बन जाओ गर राग प्रेम का
खुद से दूर हुआ है जो भी
तुझसे दूर रहा करता है,
प्रेमी ही यदि खोया हो तो
प्रियतम कहाँ मिला करता है !
बजा रहा है कान्ह बाँसुरी
गोपी जन को याद दिलाने,
बन जाओ गर राग प्रेम का
सुर उसका गूँजा करता है !
गुरुओं की बातें सच्ची हैं
कोई हमसा भीतर रहता,
हरदम कोई आँख गड़ाए
सुबहो-शाम तका करता है !
जिससे ये श्वासें चलती हैं
उससे ही अनजान रहा मन,
उससे आँखें चार हुईँ कब
सारा जग घूमा करता है !
नित नूतन है कान्ह सलोना
बहता जैसे पावन पानी,
हर लेता है पीर हिया की
जो भी ग्वाल सखा बनता है !
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