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मंगलवार, फ़रवरी 14

हम एकाकी

हम एकाकी


प्रेम अगर पाया भीतर तो

मिले यह सृष्टि प्रेम लुटाती, 

स्वयं से भी जो न जुड़ पाया

पीड़ा मन की रहे सताती I


भीतर जाकर झोली भर ली

वही लुटाता  यहाँ  आनंद,

जिसके साथ सदा रब रहता

वही बहाता  मदिर  मकरंद !


खुद के साथ रहे जो अविरत

खुद से नाता जोड़ा जिसने,

वही दूसरों से जुड़ सकता

खुद को मीत बनाया जिसने !


खुद का जब तक साथ न पाले

हर कोई एकाकी जग में,

खुद  की भीतर थाह न पाले

हर कोई प्यासा इस मग में !


जग में आते हम एकाकी

 संगी-साथी पल दो पल के,

जग से जाते हम एकाकी

 कौन चला है संग किसी के !


शुक्रवार, नवंबर 11

फिर खाली हो मुस्काएगा


फिर खाली हो मुस्काएगा

एकाकी पर नहीं अकेला
अंतर में सबके इक मेला,
इक आवाज सदा गूंजती
जो करती है ठेलमठेला !

रुकते-रुकते फिर चल पड़ता
गिरते-गिरते फिर उठ जाता,
नन्हा सा यह दिल बेचारा
डगमग करता फिर थम जाता ! 

कभी-कभी ही खुद से मिलता
ज्यादातर दौरे पर रहता,
अपने घर आने से डरता
यहाँ वहाँ ही डोला करता ! 

कुछ भी नहीं है जो खो जाये
व्यर्थ ही घेराबंदी करता,
इधर-उधर का ज्ञान अधूरा
मोहर लगा चकबंदी करता ! 

इक दिन तो थक कर बैठेगा
निज के ताने बाने खोले,
खुलवायेगा अपने घर के
डरते-डरते भेद अबोले ! 

फिर खाली हो मुस्काएगा
विश्रांति की फसल उगाने,
भर-भर कर झोली उमंग से
गायेगा फिर गीत, तराने !