मंगलवार, मई 18

जीवन तो है इक क्रीड़ांगन

जीवन तो है इक क्रीड़ांगन

जीवन जो उपहार मिला था 

उसे व्यर्थ ही बोझ बनाया,

घड़ी देखकर जगते-सोते 

रिश्तों को भी सोच बनाया ! 


तन-मन जैसे यंत्र बन गए  

अब स्वत:स्फूर्त कहाँ है घटता,  

वही सवाल, जवाब भी वही 

गुम हो गयी उर की सरसता !


नहीं शेष सुवास साँसों में

जब भी वे लघु होती जातीं, 

जितना बड़ा दायरा दिल का 

उतना खुद को वे फैलातीं !


गहराई जब मन में होगी 

होगी गहरी लंबी सांसें, 

भय से भरा हुआ जब अंतर 

कंपन से भर जाती सांसें !


नहीं भूमि यह संघर्षों  की 

जीवन तो है इक क्रीड़ांगन, 

छोटे-छोटे अनुभव मिलते

कण-कण में हो पावन दर्शन !


कुदरत का सान्निध्य अनूठा 

श्रम के स्वेद बिंदु  मस्तक पर, 

जीवन एक खेल बन जाता 

चाह नहीं जब भारी मन पर !

 

सोमवार, मई 17

आदमी


आदमी 

राहबर आये हजारों इस जहाँ में 
आदमी फिर भी भटकता है यहाँ पर !

बेवजह सी बात पर भौहें चढ़ाता  
राह तकता है भला बन शांति की फिर

आदतों के जाल में जकड़ा हुआ पर 
किस्से मुक्ति के सुनाता जोश भर कर  

खुद ही गढ़ता बुत उन्हीं से मांगता 
जाने कितने स्वांग भरता भेष धर कर 

इस हिमाकत पर न सदके जाये कौन 
हर युद्ध करता शांति का नाम लेकर  !

उल्टे-सीधे काम भी सभी हो रहे 
है रात-दिन जब मौत का जारी कहर  !
 

रविवार, मई 16

उसी शाश्वत में टिकना है


उसी शाश्वत में टिकना है 

मिलना लहरों का क्या आखिर 
अभी बनी हैं अभी बिखरती 
सागर गहरा और अथाह है 
कितने तूफान उठते उसमें 
फिर भी देखो, बेपरवाह है ! 
पवन डुलाती लहरें उसमें  
बड़वानल भी इस सागर में 
फिर भी जरा सोच कर देखें 
जल का ही संग्रह विशाल है 
सागर यदि सूख भी जाए 
जल का न होता अभाव है 
इस प्रपंच का एक तत्व है ! 
ठहरा  है वह वसुंधरा पर
टिकी हुई जो नीले नभ में 
पंच तत्व के पार भी कुछ है 
जो इन सबको जान रहा है 
ज्ञान सदा ही बड़ा ज्ञेय से 
क्यों न सबका उसे श्रेय दें 
ज्ञाता में ही ज्ञान छिपा है 
उसी शाश्वत में टिकना है 
वहीं सहजता वहीं सरसता
वहीं कमल बन कर खिलना है ! 



 

शनिवार, मई 15

शून्य हो पाथेय अपना

 शून्य हो पाथेय अपना 

अंतहीन है जीवन का यह सफर 

 इस पर थोड़ा भी कम पड़ जाता है 

और ज्यादा भी काम नहीं आता 

अनंत हो जिसका फैलाव 

उसमें भला अल्प कब तक साथ देगा 

और कितना भी ज्यादा हो 

कम ही लगेगा 

चादर कितनी भी फैलाओ 

पैर बाहर निकले आते हैं 

छोटी पड़ जाती है दो अंगुल 

हर बार रस्सी, 

भला इस जग के सामान 

वहाँ कब तक  काम आते हैं 

चलना है अनंत की यात्रा पर तो 

शून्य हो पाथेय अपना 

खाली हो जाये सारे उहापोहों से मन 

टूट जाये हर सपना

 तो जो यात्रा होगी उसकी मंजिल

 झट मिल जाएगी 

जिंदगी बिन बात ही खिल जाएगी ! 


मंगलवार, मई 11

शिक्षा को मूल्यों से भर लें

शिक्षा को मूल्यों से भर लें


अंतरिक्ष तक जा पहुँचा है 

अनगिन तारा मण्डल खोजे, 

सागर की गहराई नापी 

किन्तु हुआ बेबस नर सोचे !


भेद दिया परमाणु मनुज ने 

विनाशकारी बम बरसाया, 

लाखों लोगों को इक पल में 

मृत्यु के आँचल में सुलाया !


सूक्ष्म की ताकत अपरिमित है 

मानव से बढ़ कौन जानता, 

सूक्ष्म तरंगों के बल पर ही 

वर्ल्ड वाइड वेब  रच डाला !


किन्तु सूक्ष्म से लड़ना होगा 

इसकी शायद खबर नहीं थी, 

चिकित्सा पद्धति की सीमा है 

इस तत्व पर नजर नहीं थी !


अभी नहीं था अवगत इससे 

सूक्ष्म जगत भी एक यहां है, 

जीवाणु, विषाणु भी अनेकों 

जिनका बहुत प्रकोप सहा है !


अब भी जाग सकें तो जागें 

जीवन में परिवर्तन कर लें, 

झुकें परम शक्ति के सम्मुख 

शिक्षा को मूल्यों से भर लें !

 

सोमवार, मई 10

कोरोना काल

 कोरोना काल 

 यह कैसा युग आया है 

मोबाइल से दूर रहो यह कहते नहीं थकते थे जो 

अब उसी के सहारे उनकी पढ़ाई करवा रहे हैं 

निकट न जाओ दादा-दादी, नाना-नानी के  

बच्चों को यह पाठ सिखा रहे है

जब पॉजिटिव होना दुर्भाग्य पूर्ण है 

और निगेटिव होना ख़ुशी की बात 

जब मिलजुल कर रहना है शिष्टाचार के खिलाफ 

 और आपस में दूरियां बनाना 

समझदारी का निशान

पहले बीमार होने पर लगता था टीका

स्वास्थ्य की गारंटी  है अब इसे  लगवाना

आईसीयू में जाना था अति अफ़सोस का कारण 

आज आईसीयू में बेड मिल गया तो 

सन्तोष की साँस लेते हैं परिजन 

कोरोना काल में बदल ही गए हैं 

कितने मूल्य और शिष्टाचार के मापदंड

 परिजन या मित्र की मिजाजपुर्सी तो दूर रही 

अब कोई नहीं जाता मातम मनाने 

कोरोना ने दिए हैं इतने जख्म 

कि भूल ही गए हैं लोग कब बदला मौसम 

कब छाये आकाश पर बादल सुहाने !


शनिवार, मई 8

उसी मूल से मन आया है

उसी मूल से मन आया है

नीलगगन पर तिरते मेघा 

सूर्य-चन्द्र, तारागण अनुपम, 

धार अनूठी, नीर सुवासित 

कुदरत की यह महिमा मधुरिम !


अभिनव किसी स्रोत से उपजे 

उसी मूल से मन आया है, 

मधुराधिपति का भव अष्टधा  

मन से ही उपजी काया है ! 


वही चेतना सुंदर बनकर 

बिखर गयी कण-कण में जग के, 

सत्यम शिवम सुंदरम् की ही  

अभिव्यक्ति हो बस जीवन में ! 


हास्य मधुर हो, वाणी मीठी 

रसमय चितवन, याद अनूठी, 

शब्द-शब्द रस से भीगा हो 

एक खानि है भीतर रस की !


आत्मस्रोत चैन का उद्गम 

गंगा सा निर्मल बह जाए,  

सृजन घटे छाया है उसकी 

वही सदा अंतर को भाए !


गुरुवार, मई 6

एक दिन

एक दिन  
अनंत है सृष्टि का विस्तार
अरबों-खरबों आकाशगंगाएं हैं अपार
जिनमें अनगिनत तारा मण्डल 

और न जाने कितनी पृथ्वियाँ होंगी 

कितने सौर मण्डल

 जानते हैं इस ब्रह्मांड के बारे में कितना कम 

ब्रह्मांड को छोड़ें तो इस पिंड से भी 

कितने अनभिज्ञ हैं हम 

जैसे जल में मीन 

वैसे हवा में यह तन 

प्राण ऊर्जा जो इस देह को चलाती है 

श्वास के माध्यम से भी भीतर आती है 

शक्ति से भरती है 

भोजन को पचाती 

रक्त को गति देती है 

देह टिकी है जिस पर 

पर आज एक विषाणु ने रोक दिया है 

उसका निर्बाध  विचरण 

फिर भी याद रहे 

ऊर्जा शाश्वत है विषाणु नश्वर 

उसे हराया जा सकता है 

भय को त्याग कर 

स्वयं को सशक्त बनाया जा सकता है 

एक न एक दिन मानवता उससे मुक्ति पा ही लेगी 

उस दिन फिर से गूंजेगी स्कूलों में बच्चों की आवाजें 

और उनके गीतों से फिजा महकेगी ! 


मंगलवार, मई 4

चेतन भीतर जो सोया है

चेतन भीतर जो सोया है


बीज आवरण को ज्यों भेदे  

धरती को भेदे ज्यों अंकुर, 

चेतन भीतर जो सोया है 

पुष्पित होने को है आतुर !


चट्टानों को काट उमड़ती 

पाहन को तोड़ती जल धार,

नदिया बहती ही जाती है 

रत्नाकर से है गहरा प्यार !


ऐसे ही भीतर कोई है 

युगों-युगों से बाट जोहता,

मुक्त गगन का आकांक्षी जो  

उसका रस्ता कौन रोकता !


धरा विरोध करे ना कोई 

पोषण देकर उसे जिलाती, 

अंकुर को बढ़ने देती है

लिए मंजिलों तक फिर जाती  


चट्टानें भी झुक जाती हैं 

मिटने को तत्पर जो सहर्ष, 

राह बनातीं, सीढ़ी बनतीं 

नहीं धारें तिल मात्र अमर्ष !


लेकिन हम ऐसे दीवाने 

स्वयं के ही खिलाफ खड़े हैं, 

अपनी ही मंजिल के पथ में 

बन के बाधा सदा अड़े हैं !  


जड़ पर बस चलता चेतन का 

मन जड़ होने से है डरता,

पल भर यदि निष्क्रिय हो बैठे 

चेतन भीतर से पुकारता !


लेकिन मन को क्षोभ सताए  

अपना आसन क्यों कर त्यागे, 

जन्मों से जो सोता आया 

कैसे आसानी से जागे !


दीवाना मन समझ न पाए 

जिसको बाहर टोह रहा है, 

भीतर बैठा वह प्रियतम भी 

उसका रस्ता जोह रहा है ! 

 

सोमवार, मई 3

टूटते ख्वाब


टूटते ख्वाब


महसूस करें तो दुख बहुत है बाहर 

भीतर कुछ और क्यों बनाया जाए 


गुजर जाएगा वक्त ही है आखिर यह 

बुरा कहकर क्यों खुद को सताया जाए 


लगा हुआ है हर शख्स अपनी कुव्वत से 

कैसे वायरस को जिस्म से भगाया जाए 


दम तोड़तीं श्वासें कभी जलती हुईं देहें 

किस-किस मंजर से ध्यान अपना हटाया जाए 


बहुत बेमुरव्वत है जिंदगी सुना तो था 

छोटे बच्चों को कैसे यकीं दिलाया जाए 


टूटते ख्वाबों  को देखा है हर किसी  ने  

टूटती साँसों को किस तरह बचाया जाए 


खत्म होगी दुनिया कभी किताबों में पढ़ा था 

कतरा-कतरा क्यों इसका वजूद मिटाया जाए 

 

रविवार, मई 2

मन निर्मल इक दर्पण हो

मन निर्मल इक दर्पण हो


लंबी गहरी श्वास भरें 

वायरस का विनाश करें, 

प्राणायाम, योग अपना 

अंतर में विश्वास धरें !


उष्ण नीर का सेवन हो 

उच्च सदा ही चिंतन हो, 

परम सत्य तक पहुँच सके  

मन निर्मल इक दर्पण हो !


खिड़की घर की रहे खुली

अधरों पर स्मित हटे नहीं, 

विषाणु से कहीं बड़ा है

साहस भीतर डटें वहीं !


नियमित हो जगना-सोना

स्वच्छ रहे घर, हर कोना, 

स्वादिष्ट, सुपाच्य आहार    

मुक्त हवा आना-जाना !


नयनों में पले विश्वास 

मन को भी न करें उदास, 

पवन, धूप, आकाश, नीर  

परम शक्ति का ही निवास !


मुक्ति का अहसास मन में 

चाहे हो पीड़ा तन में,

याद रहे पहले कितने  

फूल खिले इस जीवन में !

 

शुक्रवार, अप्रैल 30

घड़ी विचित्र यह दौर अनोखा

घड़ी विचित्र यह दौर अनोखा


जूझ रहा है देश आजकल 

जिस विपदा से वह है भारी,

तुच्छ हुई है सम्मुख उसके 

जो कुछ भी की थी तैयारी !


हैं प्रकृति के नियम अनजाने 

मानव जान, जान न जाने, 

घड़ी विचित्र यह दौर अनोखा 

कभी न पहले ऐसा देखा !


कोटि-कोटि जन होते पीड़ित 

उतनी हम सांत्वना बहायें,

भय आशंका के हों बादल 

श्रद्धा का तब सूर्य जलाएं !


पृथ्वी का जब जन्म हुआ था 

अनगिन बार बनी यह बिगड़ी,  

प्रलय भी झेली, युद्ध अनेक

 महामारियों की विपदा भी !


किन्तु सदा सामर्थ्यवान हो 

विजयी बन वसुधा उभरी है 

इसकी संतानों की बलि भी 

व्यर्थ नहीं कभी भी हुई है 


सब जन मिलकर करें सामना 

इक दिन तो यह दौर थमेगा, 

मृत्यु-तांडव, विनाशी-लीला  

देख-देख मनुज संभलेगा !


जीतेगी मानवता इसमें 

लोभी मन की हार सुनिश्चित, 

जीवन में फिर धर्म जगेगा 

मुस्काएगी पृथ्वी प्रमुदित !


 

मंगलवार, अप्रैल 27

पावन परिमल पुष्प सरीखा

पावन परिमल पुष्प सरीखा
एक चेतना! चिंगारी हूँ
एक ऊर्जा सदा बहे जो,
सत्य एक धर रूप हजारों
परम सत्य के संग रहे जो !

अविरत गतिमय ज्योतिपुंज हूँ
निर्बाधित संगीत अनोखा,
सहज प्रेम की निर्मल धारा
पावन परिमल पुष्प सरीखा !

चट्टानों सा अडिग धैर्य हूँ
कल-कल मर्मर ध्वनि अति कोमल,
मुक्त हास्य नव शिशु अधरों का
श्रद्धा परम अटूट निराली !

अन्तरिक्ष भी शरमा जाये
ऐसी ऊँची इक उड़ान हूँ,
पल में नापे ब्रह्मांडों को
त्वरा युक्त इक महायान हूँ !

एक शाश्वत सतत् प्रवाह जो 
शिखरों चढ़ा घाटियों उतरा,
पाया है समतल जिसने अब
सहज रूप है जिसका बिखरा !

सोमवार, अप्रैल 26

रहमतें बरसती हैं

 

रहमतें बरसती हैं

करें क़ुबूल सारे गुनाहों को हम अगर

रहमतें बरसती हैं, धुल ही जायेंगे 


हरेक शै अपनी कीमत यहाँ माँगे 

 भला कब तक चुकाने से बच पाएंगे 


 वही खुदा बसता सामने वाले में भी

 खुला यही राज कभी तो पछतायेंगे 


मांग लेंगे करम सभी नादानियों पर 

और अँधेरे में मुँह नहीं छुपायेंगे 


उजाले बिखरे हैं उसकी राहों में 

 यह अवसर भला क्यों चूक जायेंगे 


अपनी ख्वाहिशें परवान चढ़ाते आये 

अब उसी मालिक के तराने गाएंगे 


भूख से ज्यादा मिला प्यास फिर भी न बुझी 

 आखिर कब तक यह मृगतृषा बुझाएंगे 

 

शनिवार, अप्रैल 24

वासन्ती प्रभात

 वासन्ती प्रभात 

जन्म और मृत्यु के मध्य 

बाँध लेते हैं हम कुछ बंधन

जो खींचते हैं पुनः इस भू पर 

भूमिपुत्र बनकर न जाने कितनी बार बंधे हैं 

अब पंच तत्वों के घेरे से बाहर निकलना है 

पहले निर्मल जल सा बहाना है मन को 

फिर अग्नि में तपना है 

होकर पवन के साथ एकाकार 

घुल जाना है निरभ्र आकाश में 

फिर आकाश से भी परे 

उस परम आलोक में जगना है 

जहां कभी दिन होता न रात 

सदा ही रहता है वासन्ती प्रभात 

जहाँ द्रष्टा और दर्शन में भेद नहीं 

जहाँ दर्शन और दृश्य में अभेद है 

आनंद के उस लोक में 

जहां आलोक बसता है 

वाणी का उदय होता है 

मौन के उस अनंत साम्राज्य में 

जहाँ चेतना निःशंक विचरती है 

अहर्निश कोई नाम धुन गूँजती है 

शायद वही कृष्ण का परम धाम है 

जहाँ मन को मिलता विश्राम है !