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शनिवार, अप्रैल 22

उर नवनीत चुराने वाला

उर नवनीत चुराने वाला 


श्वासों का उपहार मिला है 

जीवन की हर घड़ी  अनमोल, 

प्रेम छुपा हर इक अंतर में 

 कृष्ण  की गीता के हैं बोल !


मेरा ही बन, नमन मुझे कर 

मन, मेधा मुझको कर अर्पित, 

मुक्त हुआ फिर विचर जहां में 

हो मेरी माया से ऊर्जित !


तेरा कुशल-क्षेम मैं धारूँ

सुख-दुख के तू ऊपर उठ जा, 

युग-युग के हम  मीत  अमर हैं  

मुझे याद सब तू है भूला !


कण-कण में मेरी आभा है 

रवि, चन्द्र, तारों की चमक भी, 

मेरी  कुदरत से प्रकटी है 

सृष्टि में मति, प्रज्ञा आदि भी !


कैसे करें न सदा शुक्रिया  

जो कान्हा आनंद बिखेरे, 

उर नवनीत चुराने वाला 

मृदु  भावों की बंसी टेरे !


व्याप्त रहा है भीतर बाहर 

सूक्ष्म लोक के राज खोलता, 

गुरु बनकर मार्ग दिखलाए 

सखा बना वह  संग  खेलता !


सोमवार, अगस्त 8

कान्हा इक उज्ज्वल प्रकाश सा

कान्हा इक उज्ज्वल प्रकाश सा  


घन श्याम गगन में छाए जब 

घनश्याम हृदय में मुस्काए, 

वन प्रांतर में धेनु झुंड लख

बरबस याद वही आ जाए !


पौ फटते ही मंदिर-मंदिर 

जिसे जगाने गीत गूँजते, 

माखन मिश्री थाल सजा नित  

दीप जला आह्वान करते !


पावन गीता श्लोक नित्य ही 

श्रद्धामय स्वरों से बाँचते, 

कर्मयोग का ज्ञान प्राप्तकर 

पूर्ण भक्ति से पालन करते !


गोधूलि में बाजे बाँसुरी 

कदंब वृक्ष, यमुना कूल पर, 

अश्रुसिक्त नयनों से तकता 

 मन राधा सा व्याकुल होकर !


बालक, युवा, प्रौढ़ हर इक को 

आराध्य रूप कृष्ण  मिला है, 

युगों-युगों से भारत का दिल 

उन विमल चरणों पे झुका है !


कान्हा इक उज्ज्वल प्रकाश सा  

राह दिखाता मानवता को, 

चुरा लिया नवनीत हृदय का  

ओढ़ लिया उर सुंदरता को !


बुधवार, सितंबर 22

गीता

गीता 


सत् के आधार पर ही 

असत् की नौका डोलती है 

कभी दिखती 

कभी हो जाती ओझल 

खुद अपना भेद खोलती है 

विशालकाय तारे भी 

टूटा करते 

जन्मे थे जो एक दिन 

इसी अंतरिक्ष में 

जो अजन्मा है 

गीता बात उसी की बोलती है 

स्वप्न की तरह मिट जाएगा

 यह जीवन किसी पल 

है चिन्मय जो आधार 

आँख उसके प्रति खोलती है 

डर-डर कर व्यर्थ ही जीता है मन 

अभय की सुवास 

सहज ही घोलती है !