गंध झरे जिससे कोमल
जीवन के झुलसाते पथ पर
मनोहारी शीतल इक छाँव है,
सूने कँटीले इस मार्ग पर
सुंदर सलोना सा ठाँव है !
सागर की चंचल लहरों में
नौका को भी थामे रखता,
हर इक बार भटकता राही
पा ही जाता एक गाँव है !
कोई कभी अनाथ हुआ कब
वह पग-पग साथ निभाता है,
कैसे जीना इस जीवन में
ख़ुद आकर सदा सिखाता है !
कदमों में गति वही भरे है
श्वासों में बनकर प्राण रहा,
नहीं कभी कोई भय व्यापे
अंतर में दृढ़ विश्वास भरा !
तेरे होने से ही हम हैं
तेरे कदमों में आये हैं,
गंध झरे जिससे कोमल
वे मौन गीत ही गाये हैं !
