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मंगलवार, फ़रवरी 10

चक्र सृष्टि का

चक्र सृष्टि का 


पाँच बज गये 

भोर हो गई 

धरा के इस भाग ने मुख मोड़ लिया हैं

सूरज की ओर

धीरे-धीरे उजाला होगा 

अलसाये, उनींदे बच्चे जागेंगे 

मंदिरों में शंख व घंट नाद होंगे 

भोर में करेंगे किसान रूख खेतों का 

महिलाएँ चौके का 

और बच्चे स्कूलों का 

धरा और सूरज जब आमने-सामने होंगे 

प्रखर प्रकाश ज़ाहिर कर देगा 

हर कतरा कोना

सब कुछ स्पष्ट नज़र आएगा 

लोग घरों में छुप जाएँगे 

ताप का सामना कौन करे 

सत्य का प्रकाश ऐसा ही होता है 

चमकदार प्रखर तेज 

खिड़कियों पर पर्दे लग जाएँगे 

कड़कती धूप में ख़ाली हो जाएँगीं सड़कें 

धरा फिर घूम  जाएगी जरा

गोधूलि की बेला में 

बगीचे किलकारियों से भर जाएँगे 

जब घूमते-घूमते सूरज से दूर जाएगी 

धुँधलका छायेगा संध्या का 

फिर अंधकार का साम्राज्य और लोग 

घरों में बंद हो नींद के आग़ोश में खो जाएँगे 

यह एक चक्र प्रकृति का 

न जाने कब से चल रहा है 

सूरज और धरती के इस प्रेम में 

हर प्राणी पल रहा है !


शुक्रवार, अप्रैल 4

भोर

भोर 


 

एक और सुबह 

लायी है अनंत संभावनाएँ 

उससे मिलने की 

अभीप्सा यदि तीव्र हो तो 

कृपा बरसती है अनायास 

खुल जाता है हर द्वार 

झरते हैं प्रकाश पुष्प हज़ार 

वही ज्योति बनेगी मार्गदर्शक 

जगमगा उठेगा कुछ ही देर में 

रवि किरणों से फ़लक 

जग जाएँगे वृक्ष, पर्वत, फूल सभी 

काली पड़ गई धूल सभी 

हर भोर उस सुबह की 

याद दिलाती है 

जिसमें जगकर आत्मा

 नयी हो जाती है !




रविवार, जनवरी 19

नये साल की एक भोर

नये साल की एक भोर 


वादा किया था उस दिन

एक नयी भोर का  

लो !  आज ही वह भोर 

मुस्कुराती हुई आ गई है 

गगन लाल है पावन बेला 

सितारों ने ले ली है विदा 

दूर तक फैला है उजियाला 

नयी राहों पर कदम बढ़ाओ 

आँख खोली है पंछियों और कलियों ने 

संग हवाओं के तुम भी तो कुछ गुनगुनाओ 

पोंछ डालो हर कालिमा बीती रात की 

नये जोश से नये साल में कदम रखो 

ख़ुद के होने पर गर्व करो 

अपनी हस्ती को जरा और फैलाओ !


शुक्रवार, जुलाई 5

जीवन का यह कलश रीतता

जीवन का यह कलश  रीतता


कितना रस्ता चल कर आया 

फिर भी कहीं नहीं पहुँचा है, 

जाने कब यह राज खुलेगा 

मंज़िल पर ही सदा खड़ा है !


एक सुकून उतरता भीतर 

मधुर परस जब उसका मिलता,

जिसका पता खोजते ही तो 

जीवन का यह कलश रीतता ! 


नेति-नेति के पथ पर चल कर 

उसके द्वारे जाना होगा, 

 तज कर सभी प्रवेश मिलेगा 

सहर्ष सभी लुटाना होगा !


हल्का होकर तभी उड़ेगा 

जैसे कोई  श्वेत पंख हो,

या तुषार  की पावन बूँदें 

फूलों की भीनी सुगंध हो !


होकर अगर न होना आये 

यही राज उसने सिखलाया, 

जैसे विमल  भोर का तारा 

अगले  ही पल नज़र न आया !


मंगलवार, जनवरी 16

हर दिन नयी भोर उगती है

हर दिन नयी भोर उगती है


दिन भी सोया सोया गुजरा 

दु:स्वप्नों में बीती है रात, 

जाग जरा, ओ ! देख मुसाफ़िर 

प्रमाद लगाये बैठा घात !


चाह अधूरी सर्प सी लिपट

कर्मों की गठरी भी सिर पर, 

कदम थके हैं, भय अंतर में 

कैसे पहुँचेगा अपने घर !


जीवन चारों ओर खिला है 

तू कूपों का बना मंडूक, 

जो भी कदम उठे सच्चा हो 

अबकी न बाज़ी जाये चूक !


हर दिन नयी भोर उगती है 

जब भी जागो तभी सवेरा, 

जब निर्भय होकर जीना है 

क्यों अतीत ने मन को घेरा !


सोमवार, जून 27

दीवाना मन समझ न पाए

दीवाना मन समझ न पाए


जीवन इक लय में बढ़ता है

जागे भोर साँझ सो जाये,

कभी हिलोर कभी पीड़ा दे

जाने क्या हमको समझाये !


नए नए आविष्कारों से

एक ओर यह सरल हो रहा,

प्रतिस्पर्धा बढ़ी ही जाती

जीना दिन-दिन जटिल हो रहा !


निज पथ का राही ही तो है

अपनी मति गति से चलता है,

फिर भी क्यों मानव का अंतर 

सहयोगी से भी डरता है !


मित्रों में ही शत्रु खोजता

प्रेम दिखाता घृणा छिपाए,

दोहरापन यही तोड़ रहा 

दीवाना मन समझ न पाए !


मन के पार उजाला बिखरा

नजर उठाकर भी ना देखे,

खुद का ही विस्तार हुआ है

स्वयं  लिखे हैं सारे लेखे  !






 

बुधवार, अप्रैल 13

वह

वह

 

कभी भोर होकर भी 

भोर नहीं होती 

घटटोप बादलों से 

आवृत हो जाता है नील  नभ 

अंशुमान मेघों की अनेक परतों के पीछे 

पंछी देर तक दुबके रहते हैं कोटरों में 

रात भर बरस कर भी 

बदलियाँ थकी नहीं होतीं 

टप टप झरती हैं 

पेड़ों की डालियों से बूँदे रह रह कर 

मंदिरों के द्वार खुल जाते हैं 

पर भक्त गण नहीं आते 

ऐसे में यदि कोई 

परमात्मा को घर बैठे आवाज़ लगाए 

तो क्या उससे दूर रह पाएगा वह 

पल भर में पानी से भरे सारे रास्तों को पार करके 

प्रकट हो जाएगा न 

सम्मुख उसके  

पूछा मुन्नी ने दादी से !


रविवार, सितंबर 12

फिर सुनहली भोर आयी


फिर सुनहली भोर आयी


पंछियों  के स्वर अनोखे 

बोल जाने भरे कैसे, 

क्या सुनाते गा रहे हैं 

भोर होते गूंजते से !


तोड़ते निस्तब्धता जो 

यामिनी भर रही छायी,  

दे रहे संदेश मानो 

फिर सुनहली भोर आयी !


कूक कोकिल की सुरीली 

चेतना में प्राण भरती, 

उल्लसित उर सहज होता 

रात का ज्यों अलस हरती !


कंठ में सुर कौन भरता

वाग्देवी ! वाग्देवी ! 

कह रहे हर बोल में वे 

कर रहे ज्यों वंदना ही ! 


शनिवार, सितंबर 4

नींद

नींद 


हर रात हम अपने घर जाते हैं 

अनजाने ही 

और भोर में पोषित होकर लौटते हैं 

जाहिर है घर पर कोई है 

यदि रात सो न सका कोई

तो वह घर का पता ही भूल गया है 

या भटक गया है आधी रात को 

अथवा घर से दूर निकल गया है 

जाना चाहता है 

पर कोई वाहन नहीं मिलता 

भय और थकान भी उसे घेर लेते हैं 

नींद न आने पर अगले दिन 

लोग कैसे खोये-खोये से रहते हैं !


रविवार, जनवरी 10

मंजिल पर ही बैठ मुसाफिर

मंजिल पर ही बैठ मुसाफिर 
कहाँ गए ?  थे हवामहल ही 
कहाँ गया वह लक्ष्य साधता, 
मंजिल पर ही बैठ मुसाफिर 
पूछा करता था जो रस्ता ! 

नहीं मिला जब खोजा मन ने 
मेधा ने भी जोर लगाया, 
थके हार जब बैठे दोनों 
खुद को मंजिल पर ही पाया ! 

नहीं घटा कुछ जहाँ कभी भी 
ऐसा एक शून्य पलता है, 
जहाँ उगा है निशदिन राका 
सूरज कभी नहीं ढलता है !

यह भी बस कहने में आता 
इक छोड़ नहीं दूजा कोई, 
एक अनोखी भोर हुई है 
अंतर जिसकी सुरति समोई !

जहाँ न इक स्पंदन भी घटता 
उसी में सृष्टि बनी, बिगड़ती, 
जहाँ कभी कुछ हुआ न होगा 
माया कैसे रूपक  गढ़ती !

उस अनाम से फलित सदा हो   
स्वयं का ही दर्शन स्वयं को, 
एक याद युग-युग से विस्मृत  
पुन: आ गई मिटा संशय को !
 

शुक्रवार, सितंबर 25

भोर में कोई जगाये

 भोर में कोई जगाये 

चैन नींदों में समाए 

स्वर्ग स्वप्नों में दिखाए,

भोर में कोई जगाये 

बस यही तुम मांग लेना ! 


बैन में मधुरा भरी हो 

नैन सूरत साँवरी हो, 

जगत की पीड़ा हरी हो 

बस यही आशीष लेना !


पग कभी रुकने न पाएँ

हाथ अनथक श्रम उठायें, 

अधर पल-पल मुस्कुराएं 

बस यही वरदान लेना !


रिक्त हो उर चाह से अब

सिक्त हो रस रास से जब,  

पूर्णता का भास हो तब 

बस यही सुख जान लेना !


श्वासों में भी कंप न हो 

देह-हृदय में द्वंद्व न हो, 

सुरताली स्वच्छंद न हो 

बस यही संकल्प लेना ! 


सोमवार, सितंबर 14

रात ढल चुकी है

 रात ढल चुकी है 

होने को है भोर

प्रातःसमीरण में झूम रही हैं 

पारिजात की डालियाँ 

गा रहे हैं झींगुर अपना अंतिम राग

स्तब्ध खड़ा नीम का वृक्ष उनींदा है 

अभी जागेगा 

उषा की पहली किरण का स्वागत करने 

घरों की खिड़कियाँ बंद हैं 

सो रहे हैं अभी लोग 

सुबह की मीठी नींद में 

हजार मनों में चल रहे हजार स्वप्न 

पंछी लेने लगे अंगड़ाई निज नीड़ों  में 

है अब जागने की बेला   

देवता आकाश में और धरा पर प्रकृति 

तत्पर  हैं स्वागत करने एक दूसरे का 

ब्रह्म मुहूर्त के इस क्षण में 

 रात्रि प्रलय के बाद 

पुनः सृजित होगी सृष्टि

नव पुष्प खिलेंगे 

नव निर्माण होगा पाकर नई दृष्टि !


बुधवार, जुलाई 22

भोर

भोर 

बजती हैं चाइम की मधुर घण्टियाँ
प्रातःसमीरण में झूमकर 
पारिजात के फूलों को 
छूकर बहती चली आती है जब वह ! 
लिए आती है संदेश उदित होते नव प्रभात का 
पंछियों के स्वर गान का 
जो अब बस खोलने ही वाले अपने नेत्र 
भोर में प्रकृति कितनी पावन लगती है 
गगन पर बदलियों के पीछे झाँक रहा है 
अभी भी पूनो का चाँद 
पर नजर नहीं आते तारागण 
वह पूनम का चाँद ही तो है खिला-खिला   
वही अपना है जंगल में जैसे 
कोई बिछड़ा मीत मिला 
जानना नहीं है उसे 
अज्ञेय है वह 
पाना भी नहीं है 
कभी खोया ही नहीं वह 
जागना है 
, भूल गया है जो मन उसे याद भर दिलाना है 
अस्तव्यस्तता छायी है जो जीवन में 
उसे सँवारना है 
मिलता है वह भोर और संध्या काल में  

शुक्रवार, मई 8

भोर में


भोर में 


जब कूकती है कोकिल अमराई में 
तो मन का कमल खिलने लगता है, 
शीतल मन्द पवन की छुअन 
सहला जाती है हौले से 
हाँ, शायद उस स्पर्श  के द्वारा 
वही कोई सन्देश भेजता है ! 
दूर नारंगी रग का वृत्त 
जब रंग  रहा होता है 
 क्षितिज को 
तो मन के सागर में  
मानो नृत्य कर रही हों 
लहरों का आंदोलन यूँ लगता है !
हर सुबह कितनी अलग होती है 
जो कण-कण को प्रतिदिन 
 जीने के लिए अमृत से भर देती है 
तभी कहते हैं इसे अमृत बेला  !
अगर भोर की मासूमियत नहीं देखी तो 
दोपहर की चिलचिलाती धूप से 
सीधा वास्ता पड़ेगा 
और सहना कठिन होगा, बन्धु ! उसे 
मोर की केयाँ और 
मंदिरों से आती घण्टियों के स्वर 
सजा देते हैं भोर को कुछ और !