हम एकाकी
प्रेम अगर पाया भीतर तो
मिले यह सृष्टि प्रेम लुटाती,
स्वयं से भी जो न जुड़ पाया
पीड़ा मन की रहे सताती I
भीतर जाकर झोली भर ली
वही लुटाता यहाँ आनंद,
जिसके साथ सदा रब रहता
वही बहाता मदिर मकरंद !
खुद के साथ रहे जो अविरत
खुद से नाता जोड़ा जिसने,
वही दूसरों से जुड़ सकता
खुद को मीत बनाया जिसने !
खुद का जब तक साथ न पाले
हर कोई एकाकी जग में,
खुद की भीतर थाह न पाले
हर कोई प्यासा इस मग में !
जग में आते हम एकाकी
संगी-साथी पल दो पल के,
जग से जाते हम एकाकी
कौन चला है संग किसी के !
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