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शनिवार, फ़रवरी 8

बहने दो

बहने दो


बहने दो पावन रसधार, मत रोको !
झरने दो सजल अश्रुधार, मत टोको

माना मन परिचित है बंधन से
डरता है अनहद की गुंजन से

खिलने दो अन्तस् की डार, मत रोको !
भरने दो फागुनी बयार, मत टोको !

माना मन स्वप्नों में खोया है
अनजाने रस्तों पर रोया है

छाने दो सहज प्यार, मत रोको !
खुलने दो मनस द्वार, मत टोको !

सुनने दो कर्णों को प्रकृति की भाषा
गिर जाय जन्मों से बाँध रही आशा

कुछ न शेष रहने दो, मत रोको !
जीवन को कहने दो, मत टोको !