शुक्रवार, अप्रैल 3

नयी भोर की आस जग रही


नयी भोर की आस जग रही

दिल में कैसी फांस गड़ रही 
अंतर का जो चैन हर रही, 
अब अतीत का गट्ठर फेंको 
नयी भोर की आस जग रही !

मानवता फिर सिसक रही है 
भरे नहीं थे ज़ख़्म पुराने, 
किंतु निराश न होकर जग में 
 गाये कोकिल नये तराने !

अब भी दिशा दिखाते तारे 
सागर की लहरें गाती हैं, 
उपवन पर गोले बरसाओ 
कलियाँ फिर भी खिल जाती हैं !

जाने कितने ही युद्धों की 
भीषणता से पार हुए हम, 
जीवन एक अकाट्य सत्य है 
उससे क्यूँ बेज़ार हुए हम !

सत्यम् शुवम् सुंदरम् वाले 
गीत सदा अधरों पर आयें, 
लिप्सा का दानव जो जागा 
सच की आँधी उसे मिटाए !


 

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