बहने दो
बहने दो पावन रसधार, मत रोको !
झरने दो सजल अश्रुधार, मत टोको
माना मन परिचित है बंधन से
डरता है अनहद की गुंजन से
खिलने दो अन्तस् की डार, मत रोको !
भरने दो फागुनी बयार, मत टोको !
माना मन स्वप्नों में खोया है
अनजाने रस्तों पर रोया है
छाने दो सहज प्यार, मत रोको !
खुलने दो मनस द्वार, मत टोको !
सुनने दो कर्णों को प्रकृति की भाषा
गिर जाय जन्मों से बाँध रही आशा
कुछ न शेष रहने दो, मत रोको !
जीवन को कहने दो, मत टोको !
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