अमृत घट बरबस बहते हैं
कौन कहे जाता है भीतर
चुकती नहीं ऊर्जा जिसकी,
कौन गढ़े जाता है नूतन
प्यास नहीं बुझती उसकी !
एक कुमारी कन्या जैसे
है अभीप्सा शिव वरने की,
तृप्त नहीं होता है घट यह
बनी लालसा है भरने की !
एक अनंत स्रोत है जिससे
नित नवीन भाव जगते हैं,
पल भर कोई थम जाता जब
अमृत घट बरबस बहते हैं !
शब्द उसी के भाव उसी के
जाने क्या रचना वह चाहे,
कलम हाथ में कोरा कागज
सहज गीत इक रचता जाये !
बंद नयन में खिला वही है
सुरभि बन के मिला वही है,
गुनगुन रुनझुन कहाँ से आती
मृदुल कमल सा, शिला वही है !

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