रविवार, दिसंबर 4

लहरें और सागर



लहरें और सागर


लहर पोषित करती है स्वयं को 

सागर पूर्णकाम है 

लहार  चाह से भरी  है 

सागर  तृप्त  है

लहर दौड़ लगाती है 

शायद दिखाना चाहती है शौर्य तटों को 

सागर के सिवा कोई दूसरा नहीं 

दिखाए भी किसे 

लहर विशिष्ट है 

सागर निर्विशेष 

वह शुद्ध, बुद्ध 

मुक्त, तृप्त और आनंद स्वरूप है 

लहर की नज़र सदा अन्य पर रहती है 

सागर स्वयं में ठहरा है 

जब तक मिला नहीं सागर भीतर 

मन की लहर ही चलाती है 

सुख-दुःख झूले में झुलाती है 

सागर जुड़ा है अस्तित्व से 

लहर दूरियाँ बढ़ाती है 

सदा किसी तलाश में लगी 

कुछ न कुछ पाने की जुगत लगाती 

सागर में होना 

जगत नियंता के चरणों में बैठना है 

लहर से सागर की खोज एक यात्रा है 

 आनंद से भर  सकता है 

इस यात्रा का हर पल

यदि कोई लहर थम जाए 

और जान ले अपना सागर होना

 पल भर के लिए  !


सोमवार, नवंबर 28

सदा पुकारे जाता था वह

 सदा पुकारे जाता था वह

​​बढ़े हाथ को थामा जिसने 

पग-पग  में जो सम्बल  भरता,  

वही परम हो लक्ष्य हमारा 

अर्थवान जीवन को करता !


जन्मों से जो खोज चल रही 

अनजाने में हदें टटोलें, 

उसी प्रेम की है तलाश जो 

अंतर मन का पट जो खोले !


अब जाकर तो भान हुआ है 

सदा पुकारे जाता था वह, 

ठुकराया था भ्रमित हृदय ने 

अपनी निजता में सिमटे रह !


वही प्रेम वह  कोमल  करुणा

सहज  शांति, क्षमता भी देता, 

रग-रग में उल्लास जगाकर 

अर्थ अनंत  जगत  में भरता !


वही ध्येय वह प्राप्य बने जब 

शेष सहायक बन जाता है, 

वरना आते-जाते जग में 

निष्फल स्वेद बहा जाता है !




शुक्रवार, नवंबर 25

हीरा मन

हीरा मन 


अँधेरे में टटोले कोई 

और हीरा हाथ लगे 

जो अभी तराशा नहीं  गया है 

पत्थर और उसमें  नहीं है कोई भेद

ऐसा ही है मानव का मन 

वही अनगढ़ हीरा लिए फिरता है आदमी 

अभी जड़ है देह 

और प्राणों में तीव्रता है उन्माद की 

जो  बहुत दूर नहीं ले जा पाती  

नकार की आदत 

हिंसा को जन्माती 

परिस्थितयां घिसेंगी पत्थर  को 

तो चमक उठेगा किसी  दिन  

पर अभी बहुत दूर जाना है 

कठोर राहों पर घिसाना है 

जब पारदर्शी होगा मन 

तो दुनिया भी आड़े नहीं आएगी 

भीतर कैद ज्योति 

पूरी शान से जगमगाएगी ! 

 

गुरुवार, नवंबर 24

स्वप्न भारत का

स्वप्न भारत का


काश ! रशिया को भी 

सदस्यता देने को राजी हो जाये नाटो 

और बाइडेन गले लगा लें पुतिन को 

चाइना ताइवान को आँख दिखाना बंद करे 

और छोटे भाई उत्तर कोरिया 

को भी यही सिखा दे 

कि भूल जाये साऊथ कोरिया से दुश्मनी 

और दोनों देश दोस्त बनें 

यदि पाकिस्तान के सारे आतंकवादी 

रातोंरात सुधर जाएँ 

और तालिबान इक्कीसवीं सदी में जाग जाएँ 

यदि सारा यूरोप अपने वैभव का मुलम्मा उतार 

दुनिया को एक नजर से देखे 

अफ़्रीकी देशों में शिक्षा प्रचार प्रसार हो 

बन्द हो जाये बन्दूकों के कारखाने 

और वैज्ञानिक  मिसाइल 

बनाना बंद कर दें 

यह भारत का स्वप्न है 

और यह स्वप्न जब  हकीकत बनेगा 

तब ही यह  विश्व बचेगा ! 


बुधवार, नवंबर 23

उस भली सी इक ललक को

उस भली सी इक ललक को

   

जिस घड़ी आ जाये होश 

जिंदगी से रूबरू हों,

उसी पल में ठहर कर फिर 

 झांक लें खुद के नयन में !


बह रही जो खिलखिलाती 

गुनगुनाती धार नदिया,

चंद बूँदें ही उड़ेलें 

उस जहाँ की झलक पालें !


क्या यहाँ करना क्या पाना 

यह सिखावन चल रही है,

बस जरा हम जाग देखें 

और अपने कान धर लें !


नहीं माँगे सदा देती

 नेमतें अपनी लुटाती,

चेत कर इतना तो हो कि 

फ़टे दामन ही सिला लें !


पूर्णता की चाह जागे 

लगन से हर राह मिलती,

ला दिया जिसने सवेरा 

रात जिससे रोज खिलती !


उस भली सी इक ललक को

 धूप, पानी, खाद दे दें,

जो कभी बुझती नहीं है

 वह नशीली आग भर लें !


 

रविवार, नवंबर 20

एक पुकार मिलन की जागे


एक पुकार मिलन की जागे

तू ही मार्ग, मुसाफिर भी तू
तू ही पथ के कंटक बनता,
तू ही लक्ष्य यात्रा का है
फिर क्यों खुद का रोके रस्ता !

मस्ती की नदिया बन जा मिल
तू आनंद प्रेम का सागर,
कैसे सुख की आस लगाये
तकता दिल की खाली गागर !

सूर्य उगा है नीले नभ में
खिडकी खोल उजाला भर ले,
दीप जल रहा तेरे भीतर
मन को जरा पतंगा कर ले !

मन की धारा सूख गयी है
कितने मरुथल, बीहड़ वन भी,
राधा बन के उसे मोड़ ले
खिल जायेंगे उद्यान  भी !

एक पुकार मिलन की जागे
खुद से मिलकर जग को पाले,
सहज गूंजता कण कण में जो
उस पावन मुखड़े  को गाले !

शुक्रवार, नवंबर 18

यूँ ही कुछ ख़्याल

यूँ ही कुछ ख़्याल

दिल की गहराइयों में छिपा है जो राज 

वह शब्दों में आता नहीं 

जो ऊपर-ऊपर है 

वह सब जानते ही हैं 

उसे कविता में कहा जाता नहीं 

तो कोई क्या कहे 

इससे तो अच्छा है चुप रहे 

लेकिन दिल है, हाथ है 

कलम भी है हाथ में,  इसलिए 

 चुप भी तो रहा जाता नहीं 

मौसम के क़सीदे बहुत गा लिए 

अब मौसम भी पहले सा रहा भी नहीं

बरसात में गर्मी और सर्दियों में 

बरसात का आलम है 

सारे मौसम घेलमपेल हो गए हैं 

कब बाढ़ आ जाएगी कब सूखा पड़ेगा 

कुछ भी तो तय  रहता नहीं 

शरद की रात चाँद निकला ही नहीं 

खीर बनाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता न तब 

दिवाली की रात झमाझम बरसात हो रही थी 

दीपक जलाते भी तो कैसे 

जहाँ तालाब थे आज बंजर ज़मीन है 

जहाँ खेत थे वहाँ इमारतों का जंगल है 

दुनिया बदल रही है 

धरती गर्म हो रही और 

पीने के पानी का बढ़ा संकट है 

कविता खो गयी है आज 

वाहनों के बढ़ते शोर में 

ट्रैफ़िक जाम में फँसा व्यक्ति 

समय पर विवाह मंडप पहुँच जाए 

इतना ही बहुत है 

उससे और कोई उम्मीद रखना नाइंसाफ़ी होगी 

वह प्रेम भरे गीत गाए और रिझाए किसी को 

इन हालातों में यह नाकामयाबी होगी 

अब तो समय से दोनों पहुँच जाएँ मंडप में 

और निभा लें कुछ बरस तो साथ एक-दूजे का

और यही सही समय है इस कलम के रुकने का !

 


मंगलवार, नवंबर 15

किंतु न जब तक आया मानव

 किंतु न जब तक आया मानव 

पग-पग पर बलिहारी अंतर 

कण-कण में छवि सरस समायी, 

जाने कब तू उतरा नभ से 

कैसे पावन धरा बनायी !


पाहन, धूलि, पठार जहाँ तक 

 निहारती हैं निगाहें दृश्य, 

पादप, पेड़, नदी, निर्झर में 

अन्तर्हित वह अनाम अदृश्य ! 


मीन, कीट, सरिसर्प अनोखे 

खग, मृग, हरि, शावक, सिंहनियाँ,  

भाँति-भाँति के कुसुम खिले हैं 

तितली, अलि, अलिंद, मधुकरियाँ !


किंतु न जब तक आया मानव 

सृष्टि अधूरी सी लगती थी, 

दिव्य चेतना रही तिरोहित 

मन, मेधा उसमें जगती थी !


मन से जन्म हुआ मानव का 

श्रेष्ठ बुद्धि का है अधिकारी 

किंतु डुबाता अहंकार जब

मानस  रहा नहीं अविकारी !

रविवार, नवंबर 13

जो जीवन हँसता था जग में

जो जीवन हँसता था जग में 

कल डोल रहा था खुशियों में 

अब गम की चादर ओढ़ी है,   

हर सुख के पीछे दुःख आता 

यह खूब बनायी जोड़ी है !


जब बादल से नभ ढक जाए 

चन्दा सूरज भी घबराए, 

फिर खिले चांदनी धूप उगे 

तारामंडल भी मुस्काये !


जब जन्मा ढोल बजे घर में 

फिर मातम इक दिन छाएगा, 

जो जीवन हँसता था जग में 

खामोश कहीं खो जायेगा !


जो दौड़ा फिरता था गतिमय 

अब बेबस शैया पर लेटा, 

यहाँ मौसम नित  बदलते हैं 

परिवर्तन ही सच जीवन का !


बस  वही  न बदले कभी यहाँ 

देखा करता है जो जग को, 

शून्य, पूर्ण, मौन, आनन्दमय

मन के भी पार एकरस वो !


शुक्रवार, नवंबर 11

अब तो इक ही धुन बजती है

अब तो इक ही धुन बजती है


अब जब तुम हो साथ हमारे 

 खोज रहे तब भला किसे हम, 

श्वासों में हो,  प्राणों  में तुम 

ढूँढे भला किसे नादां मन !


वाणी मुखर नहीं अब रहती 

सिमट शब्द ज्यों  भीतर सोए, 

 निशदिन उस का साथ मिला है 

जिसे पुकारा करते थे वे  !


यूँही समय बिताने ख़ातिर 

आँख मिचौली खेल रहे थे, 

ढूँढने का बहाना करते

तुम तो सारा वक्त यहीं थे  !


कैसे कहें तुम्हारी  बातें 

बढ़ा गयी थीं दिल की धड़कन,

जब आँखों में फूल खिले थे 

कैसे दें उस पल का विवरण!


कोई बोध नहीं पाया है 

 किया न कोई कर्म अनूठा,

 कैसे साधें भक्ति भला जब 

पृथक नहीं तुमको जाना है !


दुःख बिसराया सुख भी छूटा 

अब तो इक ही धुन बजती है, 

तुम हो, जग है, नयन देखते 

पल-पल यह धरती सजती है !


एक लगन भीतर जागी थी 

जिसने अब अधिकार किया है, 

उसे छुड़ाया जो पकड़ा था 

केवल अजर दुलार दिया है !


बुधवार, नवंबर 9

भारत



भारत 

‘देने’ को कुछ न रहा हो शेष 
जब आदमी के पास 
तब कितना निरीह होता है वह 
देना ही उसे आदमी बनाये रखता है 
मांगना मरण समान है 
खो जाता जिसमें हर सम्मान है !
देना जारी रहे पर किसी को मांगना न पड़े 
ऐसी विधि सिखा रहा आज हिंदुस्तान है !
पिता जैसे देता है पुत्र को 
माँ  जैसे बांटती है अपनी सन्तानों को 
उसी प्रेम को 
भारत के जन-जन में प्रकट होना है 
ताकि ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ 
मानने वाली इस संस्कृति की 
बची रहे आन, आँच न आए उसे !
जहां अनुशासन और संयम 
केवल शब्द नहीं हैं शब्दकोश के 
यहां समर्पण और भक्ति
 कोरी धारणाएं नहीं हैं !
यहां परमात्मा को सिद्ध नहीं करना पड़ता 
वह विराजमान है घर-घर में 
कुलदेवी, ग्राम देवी और भारत माता के रूप में 
वह देश अब आगे बढ़  रहा है !
और दिखा रहा है सत्मार्ग 
विश्व को अपने शाश्वत ज्ञान से ! 

मंगलवार, नवंबर 8

चाह या अनुभव

चाह या अनुभव 

चाह यानी इच्छा

या कामना !

मोहित कर लेती है आत्मा को 

जुट जाती है जो

उसे पूर्ण करने के प्रयास में !

हाथ लगता है एक और अनुभव 

और हर अनुभव

कुछ न कुछ सिखाता है 

कुछ रंग भरता  

कुछ जोड़ता  

कुछ तोड़ता भी है 

हर अनुभव एक कदम

आगे ले जाता है 

एवरेस्ट चढ़ने की चाह भी तो चाह है !

और पड़ोस की दुकान से

भीषण गर्मी में बर्फ

ख़रीद कर लाना भी 

जीवन अनुभवों की

एक दीर्घ शृंखला ही तो है 

जो जितने निर्दोष होते जाएँगे 

आत्मा का द्वार खुलने लगेगा 

उसको पाने की चाह में 

फिर सिमट जाएँगी सब चाहें 

केवल एक वही शेष रह जाएगी !


शनिवार, नवंबर 5

धरती

धरती 


धरती माँ है 

माँ की तरह 

धरती है अपनी कोख में संतति 

हज़ारों सूक्ष्म जीव 

कीट, मीन, तितलियाँ, पशु-पंछी

वन-जंगल और ‘मानव’ को भी 

जो घायल कर रहा है उसे 

कंक्रीट के जंगल उगाता  

जीते-जागते पर्यावरण को नष्ट करके 

धरा के गर्भ से तेल उलीच 

समंदरों को विषैला बनाता  

हज़ार जीवों के प्राण ले 

अतिक्रमण करता ही जा रहा है मानव 

धरती झेल रही थी 

तप्त हो रही अब  

 स्वस्थ नहीं है वह

भूमिकंप शायद उसकी

 कंपकंपाहट  है 

असमय वर्षा से 

मानो कोई सहला रहा है उसे 

अब भी समय है, चेते 

  संयमित हो यदि विकास

और  पीड़ा न दे उसे 

तो रह सकता है सुरक्षित

मानव ! वरना ….