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शुक्रवार, अप्रैल 3

नयी भोर की आस जग रही


नयी भोर की आस जग रही

दिल में कैसी फांस गड़ रही 
अंतर का जो चैन हर रही, 
अब अतीत का गट्ठर फेंको 
नयी भोर की आस जग रही !

मानवता फिर सिसक रही है 
भरे नहीं थे ज़ख़्म पुराने, 
किंतु निराश न होकर जग में 
 गाये कोकिल नये तराने !

अब भी दिशा दिखाते तारे 
सागर की लहरें गाती हैं, 
उपवन पर गोले बरसाओ 
कलियाँ फिर भी खिल जाती हैं !

जाने कितने ही युद्धों की 
भीषणता से पार हुए हम, 
जीवन एक अकाट्य सत्य है 
उससे क्यूँ बेज़ार हुए हम !

सत्यम् शुवम् सुंदरम् वाले 
गीत सदा अधरों पर आयें, 
लिप्सा का दानव जो जागा 
सच की आँधी उसे मिटाए !


 

शुक्रवार, मई 8

भोर में


भोर में 


जब कूकती है कोकिल अमराई में 
तो मन का कमल खिलने लगता है, 
शीतल मन्द पवन की छुअन 
सहला जाती है हौले से 
हाँ, शायद उस स्पर्श  के द्वारा 
वही कोई सन्देश भेजता है ! 
दूर नारंगी रग का वृत्त 
जब रंग  रहा होता है 
 क्षितिज को 
तो मन के सागर में  
मानो नृत्य कर रही हों 
लहरों का आंदोलन यूँ लगता है !
हर सुबह कितनी अलग होती है 
जो कण-कण को प्रतिदिन 
 जीने के लिए अमृत से भर देती है 
तभी कहते हैं इसे अमृत बेला  !
अगर भोर की मासूमियत नहीं देखी तो 
दोपहर की चिलचिलाती धूप से 
सीधा वास्ता पड़ेगा 
और सहना कठिन होगा, बन्धु ! उसे 
मोर की केयाँ और 
मंदिरों से आती घण्टियों के स्वर 
सजा देते हैं भोर को कुछ और !

सोमवार, सितंबर 25

एक पुहुप सा खिला है कौन


एक पुहुप सा खिला है कौन 


एक निहार बूँद सी पल भर
किसने देह धरी,
एक लहर सागर में लेकर
किसका नाम चढ़ी !

बिखरी बूँद लहर डूब गयी 
पल भर दर्श दिखा,  
जैसे घने बादलों में इक
चपला दीप जला !

एक पुहुप सा खिला है कौन 
जो चुपचाप झरे,  
एक कूक कोकिल की गूँजे
इक निश्वास भरे !

एक राज जो खुला न अब तक
कितने वेद पढ़े,  
किसी अनाम की खातिर कौन
पग-पग नमन करे !


गुरुवार, मई 11

मन सिमटा आंगन में जैसे


मन सिमटा आंगन में जैसे


फिर घिर आये मेघ गगन पर
फिर गाए अकुलाई कोकिल,
मौसम लौट लौट आते हैं,
जीवन वर्तुल में खोया मन !  

वही आस सुख की पलती है
वही कामना दंश चुभोती,
मन सिमटा आंगन में जैसे
दीवारें चुन लीं विचार की !

मन शावक भी यदि निशंक हो,
 तोड़ कैद उन्मुक्त हुआ सा,
एक नजर भर उसे ताक ले
द्वार खुलेगा तब अनंत का !

निकट कहीं वंशी धुन बजती
टेर लगाता कोई गाये,
निज कोलाहल में डूबा जो  
रुनझुन से वंचित रह जाये !


सोमवार, जनवरी 2

रंग भर रहा कोई पल-पल

 रंग भर रहा कोई पल-पल 


कोकिल कहाँ सोचती होगी किस सुर में गाना है 
  पंचम सुर में सहज कंठ से बहता मधुर तराना है 

नदिया कब किस ओर बहेगी नक्शे कहाँ बनाये 
जाने किसने खन्दक खाई पथ अनुकूल दिखाए 

मर-मर न करे प्रतीक्षा भू में बीज सहज ही सोया 
ऋतू आने पर आंखें खोले जाने कब था  बोया  

कोरा कागज सा जीवन है रंग भर रहा कोई पल-पल 
प्रश्न उतरते आहिस्ता से जाने कौन किये जाता हल 

जीवन जब अविरत बढ़ता है नदिया की धारा सा 
 छुपी हुई निधियां उर में जो बन सुगंध  बिखरा जाता 


गुरुवार, जुलाई 21

अमराई से कोकिल स्वर जब



अमराई से कोकिल स्वर जब


झर-झर झरते हरसिंगार जब
भीतर भी कुछ झर जाता,
कुम्हलाया बासी था जो मन
पल भर में ही खिल जाता !

बही समीरण सुरभि भरे जब  
अंतर में कुछ भर जाता,
तंद्रा में अलसाया सा मन
गीत जागरण के गाता !

सोंधी सी जो महक धरा से
पावस ऋतु का दे संदेसा,
सूना सा मन का उपवन झट
शत कमलों से मदमाता !

अमराई से कोकिल स्वर जब
आतुर श्रवणों से टकराता,
गीत जन्म लेते अंतर में
विरह पगा मन अकुलाता !  

गुरुवार, अप्रैल 28

खिले रहें उपवन के उपवन

खिले रहें उपवन के उपवन


रिमझिम वर्षा कू कू कोकिल
मंद पवन सुगंध से बोझिल,
हरे भरे लहराते पादप
फिर क्यों गम से जलता है दिल !

नजर नहीं आता यह आलम
या फिर चितवन ही धूमिल है,
मुस्काने की आदत खोयी
आँसू ही अपना हासिल है !

अहम् फेंकता कितने पासे
खुद ही उनमें उलझा-पुलझा,
कोशिश करता उठ आने की
बंधन स्वयं बाँधा न सुलझा !

बोला करे कोकिला निशदिन
हम तो अपना राग अलापें,
खिले रहें उपवन के उपवन
माथे पर त्योरियां चढ़ा लें !

आखिर हम भी तो कुछ जग में
ऐसे कैसे हार मान लें,
लाख खिलाये जीवन ठोकर
क्यों इसको करतार जान लें !

सोमवार, अगस्त 18

जैसे

जैसे


उतरा हो वसंत
मन उमग रहा
उसकी आहट है !

खिले पलाश मधु बरसा
पादप-पादप सुख से सरसा
गाती कोकिल भावों का उड़ा पराग
फिर भी न जाने कैसी अकुलाहट है !

चिर प्रतीक्षा थी जिसकी
पाहुन वह घर आया
पोर-पोर में धुन बजती
ज्यों अंतर कलिका खिलती
किसलय रक्तिम ज्यों नाच रहे
तितली दल खुशबू बांछ रहे
उर में उडती सी आस लिए
यह कैसी घबराहट है !

उर्वर मन का कोना-कोना
मौन कोख माटी की ज्यों हो
बीज प्रतीक्षा का था बोया
सिंचन करने मन था रोया
 आज खिले हैं जूही, चम्पा
भूल गयी काली रातें वे
बिसर गयीं घन बरसातें वे
फिर भी न जाने क्यों
शंकित सी बुलवाहट है !


मंगलवार, जुलाई 17

ये इशारे हैं उसी के



ये इशारे हैं उसी के

वह जो धुन गहरे तक उतर जाती है
कूक कोकिल की रह-रह के सताती है
ये जो रातों को झांकते हैं तारे
चाँदनी झरोखे से बिछौने पे बिछ जाती है
और... झीलों में जो खिलते हैं कमल
तिरें फूलों से भरी कश्तियाँ सुंदर
ये इशारे हैं उसी के याद रखना यह सदा
संदेस भेजे हैं उसी ने.. हमारे ही लिये....


झांकता सूर्यमुखी जब जानिब सूरज की
ताकता मोर बादलों की तरफ जब भी
पुकार उठती अकेली नाव से माझी की
निहारती कोई बाला जाने राह किसकी
यह जो तलाश जारी है दिलों में प्रेम की
ये चाहत है उसी की याद रखना यह सदा
ये जाल बिछाए हैं उसी ने.. हमारे ही लिये..  


यह जो पुरवाई चली आयी नमी ले मीलों से
उड़ी जातीं पंक्तियाँ हंसों की अम्बर पे
ये जो बिखरा है तब्बसुम चेहरों पे तितलियों के
किलक गूंजती है नन्हों की बसेरों में
ये सौगाते हैं उसी की याद रखना यह सदा
ये बातें हैं उसी की.. हमारे ही लिये..