्रीडाँगन होगा, 

अपने हाथों दुःख कब बोए 

खिला-खिला मन उपवन होगा !


जिस क्षण थामी बागडोर निज 

सुख-दुःख की ज़ंजीरें टूटीं, 

इक ही अनुभव व्यापा मन में 

समता उपजी ममता छूटी !



बुधवार, नवंबर 17

मन उपवन

मन उपवन 

शब्दों के जंगल उग आते हैं 

घने और बियाबान 

तो सूर्य का प्रकाश 

नहीं पहुँच पाता भूमि तक 

मन पर सीलन और काई 

की परतें जम जाती हैं 

जिसमें गिरते हैं नए-नए बीज

और दरख्त पहले से भी ऊँचे 

प्रकाश की किरणें ऊपर-ऊपर 

ही रह जाती हैं 

मन की माटी में दबे हैं 

जाने कितने शब्द 

स्मृतियों के घटनाओं 

और पुराने जन्मों के 

उपवन उगाना है तो 

काटना होगा इस जंगल को 

सूर्य की तपती धूप 

झेलनी होगी ताकि 

सोख ले सारी नमी व काई मिट्टी की 

खुदाई कर निकाल फेंकनी होंगी 

पुरानी जड़ें 

व्यर्थ के खर-पतवार 

फिर समतल कर माटी को 

सूर्य की साक्षी में 

नए बीज पूरे होश में बोने होंगे  

तब फूल खिलेंगे श्रद्धा और विश्वास के 

आत्मा का परस जिन्हें हर पल सुलभ होगा ! 


गुरुवार, नवंबर 11

हर कोई अपने जैसा है

हर कोई अपने जैसा है 


न ऐसा न ही वैसा है, बस  

हर कोई अपने जैसा है !


भोला शावक भरे कुलाँचे 

वनराजा की शान अनोखी, 

गाँव की ग्वालिनें प्यारी हैं  

गरिमामयी महारानी भी !


यहाँ न कोई कम या ज़्यादा 

आख़िर नर है न कि पैसा है, 

न ऐसा न ही वैसा है, बस   

हर कोई अपने जैसा है !


कारीगर, मज़दूर  न होते  

महल-दुमहले कैसे बनते,   

अल्पज्ञ, अज्ञानी यदि न हो 

गुरुजनों  को कौन पूछते ! 


मित्र बने समझ यही अपनी

फिर दुःख जीवन में कैसा  है ? 

न ऐसा न ही वैसा है, बस   

हर कोई अपने जैसा है !



 

मंगलवार, नवंबर 9

मन चातक सा तकता रहता


मन चातक सा तकता रहता 


सागर के तट पर बैठा हो  

फिर भी कोई, प्यासा ! कहता, 

जीवन बन उपहार मिला है 

मन चातक सा तकता रहता !


अभी बनी खोयी पल भर में 

लहर जानती कहाँ स्वयं को, 

छोटे से जीवन में अपने 

टकराया करती आख़िर क्यों !


पीड़ा का क्या यही सबब है 

सीमित इक पहचान बनायी, 

माटी का पुतला है यह तन 

स्वप्नों में ही प्रीत रचायी !


कौन जोड़ता है कण-कण को 

किससे मानस क्या बना लहर,

नित्य अजन्मा है असंग जो 

एक तत्व ऐसा भी भीतर ?


रविवार, नवंबर 7

सुनहरे भविष्य की

सुनहरे भविष्य की 

आशा अमरबेल सी 

जीवन के वृक्ष पर लिपटी है 

अवशोषित करती जीवन का रस 

सदा भविष्य के सपने दिखाती 

जबकि प्रीत की सुवास भीतर सिमटी है 

दिन-रात बजते हैं मंजीरे मन के 

मौन जीवन को

सुने भी तो कैसे कोई

दूजे पर ध्यान सदा 

न निजता को चुने कोई 

खुद में जो बसता है 

वही तो मंज़िल है 

प्रेम कहो शांति कहो 

वह अपना ही दिल है 

यहीं घटे अभी मिले वही वह रब है 

कभी गहा कभी छूटा 

जगत यह सब है !



शुक्रवार, नवंबर 5

रहें सदा दिल मिले हमारे

रहें सदा दिल मिले हमारे

ज्योति जले ज्यों हर घर-बाहर 

गलियाँ , सड़कें, छत, चौबारे, 

मन में प्रज्ज्वलित स्नेह प्रकाश 

रहें सदा दिल मिले हमारे !

 

घर-आँगन ज्यों स्वच्छ दमकते 

कोना-कोना हुआ उजागर, 

रिश्तों की यह मधुरिम डाली 

निर्मल भावों से हो भासित !

 

सुस्वादु पकवानों की जहाँ 

मीठी-मीठी गंध लुभाती, 

आत्मीयता, अपनेपन की 

धारा अविरल बहे सुहाती !

 

दीवाली का पर्व अनोखा 

दीप, मिठाई, फुलझड़ियों का, 

ले आता है पीछे-पीछे 

सुखद उत्सव भाई दूज का !

 

तिलक भाल पर हँसी अधर पर 

यह भंगिमा बहन को भाए, 

दुआ सदा यह दिल से निकले

सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य सदा पाएँ !


बुधवार, नवंबर 3

जब अंतरदीप नहीं बाले




जब अंतरदीप नहीं बाले

पूर्ण हुआ वनवास राम का, 
सँग सीता के लौट रहे हैं
 हुआ अचंभा देख लखन को , 
द्वार अवध के नहीं खुले हैं !

अब क्योंकर उत्सव यह होगा, 
दीपमालिका नृत्य करेगी,
रात अमावस की जब दमके, 
मंगल बन्दनवार सजेगी  ! 

हमने भी तो द्वार दिलों के, 
कर दिये बंद ताले डाले
राम हमारे निर्वासित हैं,
जब अंतरदीप नहीं बाले !

राम विवेक, प्रीत सीता है, 
दोनों का कोई मोल नहीं
शोर, धुआँ ही नहीं दिवाली, 
जब सच का कोई बोल नहीं !

धूम-धड़ाका, जुआ, तमाशा, 
देव संस्कृति का हो अपमान,
पीड़ित, दूषित वातावरण है 
उत्सव का न किया सम्मान !

जलें दीप जगमग हर मग हो, 
अव्यक्त ईश का भान रहे,
मधुर भोज, पकवान परोसें
 मन अंतर में रसधार बहे !

सोमवार, नवंबर 1

मर कर जो जी उठा

मर कर जो जी उठा 


​​जीवन का मर्म खुला 

दूजा जब जन्म हुआ, 

मर कर जो जी उठा 

उसको ही भान हुआ !


मृत्यु का खटका सदा 

कदमों को रोकता, 

‘मैं हूँ’ कुछ बना रहूँ 

भाव यही टोकता !


पल-पल ही घट रही 

मृत्यु कहाँ दूर है, 

मन मारा, तन झरा 

जग का दस्तूर है !


दिल में रख आरजू 

जो खुद में खो  गया, 

पकड़ छोड़ अकड़ छोड़ 

रहे, वही जी गया !


जीवन कब सदा रहे 

त्याग का ही खेल है, 

इस क्षण जो जाग उठे

हुआ उससे  मेल है !

शुक्रवार, अक्तूबर 29

टेर लगाती इक विहंगिनी

टेर लगाती इक विहंगिनी


इन्द्रनील सा नभ नीरव है

लो अवसान हुआ दिनकर का,

इंगुर छाया पश्चिम में ज्यों  

हो श्रृंगार सांध्य बाला का !


उडुगण छुपे हुए जो दिन भर

राहों पर दिप-दिप दमकेंगे,

तप्त हुई वसुधा इतरायी

शीतलता चंद्रमा देंगे !


उन्मीलित से सरसिज सर में

सूर्यमुखी भी ढलका सा है,

करे उपराम भास्कर दिन का 

अमी गगन से छलका सा है !


कर-सम्पुट  में भरे पुष्पदल

संध्या वन्द करें बालाएं,

कन्दुक खेलें बाल टोलियाँ

लौट रहीं वन से चर गाएं !


तिमिर घना ज्यों कुंतल काले

संध्या सुंदरी के चहुँ ओर,

टेर लगाती इक विहंगिनी

केंका करते लौटें मोर !




मंगलवार, अक्तूबर 26

जाना है उस दूर डगर पर

जाना है उस दूर डगर पर

दिल में किसी शिखर को धरना
सरक-सरक कर बहुत जी लिए,
पंख लगें उर की सुगंध को
गरल बंध के बहुत पी लिए !

जाना है उस दूर डगर पर
जहाँ खिले हैं कमल हजारों,
पार खड़ा कोई लखता है
एक बार मन उसे पुकारो !

जहाँ गीत हैं वहीं छिपा वह
शब्द, नि:शब्द युग्म के भीतर,
भीतर रस सरिता न बहती
यदि छंद बद्ध न होता अंतर !

सागर सा वह मीन बनें हम
संग धार के बहते जाएँ,
झरने फूटें सुर के जिस पल
 झरे वही, लय में ले जाये !

रिक्त रहा है जो फूलों से
विटप नहीं वह बन कर रहना,
गंध सुलगती जो अंतर में
वह भी चाहे अविरत बहना !

निशदिन जो बंधन में व्याकुल
मुक्त उड़े वह नील गगन में,
प्रीत झरे जैसे झरते हैं
हरसिंगार प्रभात वृक्ष से  !

रविवार, अक्तूबर 24

जब उर अंधकार खलता है

जब उर अंधकार खलता है 


जगमग शिखि समान तब कोई 

सुहृद सहज आकर मिलता है 


 पूर्ण हुआ वह राह दिखाता

नहीं अधूरापन टिकता है 


अविरल बहे काव्य की धारा 

उर मरुथल बन क्यों रहता है 


थिर पाहन सा जब हो मानस 

निर्झर तब उससे बहता है 


प्रीत अगन उसको पिघला दे 

मन जो सघन विरह सहता है 


गुरुवार, अक्तूबर 21

शून्य का अर्थ

शून्य का अर्थ


घुटनों पर नोटबुक कलम हाथ में 

मानो कोरा काग़ज़ आमंत्रण दे 

दिल से होते 

कुछ बंध उतरे 

मन व हाथों में यह कैसा नाता है 

अंतर्जगत को जो पन्ने पर उकेर आता है 

अमूर्त को मूर्त किया 

शब्द का रूप दिया 

उपजे थे चेतना से 

कोई नहीं जिससे परे 

अंतत: शून्य को ही 

 कलम पन्ने पर उतारती 

लाख प्रयत्न करें पर 

जिसे हम पढ़ नहीं पाते 

क्या इसीलिए लोग कविता के 

अपने-अपने अर्थ लगाते !


मंगलवार, अक्तूबर 19

इतिहास बार-बार दोहराता है स्वयं को

इतिहास बार-बार दोहराता है स्वयं को 

मंदिर तोड़े जा रहे हैं 

खंडित हो रही हैं मूर्तियाँ 

धर्म के नाम पर अत्याचार और हैवानियत का 

एक बार फिर प्रदर्शन है 

जाने यह कैसा विचित्र दर्शन है 

जिसमें दूरियाँ पाटी नहीं जा सकीं 

शताब्दियों में भी 

एक अंधी मानसिकता पनप रही है 

जो असहिष्णु तो है ही 

मान लिया लिया है जिसने स्वयं को श्रेष्ठ 

जो धर्म आदमी में ख़ुदा नहीं देख पाता 

वह कैसे राह दिखाएगा 

अबोध भेड़ों की तरह जिधर चाहे कोई भी

 हांकता हुआ ले जाता है 

जियो और जीने दो का मंत्र नहीं आता जिसे

 देखें, वह कब तक स्वयं को बचा पाता है !