रविवार, अगस्त 1

टूटी अंतर की हर कारा

टूटी अंतर की हर कारा 

जिस क्षण तजा प्रमाद मनस ने 
एक उमंग सहज भर जाती, 
कुछ पाने की मिटी चाह जब 
हर दुविधा भी संग मर जाती !

लोभ-लाभ की भाषा भूली 
प्रतिद्वंद, स्पर्धा भी छूटे, 
चित्त उदार बनेगा, उस क्षण 
आनंद घट हृदय में फूटे !

कंपित था भयभीत हुआ मन 
खो जाए ना प्रेम किसी क्षण, 
अभय मिला बाँटा भी सबको 
शुभ  का निर्झर फूटा उर में !

भय की इक चट्टान पड़ी थी 
रोक रही थी प्रेमिल धारा, 
 राह उसी की चला दो कदम 
टूटी अंतर की हर कारा !

दुःख के बादल सदा घिरे थे 
सुख का सूरज कब दिखता था, 
जब से झुका हृदय चरणों पर 
मिटा विषाद अमोद बहा था !


शुक्रवार, जुलाई 30

एकांत और अकेलापन

एकांत और अकेलापन 

अकेलापन खलता है 

एकांत में अंतरदीप जलता है 

अकेलेपन के शिकार होते हैं मानव 

एकांत कृपा की तरह बरसता है !

जब भीड़ में भी अकेलापन सताए 

तब जानना वह एकांत की आहट है 

जब दुनिया का शोरगुल व्याकुल करे 

तब मानो एकांत घटने की घबराहट है !

अकेलापन दूजे की चाहत से उपजता है 

एकांत हर चाहत को गिरा देने का नाम है 

जब भीतर सन्नाटा हो इतना 

कि दिल की धड़कन सुनायी दे 

जब श्वासों में अनाम गूंजने लगे 

तब उस एकांत में एक मिलन घटता है 

मिटा देता है अकेलेपन का हर दंश जो सदा के लिए 

उसी मिलन का आकांक्षी है हर मन 

जो अकेलेपन में वह खोजता है 

यही अकेलापन बदल जाएगा एकांत में एक दिन 

और अपनेआप से मुलाक़ात होगी 

फिर तो दिन-रात कोई साए की तरह साथ रहेगा 

जब चाहा उससे बात होगी ! 


मंगलवार, जुलाई 27

अस्तित्त्व

अस्तित्त्व 

जब अंतर झुका हो 

तब अस्तित्त्व बरस ही जाता है 

कुछ नहीं चाहिए जब 

तब सब कुछ अपनत्व की 

डोर से बंध जाता है 

कदमों को धरा का परस

माँ की गोद सा लगता 

सिर पर आकाश का साया 

पिता के मोद सा 

हवा मित्र बनकर सदा साथ है 

जल मन सा बहता भीतर 

अनल प्रेम की सुवास है 

हर घड़ी कोई आसपास है  

जब अनंत का स्पर्श किया जा सकता हो 

तो कोई क्यों बंधन सहे 

जब अनायास ही बरसता हो आनंद 

तो क्यों कोई क्रंदन बहे 

बस जाग कर देखना ही तो है 

स्वप्न में जी रहे नयनों को  

अपना मुख मोड़ना ही तो है 


शनिवार, जुलाई 24

गुरु पूर्णिमा पर हार्दिक शुभकामनाएँ

गुरु पूर्णिमा 


गुरु बंधन से मुक्त कराते 
​​​​​​​​अंधकार में भटक रहे जो, 
उन जीवों को, शुभ प्रकाश का 
अनुपम सुंदर मार्ग दिखाते !

छुपी हुए अपनी नज़रों से 
स्वयं के भीतर जो शक्ति है, 
आत्मज्योति प्रज्ज्वलित करके 
उससे शुभ परिचय करवाते !

ज्ञान, क्रिया, भजनों  के द्वारा 
शुद्ध करें मन, बुद्धि सहज ही, 
महाप्रेम से करुणामय वह 
फिर अनंत पथ पर ले जाते !

मूर्त रूप हैं ज्ञान-भक्ति का
गुरु की महिमा कौन जानता
नज़रों से हर ताप मिटाते
वचनों से सदा अमृत बहता !

संतों की वाणी अनुपम है 
गुरू पूर्णिमा स्मरण दिलाती, 
चरणों पर यदि शीश झुका हो 
आनंद वर्षा में सिझाती  !


गुरुवार, जुलाई 22

एक चिंगारी असल की

एक चिंगारी असल की 

दर्द भीतर सालता जो 

प्रेम बनकर वह बहेगा,  

भूल चुभती शूल बनकर 

पंक से सरसिज खिलेगा !


खोल दो हृदय को अपने 

जब साथ है रहबर खड़ा, 

लक्ष्य अपना एक हो तो 

विष  यहाँ अमीय बनेगा !


परख लो हर बात अपनी 

बनी हो चाहे बिगड़ती,  

सत्य का दामन न छोड़ा 

झूठ फिर कब तक टिकेगा !


सौ भ्रमों से ढका हो मन 

ज़िंदगी आसान लगती, 

एक चिंगारी असल की 

खेल फिर कब तक टिकेगा !


हुआ सच से सामना जब 

नहीं कोई ठौर मिलता, 

नींद स्वप्नों से भरी हो 

जागना इक दिन पड़ेगा !




सोमवार, जुलाई 19

लुटाता सुवास रंग

लुटाता सुवास रंग 

तृप्ति की शाल ओढ़े 
खिलता है हरसिंगार, 
पाया जो जीवन से 
बाँट देता निर्विकार !

कंपित ना हुआ गात 
घाम, मेह, शीत आए, 
तपा, भीगा, झूमता 
फूलों में मुस्कुराए !

जीवित है काफ़ी है 
नहीं कोई माँग और, 
लुटाता सुवास रंग 
रात खिलता झरे भोर !

एक उसी जगह खड़ा 
राही थम जाते सभी, 
देखते निगाहें भर 
सुवास मधुर जाएँ पी !

जीवन भी ऐसा ही 
है भीतर समान सदा,
देता रहे अनगिनत 
अहर्निश वरदान प्रदा !


शनिवार, जुलाई 17

ध्यान


ध्यान 

जब हम बोलते हैं 

भीतर या बाहर

तो दूसरा रहता  है 

जब चुप रहते हैं 

तो कोई दूसरा नहीं होता 

एक हो जाती है सारी कायनात 

जब घटता है मौन

भीतर या बाहर

फिर जहाँ न राग रह  जाता है न द्वेष 

न सुख और न ही दुःख 

जहाँ खुद से मिलना होता है 

और मृत्यु का भय भी खो जाता है 

उस मौन को पा लेना ही ध्यान है 

यही स्रोत है जीवन का 

शायद यहीं रहते भगवान हैं !


बुधवार, जुलाई 14

मौन

मौन 

एक नज़र ही काफ़ी है 

किसी के दिल का हाल जानने के लिए 

एक मुस्कान भरा आश्वासन 

एक शांत मुद्रा 

शब्दों की एक सीमा है 

जो नि:शब्द को पढ़ लेता है 

वह मुक्ति की तरफ कदम बढ़ा रहा है 

प्रकृति चुप रहकर भी मुखर है 

चाँद हजार सालों से बातें करता है प्रेमियों से 

हवा कानों में कुछ कह जाती है 

नदी बोलती है 

पेड़ और पुष्प भी 

हम भूल गए हैं चुप्पी की भाषा

दिन भर कानों में लगाए इयरफोन 

दिल की आवाज़ भी नहीं सुन पाते 

परम मौन है 

उसे मौन में ही सुना जाता है !



सोमवार, जुलाई 12

चंद ख़्याल


चंद ख़्याल 



पाया हुआ है सब जो खोजते हैं हम 
शब्दों में ज्ञान बसता दिल का था भरम 
-
जाना हुआ सभी कहता है छोटा मन 
कोई कमी नहीं तो फिर क्यों करे जतन 
-
छोड़ा यहाँ बाँधा वहाँ 
मुक्ति से डरता है जहां 
-
मुश्किलों से डर जो ख़ुदा के द्वार आए 
पाए नहीं उसे बस पीड़ा को बढ़ाए 
-
स्वप्नों में भयभीत हुआ मन 
सीमाओं में खुद को बाँधा 
  कहीं नहीं थी कोई सीमा
जब भी आँख खोल कर देखा 

गुरुवार, जुलाई 8

एक हँसी दिल में खिलती है


एक हँसी दिल में खिलती है 


एक अगन भीतर जलती है 
जला दें जाले पड़े जो मन 
पर, हसरत यही मचलती है !

एक लगन भीतर पलती है
पार करें हर इक बाधा को,  
मेधा भी तभी निखरती है ! 

एक आस मन में बसती है 
वैर मिटे आपसी दिलों से, 
प्रकृति यह तभी सवंरती है !

एक हँसी दिल में खिलती है 
गहराई में मोती मिलते, 
हर हलचल वहाँ ठहरती है !


सोमवार, जुलाई 5

जैसे कोई द्वार खुला हो

 जैसे कोई द्वार खुला हो

भीतर-बाहर सभी दिशा में

बरस रहा वह झर-झर-झर-झर,

पुलक उठाता होश जगाता

भरता अनुपम जोश निरंतर !


जैसे कोई द्वार खुला हो

आज अमी की वर्षा होती,

आमन्त्रण दे मुक्त गगन भी

धार सहज ही रहे भिगोती !


रंचमात्र भी भेद नहीं है

जल से जल ज्यों मिल जाता है,

फूट गयीं दीवारें घट की

दौड़ा सागर भर जाता है !


मेघपुंज बन कभी उड़े मन

कभी हवा सँग नृत्य कर रहा,

पीपल की ऊँची फुनगी पर

खगों के सुर में सुर भर रहा !


कभी दिशाएं हुईं सुवासित

सुख सौरभ चहुँ ओर बिखरता,

धूप रेशमी उतरी नभ से

जल कण से तृण कोर निखरता !


तन का पोर-पोर कम्पित है

गूँज इस ब्रह्मांड की सुनता,

उर बौराया चकित हुआ सा

देख-देख नव सपने बुनता !


शनिवार, जुलाई 3

दिल को अपने क्यों नहीं राधा करें

दिल को अपने क्यों नहीं राधा करें


जिंदगी ने नेमतें दी हैं हजारों 

आज उसका शुक्रिया दिल से करें, 

चंद लम्हे ही सदा हैं पास अपने 

क्यों न इनसे गीत खुशियों के झरें !


दिल खुदा का आशियाना है सदा से 

ठहर उसमें दर्द हर रुखसत करें, 

आसमां हो छत धरा आंगन बने 

इस तरह जीने का भी जज्बा भरें !


वह बरसता हर घड़ी जब प्रीत बन 

मन को अपने क्यों नहीं राधा करें, 

दूर जाना भी, बुलाना भी नहीं 

दिल के भीतर साँवरे नर्तन करें !


झुक गया यह सिर जहाँ भी सजदे में 

वह वही है, क्यों उसे ढूंढा  करें, 

मांगना है जो भी उससे माँग लें 

मांगने में भी भला क्यों दिल डरें !


उर खिलेगा जब उठेगी चाह उसकी 

फूल बगिया में अनेकों नित खिलें, 

शब्द का क्या काम जब दिल हो खुला 

भाव उड़के सुरभि सम महका करें !

 

शनिवार, जून 26

वह

वह 


मौन को कैसे लिखें अब 

भाव भी तो सारे अमूर्त ही हैं 

  वह अलख अपनी उपस्थिति 

 हर पल  दर्ज कराता है 

सदा साथ है, यह अहसास ही दिल को 

अपरिमित शक्ति से भर जाता है !


झर-झर बहता है   

ज्यों निर्झर वीराने वन में 

उसकी कृपा ऐसे ही बरसती है 

सुवास छिपी हुई ज्यों पुहुपों में 

अनायास ही बिखरती है 


मन अन्तर्लोक में थिरकता  

ज्यों नाचते हैं मयूर कानन में

उसके होने से ही रोशन है हर शै 

 छिपा वही तो है हर बात में  !

 

बुधवार, जून 23

कुसुमित हुआ हो जैसे बीज


कुसुमित हुआ हो जैसे बीज

एक ऊर्जा है अनाम जो
खींच रही सदा अपनी ओर,
पता ठिकाना कौन जानता  
जिगर दीवाना जिसका मोर !

प्रेम उमगता भीतर आता
कहाँ से ? यही खबर न मिलती,
जिसकी तरफ उमड़ती धारा
जरा भनक ना उसकी पड़ती !

हृदय पिघलकर बहता जाता
राहें नहीं नजर आती है,
‘मैं’ खोया अशेष ‘वह’ कैसे
उसकी छाया मिट जाती है !

कण-कण में मधु बिखरा जिसका
कैसे एक दिगंत समाए,
हर इक घड़ी अमी बन जाती 
मिटकर ही अनंत को पाए !

तृप्त हुआ फिर डोले उर यह
कुसुमित हुआ हो जैसे बीज,
मंजिल पर ज्यों राह आ मिली
छूट गयी पथ-सफ़र की प्रीत !