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शुक्रवार, सितंबर 2

रास्ते हैं, यह बहुत है

रास्ते हैं, यह बहुत है
 

​​मंज़िलें हों दूर कितनीं  

मंज़िलें हैं, यह बहुत है, 

चल पड़े हैं ग़म नहीं अब 

रास्ते हैं, यह बहुत है !


पथ कँटीला पाँव हारे 

जोश दिल में, यह बहुत है, 

नज़र न आए तो क्या है 

साथ है तू, यह बहुत है !


इक अनोखी चीज़ दुनिया 

जश्न मनते, यह बहुत है, 

कब किसी की हुईं पूरी 

चाहतें हैं, यह बहुत है !


उम्र केवल एक गिनती 

बचपन जवाँ, यह बहुत है, 

अजनबी कोई नहीं अब 

तू यहीं है, यह बहुत है !




रविवार, जून 13

मंजिल या मंझधार

मंजिल या मझधार 


हम पहुँच ही जाते हैं किनारे पर 

कि कोई लहर बहा ले जाती है 

संग अपने 

और डूबने लगते हैं फिर मझधार में 

न जाने कितनी बार 

यह इतिहास दोहराया गया है 

मंजिल जिसे समझ बैठे थे 

हर बार वह रास्ता ही पाया गया है 

जब अनंत है वह 

तो मंजिल बन भी नहीं सकता 

अनंत ही होंगे उसके ठिकाने 

अनंत की हो तो चाहत मन में 

तभी वह मिलेगा 

जीवन का यह भेद जानकर ही 

मन का कमल खिलेगा 

वह पूर्ण है तो पूर्णता में ही उसे खोजना होगा 

कोई भी अभाव न खले भीतर 

तभी एक क्षण के लिए भी 

वह हाथ नहीं छोड़ेगा !

 

रविवार, जनवरी 10

मंजिल पर ही बैठ मुसाफिर

मंजिल पर ही बैठ मुसाफिर 
कहाँ गए ?  थे हवामहल ही 
कहाँ गया वह लक्ष्य साधता, 
मंजिल पर ही बैठ मुसाफिर 
पूछा करता था जो रस्ता ! 

नहीं मिला जब खोजा मन ने 
मेधा ने भी जोर लगाया, 
थके हार जब बैठे दोनों 
खुद को मंजिल पर ही पाया ! 

नहीं घटा कुछ जहाँ कभी भी 
ऐसा एक शून्य पलता है, 
जहाँ उगा है निशदिन राका 
सूरज कभी नहीं ढलता है !

यह भी बस कहने में आता 
इक छोड़ नहीं दूजा कोई, 
एक अनोखी भोर हुई है 
अंतर जिसकी सुरति समोई !

जहाँ न इक स्पंदन भी घटता 
उसी में सृष्टि बनी, बिगड़ती, 
जहाँ कभी कुछ हुआ न होगा 
माया कैसे रूपक  गढ़ती !

उस अनाम से फलित सदा हो   
स्वयं का ही दर्शन स्वयं को, 
एक याद युग-युग से विस्मृत  
पुन: आ गई मिटा संशय को !
 

रविवार, नवंबर 8

झलक उसकी बरस जाती


झलक उसकी बरस जाती


कल्पना के पंख ओढ़े

उर गगन में उड़  रहा है,

कभी शीतल चंद्रमा,घन

ताप से भी जुड़ रहा है !

 

जाग कर देखे घड़ी भर

रात-दिन यूं घट रहे हैं,

जो कभी उगता न डूबा 

पूर्व-पश्चिम छल रहा है !

 

सत नहीं जो मान उसको

व्यर्थ ही मन बोझ ढोता,

जो कभी आए नहीं भय 

उन दुखों का खोज लेता !

 

स्वयं मंजिल दूर रखकर

दौड़ उसकी फिर लगाता,

पूर्ण होकर "भरूँ  कैसे ?"

मंत्र का फिर जाप करता !

 

इक खलिश की आंच दिल में 

सुगबुगा धूआँ उठाती,

प्रखर ज्वाला बन जले यदि

झलक उसकी बरस जाती !


रविवार, अगस्त 2

रौशनी बन झर रहा तू

रौशनी बन झर रहा तू


चैन दिल का, सुकूं मेरा 
प्रीत का सागर रहा है,
जहाँ रुकते कदम, झुकते 
नयन, तेरा दर रहा है !

कहाँ जाना क्या पाना 
तू ही मंजिल बन मिला है, 
तेरे दम से छूट गम से 
मन पंकज यह खिला है !

दीप जलते हैं हजारों 
रौशनी बन झर रहा तू, 
बह रहा बन एक दरिया 
प्यास खुद की भर रहा तू !

नित लुटाता मोतियों सा 
इक खजाना जिंदगी का, 
खोल देता ख़ुशी-गम में 
राज अपनी बन्दगी का !

गुरुवार, जून 25

पुकार

पुकार 

यूँ तो हजारों खड़े हैं कतारों में 
उसके द्वार वही जाता है 
जिसे वह बुलाता है !
लाख प्रमाण दिए प्रह्लाद ने 
नास्तिक पिता नकारे जाता है !
जल को अधरों से लगाते हम हैं 
पर अपनी प्यास तो वही जगाता है !
सुरीले गीतों को सुन झूम उठती है दुनिया 
गाते वही आ कण्ठ में जिनके सुर समाता है 
चढ़ते हैं दूर शिखरों पर आरोही वे ही 
पर्वत जिन्हें अपने पास बुलाता है !
हाँ, यह बात और है कि 
पर्वतों के आमन्त्रण को स्वीकार करे 
ऐसा जिगर कोई-कोई ही पाता है !
यानि मंजिल बुलाये तब भी 
कुछ कदम नहीं बढ़ते 
कोई उसकी पुकार पर दौड़ा चला जाता है !
एक लेन-देन अनोखा चल रहा 
झोली सिली है जिसकी 
वह मेहर को समेटे जाता है !

शनिवार, मई 30

जन्मदिन की कविता

जन्मदिन की कविता 


हे अनाम ! तुझे प्रणाम 
जाने किस युग में आरम्भ हुई होगी यह यात्रा 
या अनादि है यह भी तेरी तरह 
कभी पत्थर, पौधा, जलचर, नभचर या थलचर बनते-बनते 
 मिला होगा अन्ततः यह मानव तन 
फिर इस तन की यात्रा में भी 
कभी राजा, कभी रंक 
कभी स्त्री कभी पुरुष 
कभी अशिक्षित कभी विद्वान् 
अनेक धर्मों, आश्रमों, वर्णों 
में लिए होंगे जन्म 
गढ़ते-गढ़ते इतने काल से 
इतने दीर्घ कालखण्ड में 
आज जो बन गया है मन  
वह जानता है कि
अब मंजिल निकट है 
देख लिए सारे खेल 
देख ली तेरी माया 
यकीनन इसने बहुत लुभाया 
नाजुक रिश्तों के मजबूत बन्धनों में बाँधा 
सुख-दुःख के हाथों से बहुत राँधा
अहंकार की भट्टी में तपाया 
कल्पनाओं के झूले में झुलाया 
पर अब जाकर तेरा मर्म कुछ-कुछ समझ में आने लगा है 
अब खत्म हुई यह दौड़ 
अब घर याद आने लगा है 
जन्म-मृत्यु के इस चक्र से जब कोई छूट जाता है 
फिर जब मौज होगी तो फिर आता है 
पर तब कैदी नहीं होता प्रारब्ध का 
तेरी तरह बस
 मुस्कानें बिखेरता और गीत गाता है !

बुधवार, मई 27

लहरों से थपकी देता है

लहरों से थपकी देता है 


कोई सुख का सागर बनकर 
लहरों से थपकी देता है, 
हौले-हौले से नौका को 
मंजिल की झलकी देता है !

बरसे जाता दिवस रात्रि वह 
मेघा लेकिन नजर न आये, 
टप टप टिप टिप के मद्धिम स्वर 
मानो दूर कहीं गुंजाये !

कोई ओढ़ा देता कोमल 
प्रज्ज्वलित आभा का आवरण, 
सुमिरन अपना आप दिलाता 
पलकों में भर दे सुजागरण !

सूक्ष्म पवन से और गगन से 
नहीं पकड़ में समाता भाव, 
होकर भी ज्यों नहीं हुआ है 
हरे लेता है सभी अभाव !

जाने कैसी कला जानता
भावों से मन माटी भीगे, 
धड़कन उर की राग सुनाये 
भरे श्वास में सुरभि कहीं से !

रविवार, मई 3

उसका होना

उसका होना


कोई रेशमी सा ख्याल या 
इंद्रधनुष अटका अम्बर में, 
मादक मीठी तान गूँजती 
कोमल कमल खिला सर्वर में !

कोई ज्यों आवाज दे रहा 
हरियाली सी बिछी डगर पर,
मखमली पगत्राण धरे हों, 
या फूलों के दल हों पथ पर ! 

जैसे कोई लड़ी गीत की
या कोई अनकही कहानी,
रस्ता दिखलाती जाती हो
झरनों में जो बसी रवानी !

हौले हौले से छूती हो, 
कोई अनजानी फुहार या, 
धीमे-धीमे से बहती हो, 
पूरब की मीठी बयार या !

मेघों में जा छुपा सूर्य क्या, 
कोई तृप्ति शाल ओढ़ाकर,
तकता हो बनकर आशीषें, 
जीवन का सुअर्थ महकाकर !

कोई अपने हाथों से आ, 
सहला जाता उर का पाखी, 
पंखों में उड़ान भर जाता, 
देकर खबर किसी मंजिल की !

बुधवार, नवंबर 27

तू


तू 


जर्रे जर्रे में छिपा है तू ही
बोलता है हर जुबां से तू ही,
हरेक दिल, हर जिगर का बाशिंदा
हर सवाल का जवाब है तू ही !

हर चुनौती इक खेल है जहाँ में
चप्पे-चप्पे पर बिछा है तू ही,
हर दर्द तुझसे मिलने का सबब
हरेक तरंग, हर लहर है तू ही !

किसलिए डरें, तंज करें जग  पर
जब कि हर बात बनाता है तू ही,
तुझ से उपजा हर फलसफा जग का
तेरी रहमत जानता है तू ही !

हर फ़िक्र तुझसे दूर रखती है
हर निशां से झलकता है तू ही,
हर  रस्ता मंजिल की तरफ  जाता
इशारे दिए जाता है तू ही !

मंगलवार, जुलाई 2

चरैवेति चरैवेति



चरैवेति चरैवेति

जीवन को नयनों भर
तकते ही रहना मन !

मार्ग यदि मिल गया हो
तो चलते ही रहना, 
न थकना न ही रुकना
बस बढ़ते ही रहना !

नत माथ हो छाँव में
पल भर ही सुस्ता कर,
गढ़ते ही रहना कल
कदमों में आशा भर !

सपनों सी फुलवारी
मंजिल की झलक दिखे,
पलने ही देना मन
नयनों में चमक जगे !

लौटेंगे किसी दिन
स्वेद बिंदु, मोती बन,
राह में गिरे थे जो
माटी में गये सन !

रविवार, फ़रवरी 10

जाने कितने पर्वत नापे


जाने कितने पर्वत नापे


अनगिन बार खिलाये उपवन,
कंटक अनगिन बार चुभे हैं,
जाने कितने पर्वत नापे
कितनी लहरों संग तिरे हैं !

मंजिल अनजानी ही रहती
द्वार न उसका खुलता दिखता,
एक चक्र में डोले जीवन
सार कहीं ना जिसका मिलता !

बार-बार इस जग में आकर
दांवपेंच लड़ाए होंगे,
अंधकार में ठोकर खाकर
फिर-फिर नैन गँवाए होंगे !

भय भीत पर खड़ा है जीवन
कैसे मन को विश्राम मिले,  
सत्य से आँख मिले न जब तक
क्योंकर अंतर में राम मिले !


शुक्रवार, जून 15

ईद के मौके पर एक इबादत


ईद के मौके पर एक इबादत

इक ही अल्लाह, एक ही रब है,
एको खुदाया, उसी में सब है !

अंत नहीं उसकी रहमत का
करें शुक्रिया हर बरकत का,
जो भी करता अर्चन उसकी
क्या कहना उसकी किस्मत का !

जग का रोग लगा बंदे को
‘नाम’ दवा, कुछ और नहीं है,
मंजिल वही, वही है रस्ता
उसके सिवाय ठौर नहीं है !

सारे जग का जो है मालिक
छोटे से दिल में आ रहता,
एक राज है यही अनोखा
जाने जो वह सुख से सोता !

तू ही अव्वल तू ही आखिर
तू अजीम है तू ही वाहिद,
दे सबूर तू नूर जहां का
तू ही वाली इस दुनिया का !

अल कादिर तू है कबीर भी
तू हमीद तू ही मजीद भी,
दाता, राम, रहीम, रहमान
अल खालिक खुदा मेहरबान !

तेरे कदमों में दम निकले
दिल में एक यही ख्वाहिश है,
तेरा नाम सदा दिल में हो
तुझसे ही यह फरमाइश है !

शनिवार, मई 19

जीवन सरिता बहती जाती




जीवन सरिता बहती जाती


सुख-दुःख मनहर तटों के मध्य
जीवन सरिता बहती जाती,
नित्य नवीन रूप धरकर फिर
माया के नित खेल रचाती !

बैठ नाव में चला मुसाफिर
डोला करता सँग लहरों के,
चल इस पार से उस पार तक
जाने मंजिल कौन दिशा में !

उठें बवंडर भावनाओं के
कभी विचारों के तूफान,
धूमिल हो जाती निगाह फिर
 नहीं नजर आता आसमान !

माया के कहीं सर्प तैरते
ग्राह बना अबोध पकड़ता,
तृष्णा बन शैवाल घेरती
कभी द्रोह का पाश जकड़ता !

जब तक दस्यु नजर नहीं आते
रमणीक लगता यह बहाव,
जरा-रोग का बंधन बँधते
दुर्दम्य लगने लगे प्रवाह !

तट पर बैठा देख रहा जो
प्रतिपल इन लहरों की क्रीड़ा,
रह अलिप्त वह ज्योति बना फिर
मुक्त रहे हो सुख या पीड़ा ! 


गुरुवार, अप्रैल 12

पल-पल सरक रहा संसार



पल-पल सरक रहा संसार

कौन यहाँ किसको ढूंढे है 
किसे यहाँ किधर जाना है,
खबर नहीं कण भर भी इसकी 
पल भर का नहीं ठिकाना है !

जोड़-तोड़ में लगा है मनवा
बुद्धि उहापोह में खोयी,
हर पल कुछ पाने की हसरत 
जाने किस भ्रांति में सोयी !

दिवास्वप्न निरन्तर देखे 
मन ही स्वप्न निशा में गढ़ता,
नहीं मिला आधार स्वयं का 
लक्ष्यहीन सा रहे विचरता !

एक तिलिस्म महामाया का 
घुमा रहा जिसको करतार
एक व्यूह में भ्रमण चल रहा 
पल-पल सरक रहा संसार !