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सोमवार, मई 10

कोरोना काल

 कोरोना काल 

 यह कैसा युग आया है 

मोबाइल से दूर रहो यह कहते नहीं थकते थे जो 

अब उसी के सहारे उनकी पढ़ाई करवा रहे हैं 

निकट न जाओ दादा-दादी, नाना-नानी के  

बच्चों को यह पाठ सिखा रहे है

जब पॉजिटिव होना दुर्भाग्य पूर्ण है 

और निगेटिव होना ख़ुशी की बात 

जब मिलजुल कर रहना है शिष्टाचार के खिलाफ 

 और आपस में दूरियां बनाना 

समझदारी का निशान

पहले बीमार होने पर लगता था टीका

स्वास्थ्य की गारंटी  है अब इसे  लगवाना

आईसीयू में जाना था अति अफ़सोस का कारण 

आज आईसीयू में बेड मिल गया तो 

सन्तोष की साँस लेते हैं परिजन 

कोरोना काल में बदल ही गए हैं 

कितने मूल्य और शिष्टाचार के मापदंड

 परिजन या मित्र की मिजाजपुर्सी तो दूर रही 

अब कोई नहीं जाता मातम मनाने 

कोरोना ने दिए हैं इतने जख्म 

कि भूल ही गए हैं लोग कब बदला मौसम 

कब छाये आकाश पर बादल सुहाने !


शुक्रवार, अक्टूबर 28

कहाँ मिलेंगे कोमल रिश्ते


कहाँ मिलेंगे कोमल रिश्ते  

दीवाली अभी गयी नहीं है
भाई दूज  है याद दिलाता,
बहना के अंतर में निर्मल
स्नेह की पावन धार बहाता !

पुलक जगी कैसी भीतर जब
फोन की घंटी थी खनकाई,
कानों में भाई-भाभी की
प्रीत भरी जब ध्वनि सुनाई !

हफ्तों पहले भेज दिया था
बहुत सहेज के अक्षत-केसर,
मुहं मीठा करने को बांधा
छोटी सी पुडिया में शक्कर !

सदा सुखी हो प्रियजनों सँग 
यही दुआ मन आज दे रहा,
सहज हृदय की गहराई से
सबके हेतु यही कह रहा !

स्नेह ही है जीवन की थाती
दिल में इसे समाये रहते,
जग में सब कुछ मिल सकता है
कहाँ मिलेंगे कोमल रिश्ते !
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