शांति कमल कैसे खिल जाते
सजग रहेगा सदा जगत में
जगा हुआ मन अपने भीतर,
बाहर जागा कब सो जाये
रहती उसको यह कहाँ खबर !
भान नहीं अपने होने का
तंद्रा, निद्रा में खोया है,
सपनों में ही हर्ष मनाता
हर दुख सपनों में बोया है !
छवियाँ गढ़ लीं थीं अनजाने
जिनको सत्य मानकर जीता,
अमृत समझ के विष की बूँदें
कितने अरमानों से पीता !
रण के बादल घिर आये फिर
इसकी ही तैयारी की थी,
शांति कमल कैसे खिल जाते
पीड़ा से ही यारी की थी !

गहन भाव लिए सुंदर अभिव्यक्ति ।
जवाब देंहटाएंसादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार १० मार्च २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
बहुत बहुत आभार श्वेता जी!
हटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
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