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सोमवार, मार्च 1

मन

मन 

जब भी इबादत में बैठता कोई 

मन पड़ोसी की तरह ताक-झाँक करे 


जाने क्या डर, उसे कौन सी चाहत 

न रहे निज हदों में खुद को चाक करे 


'आज' में रहने का कायल जो बना  

बीती बातें दोहरा नापाक करे 


 कहाँ दूरी दरम्यां रब बंदे के  

मन ख्यालों की दीवार आबाद करे 


कोई पहुँचा वहाँ, जहाँ सन्नाटा  

मन की आदत डराए,हैरान करे 


 बच्चे कभी माँ की शक्ल में आता  

 दे दुहाई दुनिया की बस  बात करे 


जब भी  निकला राह में  उजालों की

 सुना  हकीकत अँधेरों की खाक करे 


जिस इबादत का खिला गुल वर्षों में 

यूँही आकर उसमें सदा फांक करे 

 

रविवार, सितंबर 29

कैसे-कैसे डर बसते हैं




कैसे-कैसे डर बसते हैं


कैसे-कैसे डर बसते हैं
चैन जिगर का जो हरते हैं !

बीत गया जो बस सपना था
यूँ ही बोझ लिए फिरते हैं,
एक दिवस सब कुछ बदलेगा
झूठी आस किया करते हैं !

कोई तो हम जैसा होगा
व्यर्थ सभी खोजा करते हैं,
अंतर पीड़ा से भरने हित
तिल का ताड़ बना लेते हैं !

जैसे कोई कर्ज शेष हो
जग का मुख ताका करते हैं,
कैसे पार लगेगी नैया
तट पर जा सोचा करते हैं !

किस्मत ऐसी ही लिख लाये
उस पर दोष मढ़ा करते हैं,
चले कभी न स्वयं जिस पथ पर
दूजों से आशा करते हैं !