ये जो सामने
नीला आकाश दिख रहा है
श्वेत हल्के मेघों से आवृत
जिसमें अभी-अभी एक पंछी तिरता हुआ
निकल गया है
जिसको छूने की होड़ में
बढ़ती चली जाती है
धरा की कोख से उगी हरियाली
ऊंचे वृक्षों की कतारें
रोकती हैं दृष्टि पथ
क्षितिज का
जिसके नीचे मंडरा रही हैं
तितलियाँ सुमनों पर
ये गवाह है
अनगिनत सृष्टियों का
अथवा तो घट रहा है इसके नीचे
हर युग.. एक साथ.. अभी इस क्षण !
क्यों कि अनंत है आकाश
कालातीत और भविष्य द्रष्टा भी !
