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सोमवार, मई 23

बन जाओ गर राग प्रेम का

बन जाओ गर राग प्रेम का 


खुद से दूर हुआ है जो भी 

तुझसे दूर रहा करता है, 

प्रेमी ही यदि खोया हो तो 

प्रियतम कहाँ मिला करता है !


बजा रहा है कान्ह बाँसुरी 

गोपी जन को याद दिलाने, 

बन जाओ गर राग प्रेम का 

सुर उसका गूँजा करता है !


गुरुओं की बातें सच्ची हैं 

कोई हमसा भीतर रहता, 

हरदम कोई आँख गड़ाए 

सुबहो-शाम तका करता है !


जिससे ये श्वासें चलती हैं 

उससे ही अनजान रहा मन, 

उससे आँखें चार हुईँ कब 

सारा जग घूमा करता है !


नित नूतन है कान्ह सलोना 

बहता जैसे पावन पानी, 

हर लेता है पीर हिया की 

जो भी ग्वाल सखा बनता है !




शनिवार, मई 22

पूर्ण भीतर पल रहा है

पूर्ण भीतर पल रहा है 


ज्योति जिसकी शांत कोमल 

चाँदनी सी बिछी पथ में, 

सब तरफ बिखरा उजाला 

एक दीपक जल रहा है !


जगत का मंगल सदा ही 

मांगता, वह ज्ञान देता, 

एक उस का ही पसारा

पीर मन की हर रहा है !


 प्रकटे वही हर शब्द से 

 मूल कारण शब्द का जो 

गड़ी गहरी पीर उर में 

गाँठ हर वह खोलता है !


कसक कुछ न कर सके   

हर अधूरी चाह मन की, 

दूर ले जाती उसी से 

पूर्ण भीतर पल रहा है !


 मन समर्पित हो सके तो 

ढाल बन कर दे सहारा,

सौंप दें हर चाह उसको 

रस सुरीला घोलता है ! 




 

शनिवार, अगस्त 16

दूर सागर से रहेगा

दूर सागर से रहेगा


दायरों में जी रहा हो
नहर बन कर जो बहा हो
दूर सागर से रहेगा !

दूर दुःख से भागता हो
सुख ही केवल माँगता हो
पीर मन की ही सहेगा !

स्वयं को ही पोषता हो
आत्म को ही तोषता हो
कब किसी से वह मिलेगा !

धरा को जो शोषता हो
गगन में विष छोड़ता हो
आदमी क्योंकर बचेगा !

भूत को ही रहा ढोता
जिंदगी तज मौत चुनता
कब तलक जीवन सहेगा !