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सोमवार, दिसंबर 14

कोई नानक ध्यान लगाता

 कोई नानक ध्यान लगाता 

हम भीतर से अनभिज्ञ सदा 
बस बाहर-बाहर जीते हैं, 
अंतर पटल उलझने देते 
तन हित पट रेशम सीते हैं !

जब बाहर थे अम्बार लगे 
अतुलित दौलत धन वैभव के, 
भीतर कुछ घटता जाता था 
जिसको ना इसमें सार लगे !

जब इर्द-गिर्द सीमाएं रच 
रिश्तों को उनमें कैद किया, 
कुछ टूट गया था भीतर भी 
जब जीवन पर सन्देह किया !

उर डरा कभी सिर भी थामा
तन ने कितने सन्देश दिए, 
मुस्कान कहाँ वह भीतर की 
ऊपर-ऊपर लब  हँसा किये !

मस्तिष्क के तंतु रोते हैं 
धड़कन दिल की जब बढ़ जाये, 
कम्पन अंगों में होता है
हम लेकिन देख कहाँ पाए !

भीतर की रग-रग से वाकिफ 
कोई नानक ध्यान लगाता, 
इक-इक रेशे को पोषित कर 
बाहर भी सुख-चैन लुटाता ! 

 

बुधवार, अक्टूबर 9

तृप्ति भीतर ही पलती


तृप्ति भीतर ही पलती



एक यात्रा बाहर की है
एक यात्रा भीतर चलती,
बाहर सीमा राहों की है
अंतर में असीमता मिलती !

बाहर प्रायोजित है सब कुछ
 भीतर सहज घटे जाता है,
एक थकन ही शेष है बाहर
 गहन शांति भीतर घटती !

भ्रम ही बाहर आस बंधाता
 निष्पत्ति में खाली हाथ,
निज घर में पहुंचाती सबको
 कलिका मन की जब भी खिलती !

 अंतहीन हैं चाहें मन की
पूर्ण हुई इक दूजी हाजिर,
 भीतर जाकर ही जाना यह
तृप्ति भीतर ही पलती !