गुरुवार, फ़रवरी 19

अमृत घट बरबस बहते हैं

अमृत घट बरबस बहते हैं

कौन कहे जाता है भीतर

चुकती नहीं ऊर्जा जिसकी,

कौन गढ़े जाता है नूतन

प्यास नहीं बुझती उसकी !

 

एक कुमारी कन्या जैसे

है अभीप्सा शिव वरने की,

तृप्त नहीं होता है घट यह

बनी लालसा है भरने की !

 

एक अनंत स्रोत है जिससे

नित नवीन भाव जगते हैं,

पल भर कोई थम जाता जब

अमृत घट बरबस बहते हैं !

 

शब्द उसी के भाव उसी के

जाने क्या रचना वह चाहे,

कलम हाथ में कोरा कागज

सहज गीत इक रचता जाये !

 

बंद नयन में खिला वही है

सुरभि बन के मिला वही है,

गुनगुन रुनझुन कहाँ से आती

 मृदुल कमल सा, शिला वही है !


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