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रविवार, जनवरी 12

हादसा

हादसा 


बढ़ती जाती है भीड़ मंदिरों में 

सैकड़ों, हज़ारों अब लाखों की 

दिलों में आस और विश्वास लिए 

कि जो गुहार लगायी 

वह सुनी जाएगी 

पर अचानक हो जाने वाले हादसों में 

गुहार लगाने वाला ही नहीं बचता 

भगदड़ में सदा के लिए गुम हो जाता  

 कुछ हो जाते हैं घायल 

देवता भी सिहर जाते होंगे 

शायद राह दिखाते हों 

मृतात्माओं को 

कहते होंगे 

जब अनेक बार आ चुके, 

अनेक बार फिर आना है 

क्या जल्दी है आगे जाने की 

परमात्मा तो हर जगह है 

कुछ न कुछ पाने की 

कुछ न कुछ बनने की 

होड़ में लगा मानव 

ख़ुद को गँवा देता है 

भीड़ में दबकर विदा लेने से 

बुरा, भला और क्या हो सकता है ! 


शनिवार, जून 29

एक खुला आसमान

एक खुला आसमान


 पहुँचे नहीं कहीं मगर, हल्के हुए ज़रूर 

मनों ने हमारे, कई बोझे उतारे हैं 


 बाँध कर रखा जिन्हें  था, खोने के त्रास से 

मुक्त किया जिस घड़ी, आसपास ही बने हैं 


प्रेम की कहानियाँ अब, रास नहीं आ रहीं  

अहं को ही प्रेम का, नाम जब से धरे हैं 


अहं की वेदी पर, शहीद हुआ प्रेम सदा 

प्रेम की कहानियों के, हश्र यही हुए हैं 


एक खुला आसमान, एक खुला अंतर मन 

हर तलाश पूर्ण हुई, होकर गगन जिये हैं 


जहाँ  से चले थे बुद्ध, वहीं लौट आये हैं 

पाया नहीं कुछ नवीन, व्यर्थ त्याग दिये हैं 


जीवन का देवता, भेंट यही माँगता है 

उतार दे हर बोझ जो, संग सदा चले है  


शुक्रवार, नवंबर 24

स्वप्न और जागरण

स्वप्न और जागरण 

जाग गया जो

वह देख सकता है 

 जूझ रहा है कैसे 

सोया हुआ व्यक्ति

दु:स्वप्नों से !

सुख की चाह की ख़ातिर 

दुख देता है औरों को 

पर बोता है बीज दुख के

 ख़ुद के लिए 

शिशु के रुदन के प्रति भी 

नहीं पिघलता जो दिल 

घिरा नहीं क्या घोर तमस से 

आत्मा का स्पर्श हुए बिना 

सत्य दिखाई नहीं देता 

अभाव और दुखों से जूझते जन 

निज सुख के आगे देख नहीं पाता 

 परम का स्पर्श मिल जाता है जब

करुणा जागती है उसी क्षण

कोई उम्मीद न करे औरों से 

ख़ुदा होने की 

चढ़ाना होगा सूली पर सदा 

ख़ुद को ही 

औरों को न वेदी पर तुम बिठलाओ 

ख़ुद के भीतर ही देवता को पाओ 

ख़ुदा से मिलने की कोई और तो रीत नहीं 

ख़ुद से बढ़कर मिलती कहीं भी प्रीत नहीं 

स्रोत भीतर प्रेम का है 

दिल की राह से जाना होगा 

वहीं से झरती है संग करुणा

 गंगा ज्ञान, भक्ति यमुना 

और कर्म की वरुणा ! 


मंगलवार, जून 2

आह्वान

आह्वान 


चलो सँवारें गाँव देश को 
सूखे पत्ते जरा बुहारें
भूलों के जो बने खंडहर
उन्हें गिराकर
या भावी की आशंकाएँ 
जो घास-फूस सी उग आयी हैं 
उन्हें हटाकर 
सूरज को फिर दे आमन्त्रण 
वर्तमान के इस शुभ पल में  
फूल खिला दें 
ग्राम्य देवता धीरे से आ 
कर कमलों से उन्हें हिला दें 
सुखद स्मृति कोई पावन 
बहे यहाँ फिर शुभ यमुना बन 
तट पर जिसके बजे बाँसुरी
हँसे कन्हैया का वृंदावन 
चलो पुकारें, दे आमन्त्रण 
हर शुभता को 
उगे हुए झंखाड़ उखाड़ें 
आशंका की यदि बदलियां 
छायीं मन पर 
बह जाने दें झरते जल को 
भीग उठे श्यामल धरती का 
हर इक रज कण !

शुक्रवार, अक्टूबर 17

इतनी शिद्दत से जीना होगा



इतनी शिद्दत से जीना होगा

जैसे फूट पडती है कोंपल कोई
सीमेंट की परत को भेदकर
ऊर्जा बही चली आती है जलधार में
चीर कर सीना पर्वतों का
या उमड़-घुमड़ बरसती है बदली सावन की
न कि किसी जलते-बुझते दीप की मानिंद  
या अलसायी सी छिछली नदी की तरह
पड़े रहें और बीत जाये जीवन... का यह क्रम
लिए जाए मृत्यु के द्वार पर
सिर झुकाए खड़े होना पड़े
देवता के चरणों में चढ़ाने लायक
फूल तो बनना ही होगा
इतनी शिद्दत से जीना होगा...


गुरुवार, अप्रैल 3

तब और अब


तब और अब

देहें तब चमकदार हुआ करती थीं
जिनमें देवों का वास था
थी आदमी और देवता में एक आत्मीयता
और सहयोग की भावना
मनों की शक्तियाँ अकूत थीं
वनस्पतियाँ तक अपने राज खोलती थीं
ध्यान में लीन ऋषि से
गुण धर्म बोलती थीं
दूर नक्षत्रों तक सहज ही गमन करते थे ध्यानी
परमात्मा से तब तक मानव ने रार नहीं थी ठानी
धीरे-धीरे हुई विस्मृति
मद, मान और मोह ने की अवनति
देहें अब मात्र खाद्यान्न भरने का यंत्र हैं
देवों को किया देवालयों में बंद है
दोनों कभी-कभी मिलते हैं
अधिक तो उनके होने पर ही संशय करते हैं
विमुग्ध है मानव निज ज्ञान पर
वंचित है किस सुख से यह भी नहीं जानता
अपने ही स्रोत के अस्तित्त्व को नहीं मानता...